व्हीलचेयर पर ममता और नंदीग्राम का संघर्ष !

भोपाल [महामीडिया] विधानसभा चुनाव वैसे तो पांच राज्यों में हो रहे हैं, लेकिन जिस एक विधानसभा सीट पर न सिर्फ पूरे देश, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले बाहर के लोगों की निगाहें भी केंद्रित हो गई हैं, वह है पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम सीट। सीएम ममता बनर्जी सोमवार को पुरुलिया जिले के बाघमुंडी इलाके में रैली को संबोधित करने के लिए व्हीलचेयर पर पहुंचीं। ममता बनर्जी ने इस दौरान खुद को घायल होने का जिक्र करते हुए कहा कि मुझे चोट लगी, लेकिन सौभाग्य से बच गई I भाजपा ने कभी ममता का दहिना हाथ रहे जिस शुभेंदु अधिकारी को दक्षिणी बंगाल में पार्टी को स्थापित करने प्रतिनिधि चेहरा बनाया था, ममता ने उसी के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा करके संग्राम के कायदे बदल दिये हैं।
शुभेंदु इस इलाके से लंबे समय से संसद व विधानसभा में पहुंचते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने 80 हजार से भी अधिक वोटों से वाम मोर्चे के प्रत्याशी को हराया था। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला करके शायद अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने का काम किया है कि वह जोखिम से घबराने वाली नेता नहीं हैं। ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्थान में सिंगूर और नंदीग्राम का काफी महत्व है। वाम मोर्चे की साढे़ तीन दशक पुरानी सत्ता को खत्म करने में नंदीग्राम आंदोलन ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई थी, यह देश जानता है। पिछले एक दशक से यह तृणमूल का गढ़ रहा है। ऐसे में, इस पर किसी अन्य दल को पांव जमाने से रोकने के लिए ममता के पास इससे बेहतर और कोई दांव हो भी नहीं सकता था।
नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में बहुसंख्यक मतदाता अधिक हैं, और भाजपा ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ उन्हें अपने पाले में करने के लिए काफी प्रखर चुनाव अभियान चला रही है। ममता बनर्जी का नंदीग्राम की जनसभा में ‘चंडी पाठ’  करना और ‘शिवरात्रि’ भी उनके बीच ही मनाना , यह  जाहिर करता है कि धार्मिक धु्रवीकरण की चुनौती उनके लिए कितनी अहम हो चली है।
भारतीय राजनीति के लिए यह चिंता की बात है कि जब मतदाताओं के पास हिसाब-किताब का मौका आता है, तब हमारा राजनीतिक वर्ग उन्हें जमीनी मुद्दों से दूर करने में कामयाब हो जाता हैै और अक्सर भावनात्मक, धार्मिक मसले निर्णायक भूमिका अख्तियार कर लेते हैं! कभी एक अनजाने से गांव नंदीग्राम को अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में लाकर वाम सरकार के पराभव की इबारत लिखने वाली ममता बनर्जी ने आज उसी नंदीग्राम से विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करके भाजपा को रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया है। 
पिछले लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा दक्षिण बंगाल के इस इलाके में ज्यादा कुछ नहीं कर पायी थी। ममता भाजपा की इस महत्वाकांक्षा पर विराम लगाकर सत्ता के समीकरणों को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है। दरअसल, इस सीट में अल्पसंख्यकों की संख्या निर्णायक रही है। पार्टी कैडर के वोट हासिल करने के बाद अल्पसंख्यक वोट मिलने से प्रत्याशी की जीत निश्चित हो जाती है। भाजपा मानकर चल रही थी कि ममता बनर्जी अल्पसंख्यक प्रत्याशी को टिकट देगी तो जयश्री राम के नारे के साथ उसकी झोली वोटों से भर जायेगी। लेकिन ममता बनर्जी ने खुद चुनाव लड़ने का फैसला करके भाजपा को रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया है।
 

- -प्रभाकर पुरंदरे

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