महामीडिया न्यूज सर्विस
आनंदित रहना ही जीवन है

आनंदित रहना ही जीवन है

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 409 दिन 16 घंटे पूर्व
06/04/2018
भोपाल (महामीडिया) वर्तमान आधुनिक समय में हम इतने अधिक व्यस्त हो गये हैं कि आनन्द को ही भूल गये हैं। आनन्द क्या है, उसे कैसे, कहां से प्राप्त किया जा सकता है। यह समस्त व्यस्तता और भागदौड़ हम आनन्द की प्राप्ति के लिये ही तो कर रहे हैं परंतु आनंद प्राप्ति संघर्ष ने संभवत: हमें इतना क्षीण कर दिया है कि हमें आनंद के स्थान पर अवसाद प्राप्त हो रहा है।
यह समझना आवश्यक है कि आनंद क्या है? समस्त जीवन आनन्द पर ही आधारित है। फिर भी हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम आनन्द को खोजते हुए निरंतर अवसाद की ओर अग्रसर हो रहे हैं क्योंकि हम क्षणिक सुख को ही आनन्द समझ लेते हैं। साथ-ही-साथ हम यह मान चुके हैं कि आनन्द को भोगा जा सकता है और क्रय भी किया जा सकता है। क्या यह सही है? अपने दैनिक जीवन में हमारे उपयोग हेतु समाज में नित नवीन उपकरणों का आविष्कार होता जा रहा है जिनके उपयोग से हमारा जीवन सुखमय हो जाता है। प्राय: यही अवधारणा हम सभी के भीतर घर कर गई है, किंतु क्या यह सत्य है? नहीं, यही तो भ्रम है। भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये हमने अथक प्रयास किये, यहां तक कि हमने आत्मसम्मान तक को खो दिया। ऐसी स्थिति में पहुंचकर यदि हम उस भौतिक सुख को प्राप्त भी कर लेते हैं, तो उसका नियमित उपयोग व उपभोग करते-करते शनै:-शनै: उससे प्राप्त सुख में कमी होने लगती है और हम पुन: नवीन वस्तु जो हमारे पास नहीं है उसे प्राप्त करने के प्रयास करने लगते हैं। अत: हम जिसे आनन्द मानते हैं वह सुख है वह भी क्षणिक एवं भौतिक परन्तु आनन्द तो सदैव है और सर्वदा आत्मिक है, जिससे मन, कर्म व वचन का गहरा सम्बन्ध होता है। सुख, दैहिक एवं विशेष क्षणिक मानसिकता से जन्म लेता है और यह क्षण हमारे मन, मस्तिष्क पर इतना अधिक हावी हो जाता है कि जिस वस्तु को या सुख को हम प्राप्त करना चाहते हैं हम उसको प्राप्त करने के अथक प्रयास करने लगते हैं यह विचारे बिना ही कि हमें उसकी आवश्यकता है भी कि नहीं और हमारी स्थिति उस कस्तूरी मृग के समान हो जाती है जो स्वयं में से आ रही सुगंध को सम्पूर्ण जगत में खोजता रहता है और अन्तत: निराश हो जाता है। अत: यह तो सिद्ध है कि सुख दैहिक है और आनन्द आत्मिक। आनन्द को स्वयं के भीतर ही खोजना होगा और इसके लिये दैहिक एवं भौतिक प्रयासों के साथ-साथ आत्मिक प्रयास की भी महत्ती आवश्यकता है। महत्वपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हमारे मन, शरीर व मस्तिष्क में तारतम्य होना चाहिये। जिस प्रकार शांत एवं निर्मल जल की झील में ही हम उसकी तलहटी की सुन्दरता को निहार सकते हैं और इसी प्रकार आनन्द को प्राप्त करने के लिये हमें मन, मस्तिष्क व शरीर को लयबद्ध करना प्रथम चरण है और इसके लिये प्रयास रहित उपाय बताया। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने "भावातीत-ध्यान-योग-शैली" के माध्यम से जो नि:संदेह ही एक प्रयास रहित उपाए है जो हमें स्वयं से साक्षात्कार कराते हुए आनन्दित रहने के लिये पर्याप्त है। आनन्द तो वह अनुभूति है जिसे आप अपने भीतर से अनुभव करते हैं। आप यह अनुभव करके देखिए की जब आप भीतर से आनन्दित रहते हैं तो आप आत्मविश्वास से भरे रहते हैं। यह वही आत्मविश्वास है, जो पाण्डवों को उनके राजपाट से निष्कासित करने पर भी उनके साथ था। क्योंकि वे आनन्दित थे, वे जानते थे, कि वह धर्म के साथ हैं और भौतिकता तो मिथ्या है अत: अपने सुख व आनन्द के अन्तर को पहचानिये उनके भेद करिये। आनन्दित होकर आनन्द में रहिए क्योंकि "जीवन आनंद है।"
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