महामीडिया न्यूज सर्विस
सोशल मीडिया के सार्थित्व में दौड़ते आंदोलनों के रथ

सोशल मीडिया के सार्थित्व में दौड़ते आंदोलनों के रथ

admin | पोस्ट किया गया 379 दिन 16 घंटे पूर्व
10/04/2018
भोपाल (महामीडिया): सूचना और संचार क्रांति ने मानव जीवन की दशा और दिशा दोनों ही बदल कर रख दी है. इतना ही नहीं, इस क्रांति ने जो माध्यम तैयार किये हैं उनके द्वारा सूचनाएं भेजने यानि संचार करने की गति को भी तीव्र बना दिया है जिस कारण मानव जीवन बेहद तीव्र गति की दिशा में आगे बढ़ने लगा है. वर्तमान का युग सोशल मीडिया का युग है. इन्टरनेट के माध्यम से चलने वाले विभिन्न मोबाइल/कंप्यूटर एप्लीकेशन जैसे- फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, स्नेपचैट, टेलीग्राम, आदि के द्वारा तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है. इन माध्यमों के द्वारा ऐसे मुद्दों को लोगों तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त हुई है जिन्हें राजनेता अक्सर नज़रंदाज़ कर देते हैं. किन्तु इस माध्यम के कुछ दुष्परिणाम भी हैं जैसे कि बेहद संवेदनशील सूचनाओं के प्रसार को रोक पाना लगभग असंभव हो गया है. 
जो भी हो किन्तु ये तो तय है कि इस माध्यम में इतनी शक्ति है कि कुछ घंटों के भीतर ही किसी मुद्दे को जनता तक पहुँचाने, मुद्दे पर जनता के विचार जानने और जनता को मुद्दे के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करके एक आन्दोलन का रूप देने का काम भली भांति किया जा सकता है. 2 अप्रैल को अनुसूचित जाति / जनजाति वर्ग के द्वारा किये गये भारत बंद का आह्वान इसी माध्यम की परिणति थी. बिना किसी स्तरीय नेता के नेतृत्व के, इस आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी रूप दिया गया था. लोग सोशल मीडिया पर उपलब्ध सूचना के आधार पर इकठ्ठा हुए और आन्दोलन की राह पर निकल पड़े. ये और बात है कि नेतृत्व के आभाव में भीड़ का नकारात्मक पहलू सामने आया और देश को जन-धन की हानि उठानी पड़ी. ये पहली घटना नहीं थी जबकि सोशल मीडिया ने इस प्रकार अपनी ताकत दिखाई हो. निर्भया बलात्कार और हत्या कांड के बाद भी इस माध्यम की ताकत देश ने देखी थी. लोगों ने सडकों पर आकार आक्रोश का प्रदर्शन किया था और सरकार को महिला सुरक्षा एवं न्यायायिक व्यवस्था में बड़े बदलाव करने को मज़बूर किया था. 
इस तीव्रतम माध्यम ने एक बार फिर अपनी महत्वता का आभास कराया है. अनारक्षित वर्ग ने, अनुसूचित जाति / जनजाति वर्ग के द्वारा 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान किये गये उपद्रव के विरोध में, 10 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया और इसके लिए सोशल मीडिया का पूरी तरह उपयोग किया. सरकार के द्वारा सोशल मीडिया पर रखी गयी कड़ी नज़र एवं चाक-चौबंद पुलिस व्यवस्था के बावजूद लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपना विरोध जताया. साफ़ है कि सूचना ने लोगों के अन्दर तक प्रवेश किया और उन्हें बाहर निकलने पर विवश किया. सरकार के द्वारा सोशल मीडिया से इस बंद के आह्वान की सूचनाओं को हटाने की लाख कोशिश के बाद भी, इसे रोका नहीं जा सका. सोशल मीडिया की ताकत से लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर राजनैतिक चुनावों पर भी असर डाला जा सकता है. इसका हाल ही में उदाहरण सामने आया जब कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी पर फेसबुक के डाटा के द्वारा अमरीका के राष्ट्रपति के चुनावों पर असर डालने का आरोप लगा और मामला सामने आया. 
उपरोक्त दोनों उदाहरणों से हमें एक बात तो समझ में आती है कि सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों की भावनाओं को भड़काकर बिना किसी नेता के आन्दोलन चलाये जा सकते हैं भले ही उसके परिणाम दोषपूर्ण ही क्यों न हों. भारत देश में समस्यायों की कमी नहीं है और देश की स्वार्थसिद्ध राजनीति से जनमानस को बहुत अपेक्षाएं भी नहीं हैं. ऐसे में यदि किसी सटीक मुद्दे को सोशल मीडिया पर हवा दे दी गयी तो बड़े-बड़ों के तख्तापलट होने को भी नाकारा नहीं जा सकता क्योंकि सोशल मीडिया के नेतृत्व में दौड़ते आंदोलनों के रथों की गति सप्त अश्वों के द्वारा खींचे जाने वाले सूर्य के रथ से भी तीव्र जान पड़ती है.
-देवेन्द्र कुमार सोनी, उप-संपादक
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