महामीडिया न्यूज सर्विस
आम जनता की हथियार हैं जनहित याचिकाएं

आम जनता की हथियार हैं जनहित याचिकाएं

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 596 दिन 46 मिनट पूर्व
25/04/2018
भोपाल (महामीडिया) सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मृत्यु के मामले में किसी भी तरह की स्वतंत्र जांच की मांग को नकार दिया. वो न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है, लेकिन कोर्ट ने जिस तरह से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और दुष्यंत दवे के आचरण और नियत पर शक करते हुए जनहित याचिकाओं की वैधता पर ही सवालिया निशान लगाए, उससे आने वाले समय में जनहित के मुद्दे उठाने वाले समूह और समर्पित वकीलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.यहां सवाल यह नहीं है कि कोर्ट ने जज लोया की मृत्यु के मामले में अaमुक ही फैसला क्यों दिया? जैसा हर मामले में होता है, किसी एक पक्ष के तर्क किसी एक बेंच को सही लगते हैं, वो उस अनुसार अपना फैसला देती हैं. लेकिन, इसका यह मतलब यह कतई नहीं होता है कि दूसरा पक्ष बेईमान है या उसका कोई छुपा एजेंडा था!न्यायालय का कहना है कि वर्षों से, बड़ी बेशर्मी से जनहित याचिकाओं का निजी हित के लिए दुरुपयोग होता रहा है. कोर्ट यहीं नहीं रुकी, उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां ऐसे लोग है, जो अपनी व्यक्तिगत प्रसिद्धि के लिए जनहित याचिकाएं दाखिल करते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जो व्यापारिक और राजनैतिक हित रखने वालों के उकसाने पर इन जनहित याचिकाओं को दाखिल करते हैं.सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन के तहत वो मुक्ता और पन्ना आयल फील्ड को रिलायंस एवं एनरोंन को दिए जाने के खिलाफ वर्ष 1997 में ही दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगा चुके थे. और अगर वो इसमें व्यापारिक और राजनैतिक हित रखते तो कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने वाले टूजी मामले में वो सुप्रीम कोर्ट से सड़क तक लड़ाई नहीं लड़ते. जिसकी बदौलत आज भाजपा केंद्र में सत्ता में है.इतना ही नहीं, हाल ही में टूजी मामले में ट्रायल कोर्ट से सारे आरोपी बरी होने पर भी कांग्रेस के खिलाफ वो जितना खुलकर बोले उतना तो भाजपा भी नहीं बोली. और अब उन्हीं प्रशांत भूषण को राजनैतिक इशारे पर जज लोया मामले को उठाने का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती. और ना ही कोर्ट ने यह बताया कि वो ऐसा किन तथ्यों के आधार पर कह रहे हैं.प्रशांत भूषण ने अपने पिता शांति भूषण के साथ मिलकर 1990 में कमेटी फॉर जुडिशल अकाउंटेबिलिटी बनाई और वो कैंपेन फॉर जुडिशल अकाउंटेबिलिटी और जुडिशल रिफार्म के संजोयक हैं जो लगातार इस मुद्दे पर सरकार और न्यायपालिका पर सवाल उठाती रही है. और न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति से लेकर उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए अभियान चलाए हुए हैं. हम थोड़े में यह कह सकते हैं कि पिछले 30 सालों के उनके कानूनी अभियान के चलते वो व्यापारिक और राजनैतिक हित रखने वाली ताकतों के आंख की किरकिरी बने हुए हैं.जनहित याचिकाएं और भूषण, दवे, कोलिन, कामिनी जायसवाल, इंदिरा जयसिंह जैसे समर्पित वकील का समूह उन्हें यह आश्वासन देता है कि यह अदालत उनके लिए भी है. वर्ना, वहां उनके जैसे वकील एक-एक सुनवाई के दस लाख लेते हों वहां आम व्यक्ति या जनसंगठन कैसे अपनी बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुचाएंगें? 
BY RAJKUMAR SHARMA ,SUB EDITOR 
और ख़बरें >

समाचार

MAHA MEDIA NEWS SERVICES

Sarnath Complex 3rd Floor,
Front of Board Office, Shivaji Nagar, Bhopal
Madhya Pradesh, India

+91 755 4097200-16
Fax : +91 755 4000634

mmns.india@gmail.com
mmns.india@yahoo.in