महामीडिया न्यूज सर्विस
आज्ञा पालन और चेतना

आज्ञा पालन और चेतना

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 384 दिन 17 घंटे पूर्व
01/05/2018
भोपाल (महामीडिया)भारतीय संस्कृति प्रेरणाओं कि अविरल धारा है और समय-समय पर इस धारा को अनेक महापुरुषों ने अपने प्रेरणा दायक जीवन को इसमें समाहित होकर इसका मान बढ़ाया है। 
भारतीय संस्कृति में आज्ञा पालन का विशेष महत्व है, आज हम हमारी सनातन परम्परा के तीन मुख्य आज्ञापालक पुत्रों राजा शांतनु पुत्र 'भीष्म', राजा ययाति पुत्र 'पुरु' एवं राजा दशरथ नंदन ?राम? के जीवन पर चर्चा करेंगे जिन्होंने अपने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया एवं शब्दश: उनका पालन किया। तीनों पुत्रों ने पिता कि आज्ञा पालन करने में अपने पुत्र धर्म का धर्ममय पालन किया और किंतु भविष्य में अपनी इस आज्ञा के पालन में लज्जित होना पड़ा।
सर्वप्रथम हम बात करते हैं, भारतीय इतिहास में प्रतिज्ञा पुरुष के रुप में विख्यात राजा शांतनु पुत्र भीष्म कि जिन्होंने अपने पिता कि इच्छा पूर्ति के लिये उन्हें वचन दिया कि मैं जीवन-भर हस्तिनापुर राज्य सिहांसन की रक्षा व संरक्षण करूंगा। किंतु उस पर विराजमान नहीं होऊंगा। कालान्तर में इसी प्रतिज्ञा के चलते महाभारत जैसे भयावह युद्ध हुआ। "भीष्म" के लिये यह-प्रतिज्ञा वरदान भी सिद्ध हुई और अभिशाप भी क्योंकि वह एक मात्र प्रतिज्ञापुरुष कहलाये और अभिशाप इसलिये क्योंकि अपनी प्रतिज्ञा के चलते उन्होंने आयोग्य पुरुषों को हस्तिनापुर का शासन बनने दिया। और अभिशप्त हुए। द्वितीय उदाहरण है, राजा यायाती पुत्र पुरु। राजकुमार पुरु ने अपनी इच्छाओं कि पूर्ति के लिये अपने पुत्र से उसकी आयु कि मांग की पुत्र पुरु ने सहर्ष अपनी आयु अपने पिता को दे दी। कालान्तर में यायाती को आभास हुआ कि इच्छाओं कि पूर्ति हो ही नहीं सकती तब तक वो अपने पुत्र कि आधी से अधिक आयु जी चुके थे। अत: पुरु वृद्धधावस्था में राजा बनें। जिससे वह अपनी प्रजा का अभिलाषाओं को पूरा न कर सके और अपमानित हुए।
अब दशरथ नन्दन राम के जीवन का उदाहरण आता है जिन्होंने अपने पिता कि आज्ञा को पूर्ण करने के लिये वन्यजीवन को स्वीकार्य किया इन चौदह वर्षों में राम ने अपने जीवन में उच्च आदर्शों का निर्वहन किया दुर्दान्त राक्षसों का वध किया, भक्त शबरी का उद्धार किया और सकुशल लौट आये।
उपरोक्त दुर्लभ चरित्रों से हम सभी को यह शिक्षा लेना चाहिए कि आवेश में या बिना कुछ विचार-विमश किये हमें अपने जीवन में निर्णय नहीं लेना चाहिये क्योंकि यह निर्णय ही हमारे जीवन को कीर्तिवान बनाते हैं। हमारे जीवन के पश्चात भी हम समाज में उदाहरणों में जीवित रहते हैं, अत: निर्णय सदैव चेतनावस्था में ही लेने चाहिये और सदैव चैतनावान रहने के लिये हमें प्रतिदिन प्रयास करना होगा किंतु आज के व्यस्त जीवन की भागदौड़ में हमें स्वयं के लिये समय ही कहां है। ऐसा तो नहीं कि आपके जीवन कि नांव बंधी है और आप निरन्तर परिश्रम का चप्पू चला रहे हैं प्राय: यही होता है कि हम प्रतिस्पर्धा में यह देखना भूल जाते हैं, कि हमारे पास जो है वह हमारे जीवन के लिये पर्याप्त है या हमने अधिक एकत्रित कर लिया है। यह जाने बिना ही हम सतत् धन व सुख की प्राप्ति के लिये नितनवीन भौतिक साधनों को एकत्रित करने का प्रयास करने की होड़ में आनन्द को भूल गये है जो र्स्वप्याप्त है और आपके भीतर भी है। अत: प्रतिदिन प्रात: सन्ध्या के समय स्वयं को 10 से 15 मिनिट का समय दें और भावातीत ध्यान-योग शैली का अभ्यास करें। जिससे आपकी चेतना जागृत रहेगी जो आपको यह सामर्थ्य प्रदान करेगी कि क्या आपके लिए उचित है तथा क्या अनुचित और जब आपका निर्णय सही होगा तो आप स्वयं से संतुष्ट हो जायेंगे। तब आप निश्चित ही आनन्द आपको आनन्द के सागर की और ले चलेगा।
जय गुरुदेव, जय महर्षि।

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