महामीडिया न्यूज सर्विस
प्रकृति और जीवन

प्रकृति और जीवन

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 459 दिन 5 घंटे पूर्व
20/05/2018
भोपाल (महामीडिया) प्रकृति एक मात्र शब्द नहीं है जब हम लिखते या पड़ते हैं तो हमारे मस्तिष्क में सम्पूर्ण शक्तियों, परिस्थितियों और वस्तुओं को एक परस्पर जुड़ाव की अनुभूति होती है। हमारे चारों ओर का परिवेश जिससे हम जीवित है वही विराट प्राकृतिक परिवेश ही प्रकृति है। ये अत्यंत शक्तिशाली एवं अत्यधिक संवेदनशील है। अत: हमारे ऋषि मुनियों, सतों ने प्रकृति की अन्तरनिहित शक्तियों को समझा और उनकी उपासना की वह सही अर्थों में प्रकृति और जीवन के समन्वय को समझने में सफल रहें और सदियों तक मानव जीवन को सुरक्षित व संरक्षित रहा क्योंकि उस समय मानव भी प्रकृतिको घात नहीं पहुंचाता था किन्तु तथाकथित आधुनिक युग के वैज्ञानिकों ने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने की अनैक तकनीकों का अविष्कार किया जिससे प्रदूषण नामक दानव का जन्म हुआ और वे अब सम्पूर्ण प्रकृति को क्षति पहुंचा रहा हैं। सम्पूर्ण प्रकृति के आवरण अर्थात पर्यावरण को प्रदूषण ने घायल कर दिया है। सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण के विषय में चिंतित है किंतु यह कैसा चिंतन है? जो निर्रथक है संभवत: जितना अधिक चिंतन पर्यावरण प्रदूषण पर बढ़ता जा रहा उसी क्रम में साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ता जा राह है। तथाकथित विकास के जनक प्रकृति को नष्ट करने के नित नवीन अविष्कार कर रहे हैं। वायु, जल, भूमि, चहु और प्रदूषण ने अपने पैर पसार लिये है। ऐसे में भारत भूमि के सतों को सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करना होगा जो कि समय-समय पर भारत करता आया है हम आध्यात्म को ही जीवन का आधार मानते हैं किंतु पश्चिम जगत में आध्यात्म को ऊपरी रूप से तो स्वीकार्य कर लिया किंतु आत्मिक रूप से वह एकदम आधुनिकता के ही सेवक है। भारतीय वैदिक वांडयमय के अनुसार जो भी संकल्प लेना है उसे भीतर से मन से स्वीकार्य करना होगा एवं उस संकल्प की आत्मा को जीवित रखना होगा वही सम्पूर्ण प्रयास होगा जब हम मन, कर्म व वचन से हमारी मां प्रकृति को संरक्षित करने का संकल्प लेंगें इसकी महती आवश्यकता है वर्तमान परिवेश में किंतु इसमें सबसे बड़ी बाधा है मन, कर्म व वचन में सामंजस्य की अनुपस्थिति और हमारे कर्त्तव्यों का बोध कराती है, प्रकृति के प्रति किंतु हम अपने अधिकारों को लेकर बहुत अधिक सजग हैं वहीं कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन जो कि हमारी सोच में रच बस गया है सर्वप्रथम हमें यह प्रयास करना होगा कि हम प्रकृति के प्रति अपने कर्त्तव्यों को जाने और आवश्यकता से अधिक उसका उपभोग न करें। किंतु आज कि परिस्थितियां तो इस प्रकार हे कि दोहन दूर की बात हो गई हम भरपूर उसका अनियंत्रित शोषण कर रहे हैं। हमारी संस्कृति प्रकृतिके समस्त उपकारक तत्वों को देव कहकर उनको संरक्षित करने के प्रेरित करती है तो वहीं तथाकथितआधुनिक जीवनशैली उसके दोहन को, शोषण को अपना अधिकार मानती है। हम युगों से प्रकृति के भक्त रहे है और वह हमारी जीवनदायनी। वैदिक ऋषियों ने ही सर्वप्रथम सृष्टि का चिंतन, मनन करते हुए उसका दर्शन लाभ लिया और उसका वर्णन किया है कि प्रकृति के तीन रूप विद्यमान है वह है वरुण, मित्र और अर्यमा और इनके संयुक्त रूपी सत्ता को अदिति  कहा गया है। जो निश्चित ही अनादि एवं अखंड सत्ता है। वैदिक ऋषियों के अनुसार प्रकृतिक पदार्थों से कल्याण की कामना को स्वस्ति कहा गया है। वैदिक विद्वान कहते हैं कि अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति योग अत: सहज सुलभ प्रकृति का सुरक्षित रहना ही स्वस्ति है। प्राकृतिक तत्वों में समन्वय ही मानवीय सुख वे शांति का आधार है। किंतु एव विचारणीय शब्द है पाप वह क्या है यही तो हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि है कि जो नहीं करता है, अर्थात् जो निषेध है वह कर दिया तो वह पाप अर्थात प्रकृति के प्रति किया गया पाप ही प्रदूषण है। अत: सर्वप्रथम हमे हमारी प्रकृति के मूल तत्वों से एक पृथ्वी जो हमारे पर्यावरण का आधार भूत है वही हमारे जीवन का आधार है। अत: निश्चित ही यह वंदनीय एवं प्रार्थनीय है अत: हम इसे हमारे दीर्घ जीवन के लिये अपने कर्त्तव्यों को समझकर उन्हें पूर्ण करने का प्रयास मनसा वाचा कर्मणा के सिद्धांत पर ही करना होगा। तथा कथित विकास की अवधारणा को धीरे-धीरे जीवन के विकास की अवधारणा की ओर मोड़ना होगा सभी को संतोषी स्वभाव को धारण करना होगा क्योंकि परिवर्तन आरंभ से ही संभव है। अत: पुन: वेदिक वांग्डमय कि ओर लौटना होगा क्योंकि वास्तविक जीवन वही है जो आनंद से भरपूर है, क्योंकि जीवन आनंद है।
ब्रह्मचारी गिरीश
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश एवं
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी, भारत का ब्रह्मस्थान, म.प्र.

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