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योग, आनंद का आधार

योग, आनंद का आधार

admin | पोस्ट किया गया 502 दिन 18 घंटे पूर्व
01/06/2018
भोपाल (महामीडिया) यह हर्ष का विषय है कि आज सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण करते हुए अपनी शक्ति व सामर्थ्य का आभास कराकर भारतीय योग "योगा" के रुप में घर वापस आ गया है किंतु अभी भी यह अधूरा है क्योंकि योग मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं है। इसके 8 चरण है जैसे यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। जैसा कि स्पष्ट है कि योग का शाब्दिक अर्थ है जोड़ना और इस जुड़ने के भी चरण है जो कि इसके निरंतर अभ्यास से संभव है जैसे प्रथम योग का क्रम है कि मन व मस्तिष्क का योग, उसके पश्चात मन का आत्मा से योग फिर आत्मा का परमात्मा से 'योग' यही सर्वश्रेष्ठ 'योग' है। 'योग' हमारी वैदिक संस्कृति की उत्पत्ति है अत: यह कहना उचित होगा कि सम्पूर्ण विश्व पुनः अपने कल्याण व जीवन में आनंद की प्राप्ति के लिये हमारी और देख रहा है। पश्चिम समाज कहता है जीवन संघर्ष है एवं इसी वाक्य को जीवन का सत्य मानते हुए पश्चिमी राष्ट्रों ने सम्पूर्ण विश्व में इसका प्रसार कर दिया किंतु भौतिक सम्पन्नता होते हुए भी पश्चिम देशों में प्रसन्नता का अभाव है क्यों, भौतिक सम्पन्नता से उत्पन्न आनंद स्थाई नहीं है अतरू हमारी इच्छा की पूर्ति होने व उपभोग के पश्चात यह हमें अरुचिकर लगने लगता हैं। यह तो तय है की हमें अस्थाई प्रसन्नता से स्थायी आनन्द की ओर अग्रसर होना होगा और यह तो अभी प्रारम्भ है भविष्य में अभी बहुत कुछ सुधार होना अभी शेष है। जैसे कि पहले जब हमने विश्व को हमारे वैदिक संस्कारों से जनित योग का परिचय कराया गया था तो वो इस विद्या पर व्यंग्य किया करते थे। यह इस प्रकार है कि जब तक किसी ने मीठा स्वाद न चखा हो उसे आप मीठा स्वाद क्या होता है उससे परिचय नही करा सकते जब उस मीठे स्वाद का अनुभव उसकी जिव्हा नहीं कर लेती वह उस स्वाद व उसके लाभ से वंचित रहता है और जब तक वह उसके स्वाद का अनुभव कर लेता है तो वह इस स्वाद का प्रचार-प्रसार करने लगता है। योग के समान ही अनेक पुष्प रूपी ज्ञान, भारतीय वैदिक विद्या रूपी उद्यान में पुष्पित व पल्लवित हो रहे हैं। सम्पूर्ण विश्व उसके लाभ व गुणों से अनभिग्य है किंतु शनै-शनै तथाकथित आधुनिकता को पुनः वैदिक ज्ञान की शरण में आना ही होगा। अत: हमें अभी भी सर्तक होना होगा एवं सम्पूर्ण भारत में हमें हमारी शिक्षा व संस्कृति का संरक्षण के साथ-साथ शोध व अनुसंधान की आवश्यकता है। वर्तमान समय में तथाकथित आधुनिक सोच ने हमारी दृष्टि पर संशय रूपी चश्मा लगा दिया है। इसलिए हमें चारों ओर संशय ही दिखाई देता है जो कि अनुचित है। इससे मुक्ति के लिये परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भावातीत ध्यान योग का मार्ग बतलाया है जिसके नियमित अभ्यास से हमारी चेतना जागृत होती है जो हमें सत् कर्म की ओर प्रेरित करती है। ऐसा कोई भी कार्य जिससे किसी का अहित होता है वह अक्षम्य है अत: हमें अहित से कल्याण की ओर अग्रसर होने का प्रयास प्रारम्भ करना होगा। सम्पूर्ण विश्व में लगभग करोड़ों लोग इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग देकर स्वयं के जीवन को आनंदित कर रहे हैं और अप्रत्यक्ष रुप से वह वातावरण कि नकारात्मकता का भी शमन कर रहे हैं। परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहा करते थे कि भारतीय वैदिक ज्ञान को समझने की युक्ति को आज सब विज्ञान कहते हैं। यह पूर्णत: सत्य है क्योंकि आज का विज्ञान मानव 'मन' तक नहीं पहुंच पाया है। वहीं मस्तिष्क के सम्बन्ध में लगभग 13ः तक ही अध्ययन कर पाया है। अभी तो आधुनिक विज्ञान अपने बाल्यावस्था में है। अभी तो अनेकानेक अनुसन्धान करने शेष हैं। भारतीय वैदिक ज्ञान को समझने के लिये वर्तमान वैज्ञानिकों को अभी और अध्ययन करना होगा जिससे कि यह प्रकृति दोहन का विज्ञान न बनकर कल्याण का ज्ञान बन सके।
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