महामीडिया न्यूज सर्विस
'वेद' प्रकाश पुंज

'वेद' प्रकाश पुंज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 304 दिन 18 घंटे पूर्व
20/07/2018
भोपाल (महामीडिया) 'वेद' वह आकाश पुंज है जो हमारे जीवन को प्रकाशित कर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह शुद्ध ज्ञान सनातन है। आधुनिक शिक्षा का ज्ञान व्यक्ति व समाज की चेतना से लुप्त हो सकता है किंतु वैदिक-ज्ञान प्रकृति में समाहित है जिसे हम अपनी चेतना को जागृत कर प्राप्त कर सकते हैं। जब मानव ने जन्म लिया तब भी उसकी चेतना जागृत थी तभी तो उसे जब भूख लगी तो उसने प्रकृति से अपना पेट भरा और शनै:-शनै: उसकी चेतना जागृत होती गई तो वह विकास करता गया। आधुनिक ज्ञान कब विकास से विनाश की ओर अग्रसर हो गया यह हमें पता ही नहीं चला यही सोच महर्षिजी ने सर्वप्रथम यूरोप व अमेरिका में जाकर दी बताया कि जो वैदिक ज्ञान है वह सर्वथा आनंद का मार्ग है और ज्ञान से मानव का विकास करना अच्छा है किंतु यह चेतना आधारित है और हमें ध्यान रखना होगा कि यह विकास कहीं मानव के विनाश का कारण नहीं बन जाये। गीता भी हमें यही ज्ञान देती है कि शासक व प्रकाशक भी चेतना को जागृत कर के ही अपने कर्त्तव्यों व अधिकारों का उपयोग करे एवं सदैव अपने व्यवहार व प्रत्येक कर्म में उस चेतना का आभास होना आवश्यक है क्योंकि हमारी चेतना हमें सदैव ही ऐसे कर्म करने से रोकती हैं जो अप्राकृतिक है। किंतु महर्षि कहते है कि "चेतना का विज्ञान बन्दूक से निकली उस गोली के समान है जो यदि अपने प्राथमिक स्तर से ही अपने लक्ष्य से बाल के बराबर भी विचलित होती है तो आगे चलकर वह अपने लक्ष्य से मीलों दूर हो जाती है।" यह चेतना का विज्ञान है अत: हमें सदैव अपने जीवन में अपनी चेतना की जागृति पर बहुत अधिक ध्यान देकर उसे बारम्बार शुद्ध से शुद्धतम् स्तर अर्थात प्राकृतिक चेतना की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए। तभी हम ब्रह्म की चेतना की ओर अग्रसर हो जायेंगे। 
व्यक्ति की चेतना की भी दो स्थितियाँ होती हैं। एक वह स्तर जब वह स्वयं के लिये चेतना को जागृत करता है। और दूसरा स्तर वह होता है जब वह स्वयं की चेतना से सामूहिक चेतना को जागृत करने का प्रयास करे। जिस प्रकार बहुत से विद्वानों ने इस चेतना का अनुभव किया और उस पर आधारित होकर अपने जीवन को आनन्दित कर लिया। भगवान् आदिशंकराचार्यजी ने अपनी चेतना को जागृत करने के पश्चात् सामाजिक व सामूहिक चेतना को जागृत करने का प्रण लिया और सम्पूर्ण भारत में चारों दिशाओं में चार ज्ञान के केन्द्रो की स्थापना की और सामूहिक चेतना को जागृत किया। सदैव ज्ञान को समझने और उसको व्यावहारिकता में लाने में अपनी स्वयं की चेतना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि गुरु अपनी चेतना से ज्ञान देता हैऔर शिष्य अपनी चेतना के स्तर से उसे ग्रहण कर समझता है और यही अंतर ज्ञान को समझने और उसको व्यवहार में लाने के लिये है। जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने अर्जुन की चेतना को जाग्रत करने के लिये कहा "योगस्य कुरू: कर्माणि" अर्थात योगस्य होकर पहले योग को धारण करो स्वयं को प्रकृति का हिस्सा मानो और फिर सब कुछ प्रकृतिमय हो जावेगा और उसी क्षण से आपको अपनी प्राकृतिक शक्तियों का अनुभव होगा जो कि आपको आपके जन्म से मिली है किंतु आपने उन्हें जाग्रत नहीं किया है भावों में अतीत होकर अपने कर्म का भान करने पर ही हम अपने कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार अर्जुन ने महाभारत समर में विजय प्राप्त की। क्योंकि वह 'योगस्थ कुरु कर्माणी' योग में स्थिर होकर अपनी चेतना को जाग्रत कर शुभ कर्म करो और धर्म-अधर्म में अंतर कर सको और धर्म के उत्थान हेतु अधर्म का नाश करो। भावातीत ध्यान योग शैली का नियमित प्रात: और संध्या का अभ्यास आपको प्रकृति के समीप जाने में आपका मार्गदर्शक व सहयात्री होगा।
'वेद' वह आकाश पुंज है जो हमारे जीवन को प्रकाशित कर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह शुद्ध ज्ञान सनातन है। आधुनिक शिक्षा का ज्ञान व्यक्ति व समाज की चेतना से लुप्त हो सकता है किंतु वैदिक-ज्ञान प्रकृति में समाहित है जिसे हम अपनी चेतना को जागृत कर प्राप्त कर सकते हैं। जब मानव ने जन्म लिया तब भी उसकी चेतना जागृत थी तभी तो उसे जब भूख लगी तो उसने प्रकृति से अपना पेट भरा और शनै:-शनै: उसकी चेतना जागृत होती गई तो वह विकास करता गया। आधुनिक ज्ञान कब विकास से विनाश की ओर अग्रसर हो गया यह हमें पता ही नहीं चला यही सोच महर्षिजी ने सर्वप्रथम यूरोप व अमेरिका में जाकर दी बताया कि जो वैदिक ज्ञान है वह सर्वथा आनंद का मार्ग है और ज्ञान से मानव का विकास करना अच्छा है किंतु यह चेतना आधारित है और हमें ध्यान रखना होगा कि यह विकास कहीं मानव के विनाश का कारण नहीं बन जाये। गीता भी हमें यही ज्ञान देती है कि शासक व प्रकाशक भी चेतना को जागृत कर के ही अपने कर्त्तव्यों व अधिकारों का उपयोग करे एवं सदैव अपने व्यवहार व प्रत्येक कर्म में उस चेतना का आभास होना आवश्यक है क्योंकि हमारी चेतना हमें सदैव ही ऐसे कर्म करने से रोकती हैं जो अप्राकृतिक है। किंतु महर्षि कहते है कि "चेतना का विज्ञान बन्दूक से निकली उस गोली के समान है जो यदि अपने प्राथमिक स्तर से ही अपने लक्ष्य से बाल के बराबर भी विचलित होती है तो आगे चलकर वह अपने लक्ष्य से मीलों दूर हो जाती है।" यह चेतना का विज्ञान है अत: हमें सदैव अपने जीवन में अपनी चेतना की जागृति पर बहुत अधिक ध्यान देकर उसे बारम्बार शुद्ध से शुद्धतम् स्तर अर्थात प्राकृतिक चेतना की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए। तभी हम ब्रह्म की चेतना की ओर अग्रसर हो जायेंगे। 
व्यक्ति की चेतना की भी दो स्थितियाँ होती है। एक वह स्तर जब वह स्वयं के लिये चेतना को जागृत करता है। और दूसरा स्तर वह होता है जब वह स्वयं की चेतना से सामूहिक चेतना को जागृत करने का प्रयास करे। जिस प्रकार बहुत से विद्वानों ने इस चेतना का अनुभव किया और उस पर आधारित होकर अपने जीवन को आनन्दित कर लिया। भगवान् आदिशंकराचार्यजी ने अपनी चेतना को जागृत करने के पश्चात् सामाजिक व सामूहिक चेतना को जागृत करने का प्रण लिया और सम्पूर्ण भारत में चारों दिशाओं में चार ज्ञान के केन्द्रो की स्थापना की और सामूहिक चेतना को जागृत किया। सदैव ज्ञान को समझने और उसको व्यावहारिकता में लाने में अपनी स्वयं की चेतना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि गुरु अपनी चेतना से ज्ञान देता हैऔर शिष्य अपनी चेतना के स्तर से उसे ग्रहण कर समझता है और यही अंतर ज्ञान को समझने और उसको व्यवहार में लाने के लिये है। जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने अर्जुन की चेतना को जाग्रत करने के लिये कहा "योगस्य कुरू: कर्माणि" अर्थात योगस्य होकर पहले योग को धारण करो स्वयं को प्रकृति का हिस्सा मानो और फिर सब कुछ प्रकृतिमय हो जावेगा और उसी क्षण से आपको अपनी प्राकृतिक शक्तियों का अनुभव होगा जो कि आपको आपके जन्म से मिली है किंतु आपने उन्हें जाग्रत नहीं किया है भावों में अतीत होकर अपने कर्म का भान करने पर ही हम अपने कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार अर्जुन ने महाभारत समर में विजय प्राप्त की। क्योंकि वह 'योगस्थ कुरु कर्माणी' योग में स्थिर होकर अपनी चेतना को जाग्रत कर शुभ कर्म करो और धर्म-अधर्म में अंतर कर सको और धर्म के उत्थान हेतु अधर्म का नाश करो। भावातीत ध्यान योग शैली का नियमित प्रात: और संध्या का अभ्यास आपको प्रकृति के समीप जाने में आपका मार्गदर्शक व सहयात्री होगा।
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