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साहित्य और फिल्म जगत के पुरोधा कवि गोपालदास नीरज

साहित्य और फिल्म जगत के पुरोधा कवि गोपालदास नीरज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 457 दिन 11 घंटे पूर्व
20/07/2018
भोपाल (महामीडिया) हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, शिक्षक, कवि एवं फ़िल्मों के गीत लेखक गोपालदास नीरज अब हमारे बीच नहीं हैं। कई दिनों से फेफड़ों में संक्रमण की वजह से लंबी बीमारी के बाद कल उनका दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में देहअवसान हो गया। कवि नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तरप्रदेश के इटावा में हुआ था। कवि नीरज का कानपुर से विशेष लगाव रहा। कानपुर ही नीरज के संघर्षों की जड़ से लेकर सफलता का विशाल वटवृक्ष था। उन्होंने कानपुर के नाम पाती में भी इसका उल्लेख किया है। उन्होंने पाती में इन शब्दों से कानपुर का वर्णन किया है- 'कानपुर! आह! आज याद तेरी आई फिर...। कवि नीरज ने इटावा में कचहरी में टाइपिस्ट की नौकरी की फिर वे दिल्ली आकर नौकरी करने लगे। किंतु यहां से भी वे जल्दी वापस कानुपर आ गए और डीएवी कॉलेज में क्लर्क के पद पर नौकरी करने लगे। यहीं से उन्होंने मजदूरों के दर्द को समझा और इस दर्द को उन्होंने अपनी रचनाओं में इंगित किया। उनकी काव्य रचना के कारण उन्हें देश के कई स्थानों से बुलावा आने लगा। कवि सम्मेलनों में उनकी लोकप्रियता दिन व दिन बढ़ने लगी। इसी लोप्रियता के चलते कवि नीरज को मुंबई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का न्यौता दिया जिसे उन्होंने बड़ी श्रद्धा से स्वीकार कर लिया। उनके लिखे गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा पहली ही फ़िल्म में बहुत प्रसिद्ध हुए। जिसके बाद वह मुंबई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। उन्होंने मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी प्रसिद्ध फिल्मों में गीत लिखे। उनके लिखे गीतों में काल का पहिया घूमे रे भइयाए बस यही अपराध मैं हर बार करता हूंए ए भाई! जरा देख के चलोए  रंगीला रे, तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन...ए शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब...ए आदि बहुत प्रसिद्ध हुये। कवि नीरज ही प्रथम व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से उन्हें सम्मानित किया गया। फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। कवि नीरज का मुंबई से भी मन भर गया और वे फिल्मों की नगरी को छोड़कर वापस अलीगढ़ आ गये। कवि नीरज का हम सभी को छोड़कर जाना ही देश के लिये अपूर्णीय क्षति है। 
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