महामीडिया न्यूज सर्विस
व्यथा व्यर्थ है!

व्यथा व्यर्थ है!

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 369 दिन 7 घंटे पूर्व
03/12/2018
भोपाल (महामीडिया) मानव जीवन क्या है? प्रश्न बहुत ही सरल है एवं स्पष्ट है किंतु इसका उत्तर खोजना अत्यंत जटिल है। भारतीय वैदिक संस्कृति इसे 'आनंद' कहती हैं जो कि बुद्ध के आगमन पर ?जीवन दु:ख है? में परिवर्तित हो गया और इससे बाहर आने के लिये उन्होंने अपने सूत्रों से परिचय कराया। मेरा मानना है कि जीवन आनंद है क्योंकि जीवन में हम जो कुछ भी करते हैं उसके दो परिणाम होते हैं। एक सार्थक और दूसरे निर्रथक। हमारे कर्म ही हमारे जीवन को हमारे लक्ष्यों की ओर ले जाते हैं। हमारे सामने आने वाली परिस्थितियां ही हमें कर्म के लिये प्रेरित करती हैं और हमें हमारे मुख्य लक्ष्य तक पहुंचने में परिस्थितियों वश छोटे-छोटे लक्ष्यों की पूर्ति करनी होती है। जीवन लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग में हम जो छोटे-छोटे लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं वही तो जीवन का आनंद है। सम्पूर्ण जीवन में समयानुसार लक्ष्य एवं उस तक पहुंचने के साधन परिवर्तित होते रहते हैं। जैसे ज्ञान प्राप्ति के लिये विद्या अध्ययन करना होता है। कभी-कभी यह कृपा जन्म से ही किसी-किसी को मिल जाती है। जैसे प्रहलाद, धु्रव, लव-कुश आदि। अत: यदि हमारा लक्ष्य ज्ञान प्राप्त करना है तो साधन है विद्या और ज्ञान का सागर तो अथाह है किंतु यह आपकी तृप्ति पर आधारित है। कबीर का मानना था कि ज्ञान अर्जन के लिये वेद-पुराण के स्थान पर ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ लो तो आपको तृप्ति मिल जावेगी। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि यदि कबीर को ढाई अक्षर के प्रेम में उनको ईश्वर दिखता है तो आपको भी दिखे। हमारा वाङ्गमय अनेक महामानवों से समृद्ध है। सभी के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं जिस प्रकार गुरू द्रोण के लिये सभी उनके शिष्य समान थे। किंतु जब सभी को चिड़िया की आंख का लक्ष्य दिया गया तो मात्र अर्जुन को छोड़कर सभी को चिड़िया की आंख के साथ-साथ अन्य सब कुछ भी दृष्टिगत हो रहा था। मात्र अर्जुन ही ऐसे थे जिनको चिड़िया की आंख ही दिखाई दे रही थी अत: आचार्य द्रोणा ने अकेले अर्जुन से ही लक्ष्य को भेदने को कहा और उन्होंने लक्ष्य का भेदन भी किया। मीरा, तुलसीदास, रेदास, कबीर आदि भक्ति रस के समस्त महान विद्वानों, विद्यावानों का लक्ष्य तो एक था किंतु पहुंचने के मार्ग भिन्न-भिन्न थे। जिस प्रकार हिमालय से निकली समस्त नदियों को मिलना तो समुद्र में ही है किंतु मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। अत: आप स्वयं भी स्वयं को तृप्त करें। यहां एक कहानी याद या रही है जो इस विषय को और अधिक प्रकाशित करेगी। एक प्रतापी राजा था। वीर था, साहसी था, पर व्यथा से नहीं बच सका था। व्यथा के कारण परेशान रहने लगा था। एक बार वह व्यथा के विषयों पर विचार करने के लिए वन की ओर निकल पड़ा। वह रथ पर था, तभी उसे एक बांसुरी की तान सुनाई दी। वह मीठी तान सुनकर राजा ने सारथी से रथ धीमा करने को कहा और बांसुरी के स्वर के पीछे जाने को कहा। कुछ दूर जाने पर राजा ने देखा कि झरने के पास स्थित वृक्षों की आड़ में एक चट्टान पर बैठा व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था। पास ही उसकी भेड़ें घास चर रही थी। राजा ने कहा, 'आप तो इस प्रकार प्रसन्न होकर बांसुरी बजा रहे हैं, जैसे कि आपको किसी देश का साम्राज्य मिल गया हो।' युवक बोला, 'श्रीमान आप प्रार्थना करें। भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दें। मैं तो अभी भी सम्राट हूं। साम्राज्य मिलने पर कोई सम्राट नहीं होता, परन्तु सेवक बन जाता है।' युवक की बात सुनकर राजा चकित रह गए। तब युवक ने कहा, 'सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। व्यक्ति संपत्ति से स्वतंत्र नहीं होता, परन्तु परम सत्ता का चिंतन करने से स्वतंत्र होता हैं तब उसे किसी भी प्रकार की चिंता नहीं होती है। वही परमसत्ता सम्राट को भी सूर्य की किरणें देती हैं, मुझे भी। उन्हें भी  जल देती हैं, मुझे भी। ऐसे में मुझमें और सम्राट में मात्र संपत्ति का ही अन्तर है। बाकी सब कुछ तो मेरे पास भी है।' जब राजा ने अपना परिचय दिया तो युवक सकुचा गया, किंतु उसकी बातों से राजा की व्यथा का समाधान हो जाने के कारण राजा ने उसे सम्मानित किया। राजा ने कहा, ?मुझे अनेक व्यथाओं ने घेर रखा था। पर मुझे अब समझ में आया है कि व्यथा नहीं करना चाहिए। हम सब भिन्न हैं। कुछ अर्थो में दूसरों से निम्न हैं, तो कुछ अर्थो में उनसे श्रेष्ठ। हमें स्वयं को व्यर्थ की व्यथाओं से मुक्त रहना सीखना चाहिए।

- ब्रह्मचारी गिरीश
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।

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