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कार्पोरेट लोकतंत्र जिंदाबाद....

कार्पोरेट लोकतंत्र जिंदाबाद....

admin | पोस्ट किया गया 1493 दिन 19 घंटे पूर्व
18/07/2015
भारत को विशाल और परिपक्व लोकतंत्र कहने वालों को एक बार फिर से विचार करना पड़ेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्रित करके जिस तरह से चुनाव लड़ा और जीता गया, उसे कारपोरेट चुनाव की संज्ञा दी गई। सोशल मीडिया पर वेतनभोगी प्रचारकों का कब्जा, मीडिया की खरीद-फरोख्त, कारपोरेट घरानों का हर कदम पर साथ, रणनीति कक्ष के बजाय वार रूम। क्या इसे लोकतंत्र कहा जा सकता है और क्या जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के तहत हो रहा है? अब बिहार के चुनाव सामने हैं और अबकी बार मोदी सरकार के बजाय एक बार फिर नीतीश कुमार। हर हर मोदी के बजाय घर-घर दस्तक। चाय पर चर्चा की जगह परचा पर चर्चा। हैलो, मैं अटल बिहारी वाजपेयी बोल रहा हूं के स्थान पर हैलो, मैं नीतीश कुमार बोल रहा हूं। ये सुनाई दे रहे हैं। यानि पिछले लोकसभा चुनाव की सफलता ने डाल दी नई परंपरा। आ गया नया फंडा। लोकतंत्र बनाम कार्पोरेट। अब कॉर्पोरेट चुनाव क्या होते हैं? यही कि चुनाव में सिर्फ और सिर्फ एक ही उम्मीदवार दिखेगा, जो सर्वोच्च पद का प्रत्याशी होगा। हर जगह उसकी उपस्थिति होगी, आभासी, पोस्टर-बैनर और नारों के माध्यम से। दूसरे भी बहस तो करेंगे, परंतु केंद्र में वही एक व्यक्तित्व होगा। सोशल मीडिया में वेतनभोगी कार्यकर्ता उसकी प्रशंसाओं के पुल बांधेंगे। उसकी आलोचना करने वालों के साथ बदसलूकी की जाएगी। ऐसी भाष का उपयोग किया जाएगा, जिसे हम स्वयं अपने लिए नहीं सुन सकते। यह हो चुका है और केंद्र में सरकार बनने के बाद भी लगातार हो रहा है। चुनाव प्रचार के सिलसिले में नए विचार, इनोवेटिव प्लान, नए नारे और सोशल मीडिया के लिए नए स्लोगन गढ़े जाएंगे। सही बात तो यह है कि पिछले वर्षों में चुनाव को युद्ध के रूप में देखा जाता था। सामंती पृष्ठभूमि वाले क्षेत्रों में हाथी-घोड़ों से सज्जित सेनाओं जैसे विवरण दिए जाते थे। पर जब एक साथ तीस-चालीस केंद्रीय नेता एक ही दिन, एक ही समय, विभिन्न् निर्वाचन क्षेत्रों में प्रचार करते तो पार्टी कहती थी कि वह कारपेट बॉम्बिंग (मैदानी हमला) करेगी। कांग्रेस पार्टी ने अपने अलग से बनाए गए चुनाव प्रचार दफ्तर का नाम वॉर रूम रखा हुआ था। पर पिछले साल सब बदल गया। चुनावी आचार संहिता की बाधाओं, अखबार-टीवी को पेड न्यूज देने के मामले में न्यायालयीन परेशानियों के तात्कालिक हल खोजे गए। सरकारों ने छह महीने पहले ही सरकारी पैसे से अपना ढोल पीटना शुरू कर दिया। विज्ञापनों की न रुकने वाले झड़ी लगा दी गई। क्या चुनावों और स्टॉक एक्सचेंज में पब्लिक इश्यू, जिसे कि आईपीओ के नाम से अधिक जाना जाता है, उसमें भी समानताएं होती हैं? दोनों की तैयारी में कम से कम छह महीने लगते हैं। कुछ कानूनी प्रक्रियाएं, कुछ प्रचार-प्रसार। पंद्रह दिन का असली खेल और फिर तमाशा खत्म, खेल जारी। पब्लिक इश्यू बाजार के हवाले और चुनाव के बाद सरकार भगवान भरोसे। लहर चल गई तो हनीमून पीरियड थोड़ा लंबा। एकतरफा संवाद! भारत में हर तरफ हर समय चुनाव होते ही रहते हैं। हर महीने, हर साल, कभी लोकसभा तो उसके बाद विधानसभा, जिला परिषद, नगर पालिका, पंचायत, इतना ही नहीं, छात्रों के लिए छात्रसंघ के चुनाव। सहकारी समितियों में, आवासीय परिसरों में भी चुनाव। इन सभी चुनावों में पैसा चलता है, लेकिन ये सभी चुनाव अभी आभासी नहीं हुए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के दिल्ली विधानसभा के चुनाव कई अर्थों में न केवल व्यक्ति-केंद्रित, बल्कि सोशल मीडिया से सम्मोहित चुनाव थे। प्रचार की तकनीक और चमक-दमक के लिहाज से अव्वल दर्जे के थे। नए-नए प्रयोग सफलता की ओर लेकर गए। वेबसाइटों की जगह एप आ गए। क्या भारत में आने वाले दिनों में चुनावों की तस्वीर और उनकी रूपरेखा भी इनके अनुरूप बदलेगी? अब बात करें लोकतंत्र यानि प्रजातंत्र की। लोकतंत्र में चुनाव सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार होते हैं। चुनावों के बाद राजनीतिक पार्टियां सरकार के खिलाफ संघर्ष करती हैं, राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदारी भी लेती हैं। इसको वोट, जेल और फावड़ा यानी सरकार, संघर्ष और निर्माण से जोड़ा गया। चुनाव में आम जनता की पूरी हिस्सेदारी होती है। उसका सम्मान होता है। चुनाव के बाद उसके प्रति जवाबदेही होती है। सत्ता के बजाय संगठन महत्वपूर्ण होता है। सत्ता में बैठे लोगों पर उसका अंकुश होता है। वह उसकी स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण करता है। वह जनता और सत्ता के बीच सेतु होता है। सत्ता में आने वाली बुराइयों को रोकता है। सामूहिक निर्णय की बात की जाती है। व्यक्तिवाद के बजाय समूहवाद को प्राथमिकता दी जाती है। परंतु अब पूरा दृश्य ही बदल चुका है। चुनाव से पहले भी चुनाव होते हैं। पहला चुनाव पार्टी या गठबंधन की पार्टियों के भीतर होता है। विपक्ष से लडऩे से पहले पार्टी के भीतर विपक्षी गुट को झुकाया जाता है। एक मजबूत नेता का मिथक इसी तरह बुलंद होता है। इस तरह का नेता पार्टी-सरकार पर अपनी पकड़ भी मजबूत रखता है। चुनाव अब बहुत कुछ अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज पर अध्यक्षीय प्रणाली वाले होते जा रहे हैं। बिहार में आज अगर गठबंधन के तहत निर्मित हुई साझा समझ के बावजूद नीतीश कुमार एकल चुनाव प्रचार करने को उद्यत हैं और इससे लालू खेमा बेचैनी महसूस करता है तो यह नए प्रकार के चुनावों की आहट ही है। भाजपा ने लोकसभा चुनावों से पहले लालकृष्ण आडवाणी को दरकिनार कर नरेंद्र मोदी को अपना चुनावी चेहरा चुना था। इस पर भाजपा में बहुत सिर-फुटौव्वल भी हुई। आम आदमी पार्टी किस हद तक अरविंद केजरीवाल का पर्याय बने ना बने, इसको लेकर पार्टी में जो कुछ हुआ, वह भी सबने देखा। अब अगर बिहार में लालू यादव जहर का घूंट पीकर भी अपने छोटे भाई नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मान रहे हैं तो यह उस बदली हुई चुनावी हवा का ही परिणाम है, जिसमें अब दल नहीं व्यक्ति प्रमुख हो गया है, ब्रांडिंग प्रमुख हो गई है और जिसके लिए एक चुनाव जिताऊ चेहरे की दरकार होती है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, परंतु ये परिवर्तन यदि समाज या राष्ट्र के हित में हों, तो ही अच्छे माने जाते हैं। जब समाज में बुनियादी बदलाव आ रहे हों तो राजनीति भला कब तक उससे अछूती रह सकती है? आज सफलता ही मूल्य है और सफलता ही सिद्धांत है। लिहाजा चुनावों में भी चमक होगी, पर मुद्दे नहीं होंगे। चुनावी एक्सप्रेस में टीवी कार्यक्रम लाइव होंगे, लेकिन उनमें समाचार नहीं होंगे। नागरिक मसले नहीं होंगे, उनके अधिकार-कर्तव्य की चर्चा नहीं होगी, बस एक व्यक्ति-विशेष के पर्सनैलिटी कल्ट को भुनाया जाता रहेगा। पदयात्राएं, प्रभातफेरियां, कार्यकर्ताओं द्वारा वैचारिक बहसें, टूटी साइकिलें, खटारा जीप, इकलौते माइक से प्रचार अब चुनावों के नए शास्त्र का हिस्सा नहीं हैं। जनसभाएं लगातार घटती जाएंगी और भव्य रैलियां उनकी जगह लेती जाएंगी, जो एकल नायकत्व का महिमामंडन करेंगी। सोशल मीडिया उन्मादग्रस्त समर्थकों को एक विशेष श्रेणी में रखता है, जैसे कि भक्त। ये भक्तगण मानते हैं कि उनका भगवान कभी गलत नहीं हो सकता और यह उनका कर्तव्य है कि वे सोशल मीडिया पर उसकी भरसक रक्षा करें। और विरोध करने वाले का गला ही काट दें। यह है हमारा कार्पोरेट लोकतंंत्र और जनता खुश। कोई कर भी क्या सकता है। एक नायक और मु_ीभर उसके प्रोजेक्टर। अब हो गया चुनाव, बन गई सरकार। नया नाम, नया कांसेप्ट और नया जमाना। कार्पोरेट लोकतंत्र जिंदाबाद। -संजय सक्सेना
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