महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा

भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा

admin | पोस्ट किया गया 172 दिन 4 घंटे पूर्व
01/04/2019
भोपाल (महामीडिया) वे समाजशास्त्र और मनोविज्ञान पढ़ाते हैं, किन्तु इन विषयों का अध्यापन अत्यन्त सतही स्तर पर होता है और आदर्श समाज की स्थापना इससे नहीं हो पाती है। अभी लोग कैसा व्यवहार करते हैं इसकी समीक्षा होती है न कि व्यवहार कैसा होना चाहिये, जो कि प्रकृति के विधानों की ऊर्ध्वगामी शक्ति से समन्वय स्थापित करे। लोगों के व्यवहार पर आधारित बनाये गये नियम, प्रशासन व व्यवहार की दृष्टि से अत्यन्त सतही है। प्रशासन का कौशल होगा-संपूर्ण सामूहिक जनसंख्या में ऐसा कुछ करना जिससे व्यक्तिगत वृत्तियां एवं प्रवृत्तियां कभी त्रुटिपूर्ण नहीं होंगी। सकारात्मकता का वह उच्च स्तरीय प्रभाव निर्मित करें। सुसंबद्धता का वह उच्च स्तरीय प्रभाव बनायें ताकि व्यक्तिगत वृत्तियां एवं प्रवृत्तियां कभी गलत न होने पायें। व्यक्तिगत चेतना को प्रबुद्धता के स्तर तक लाया जाये जहां व्यक्ति का मस्तिष्क प्रकृति के विधानों के पूर्णतया तादात्म में हो, तब ऐसे व्यक्ति का निर्माण होगा, जो प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करेगा। इस प्रकार का प्रभाव हम पूरी जनसंख्या में उत्पन्न करना चाहते हैं एवं यह प्रभाव विश्व में 7000 के एक समूह द्वारा उत्पन्न होगा जो कि संपूर्ण विश्व की सामूहिक चेतना को शुद्ध और सात्विक रखेगा। केवल एक नया बीज ही नई फसल उत्पन्न करेगा- 'अब हमसे किसी देश के बुद्धिमान, ऊर्जावान प्रधानमंत्री पूछ सकते हैं कि 7000 के एक समूह से यह कैसे सम्भव हो सकता है? मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूँ। इसका उत्तर यह होगा कि विश्व में प्रत्येक प्रधानमंत्री को वह जानना चाहिए, जिसे वे अभी तक नहीं जानते हैं, क्योंकि जो भी अब तक वे जानते हैं, वह फलदायक नहीं है। किसी सरकार में प्रशासन का जो भी ज्ञान है, एक अत्यन्त वरिष्ठ राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री में जो भी बुद्धिमत्ता है, जो भी ज्ञान है, जो भिन्न है। हम बहुत स्पष्टतया सबसे कहना चाहते हैं कि यदि वे एक नयी फसल चाहते हैं, नये परिणाम चाहते हैं, तो उन्हें एक नये बीज का रोपण करना ही चाहिए। उन्हें कुछ नया सीखना ही चाहिए, वे अब तक नहीं जान पाये हैं। हमारे साथ एक बार प्रयोग करें, आप पहले से उत्तम स्थिति में होंगे। सामूहिक चेतना की इस विशेषता को सुनें, सकारात्मकता का वह प्रभाव संपूर्ण सामूहिक चेतना में एक बार में उत्पन्न किया जा सकता है एवं आप देखेंगे कि बोझ, आपके प्रशासन का दबाव, कानून व व्यवस्था बनाये रखने का दबाव उतर गया है। जब तक आप अपने राष्ट्र की सामूहिक चेतना में वह सकारात्मकता, वह सत्व उत्पन्न नहीं करते तब तक आप कभी भी कानून एवं व्यवस्था को सफलतापूर्वक अनुरक्षित नहीं कर पायेंगे और यह सब समत्व योग की प्रौद्योगिकी का अभ्यास करने वाले समूहों से ही होगा। अतीत में सरकारें सैकड़ों-हजारों वर्षों में जो कुछ भी करती रही है, यह तो स्पष्ट है कि किसी भी सरकार ने, चाहे उसके पास कोई भी ज्ञान क्यों न हो, एक आदर्श समाज की स्थापना नहीं की है। अब यह समय आ गया है कि प्रकृति के विधानों के ज्ञान के द्वारा हम एक आदर्श राष्ट्र की स्थापना करें एवं एक आदर्श राष्ट्र का मापदंड प्रकृति के विधानों के अनुरूप जीवन होगा, कोई भी व्यक्ति प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करेगा।' उत्कृष्ट भारतीय विरासत- 'हमें केवल 7000 वैदिक पंडितों के एक समूह के साथ प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। हम वैदिक पंडितों पर जोर दे रहे हैं क्योंकि यहां ब्राह्मण परिवारों में गोत्रों में अन्तर्निहित कोमल प्रकृति के विधानों से संचालित होने वाले जीवन की परंपरा है। यहां वशिष्ठ बैठे हैं, विश्वामित्र बैठे हैं एवं उनके साथ वेद का दर्शन पुष्पित है। उन्होंने इस विद्या को अपने पूर्वजों से सीखा है, यह ज्ञान उनके अन्दर बीज रूप मेंं विद्यमान है। तो बीज यहाँ है, हमें इसे केवल उस स्तर पर लाना है जहां से इसे जनमानस को उपलब्ध कराया जा सके। सरकार को अथवा सरकार के शुभ चिन्तकों को 7000 वैदिक पंडितों का एक समूह स्थापित करके उसको संवरन करना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति सरकार का शुभचिंतक है क्योंकि सरकार के शुभचिंतक होने का तात्पर्य प्रथम स्वयं के लिए शुभचिंतक होना है। सरकार क्या है? सरकार प्रत्येक नागरिक को समस्त सुविधाएं प्रदान करने की एक संस्था है। इसलिए जो लोग सरकार की सफलता में रुचि रखते हैं, स्वाभाविक रूप से ये वे लोग हैं जो सरकार द्वारा शासित होते हैं। इसलिए व्यक्ति एवं सरकार के मध्य परस्पर सामंजस्य होता है। इसलिए यह राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है, यह राष्ट्र की सरकार का कर्तव्य है, यह राष्ट्र में सरकारों के सभी स्तरों का कर्तव्य है कि वे ज्ञान के मार्ग का अनुसरण करें एवं राजनीति के घिसे-पिटे मार्ग को छोड़ें क्योंकि राजनीतिक विश्व में सामूहिक चेतना के सिद्धाँत की कमी है, अर्थात् सामूहिक चेतना के निर्वहन करने की कमी है। भारत को विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनाने का हमारा कार्यक्रम एक उत्तम व्यावहारिक कार्यक्रम है, जो प्रकृति के विधानों की ऊर्ध्वगामी सामर्थ्य प्राप्ति का मार्ग अपनायेगा एवं संपूर्ण विश्व को इसका लाभ देगा। यह संपूर्ण मानवता के कायाकल्प का एक अत्यन्त पूर्ण कार्यक्रम है। संपूर्ण मानवता के कायाकल्प से हमारा आशय मानवता को दु:खों से ऊपर उठाना है, जहां जीवन में व्याप्त युगों पुराने दु:खों का वातावरण प्रकृति के विधानों की ऊर्ध्वगामी शक्ति की कमी के कारण है। यही कारण है कि ये विध्वंसक प्रवृतियां विश्व में उदित होती हैं जैसे आतंकवाद, शक्तिशाली राष्ट्रों की यह भयावह शत्रुता, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के युद्ध, राष्ट्रीय स्तर पर विरोधाभास, ये सब प्रकृति के विधानों के ऊर्ध्वगामी प्रभाव की जागृति में कमी के कारण से है।? मानवता का हित भारतीय ज्ञान में निहित है- ?इसीलिए हम भारत के सार्वजनिक जीवन के समस्त नेताओं से सशक्त अपील कर रहे हैं क्योंकि सम्पूर्ण मानवता का हित भारत के ज्ञान में-वेद में-प्रकृति के नियमों में-सृष्टि के संविधान में निहित है। इसलिए भारत में जो लोग जीवन के अभिरक्षक हैं: राजनीतिक नेता, धार्मिक आचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता: स्वास्थ्य, कानून एवं न्याय, पुनर्वास एवं सुरक्षा के अभिरक्षक, समृद्ध नागरिक व निर्माण इकाइयों के स्वामी- यह उन्हीं के लिए है, हम जोर देकर उन्हें समझा रहे हैं कि जो कुछ हमने कहा है वे इसे समझें। यदि आप इसे अभी नहीं समझते तो इस दिशा में अपना ध्यान ले जायें। निश्चित ही वे लाभ में रहेंगे। हजारों वर्षों के इतिहास में युद्ध और नकारात्मक घटनायें दर्ज हैं। हजारों वर्ष से हमारे विश्व का स्याह इतिहास रहा है- प्रकाश की कुछ आशाओं के स्फुरण साथ ही मानवता को यह स्मरण कराना है कि जीवन हल्का, प्रफुल्लित और सकारात्मक हो सकता है। मानव जाति पर सदियों से पड़े इस अपार स्याह बादलों के पार भी हम ज्ञानयुग के स्वर्णिम सूर्योदय और विश्व चेतना में सकारात्मकता के उदय की आशा करते हैं जो कि प्रकृति के विधानों के रचनात्मक सामर्थ्य को समत्व योग की प्रौद्योगिकी के माध्यम से सम्भव किया जा सकता है। इसका परिणाम यह होगा कि भारत विश्व में सर्वोच्च शक्ति होगा एवं उसके पास समस्त राष्ट्रों को निर्देश देने का प्राधिकार होगा, जो सहजता से सभी राष्ट्रों को स्वीकार्य होगा क्योंकि इसके अनुसरण से ही वे अपने लिए सदा अजेयता को सुनिश्चित कर पायेंगे। यह हमारे लिए एक बहुमूल्य प्रात: काल की बेला है, क्योंकि विगत 30 वर्षों से हम व्यक्तियों के लिए समर्पित रहे हैं और आज हम विश्व में सर्वोच्च शक्ति के लिए विचार कर रहे हैं। यह सर्वोच्च शक्ति वर्तमान शक्तियों के लिए हानिकारक नहीं होगी। यह उन शक्तियों की पूर्णता होगी। जैसा कि हमने पूर्व में कहा है कि शक्तिशाली राष्ट्र जो चाहते हैं वह है समस्त लोगों के जीवन में शांति एवं प्रसन्नता। उनके साथ गलत यह है कि वे सोचते हैं कि शांति एवं प्रसन्नता केवल उनके दृष्टिकोण से, केवल उनके मार्ग से ही आ सकती है। साम्यवादी विचारते हैं कि जब तक लोग साम्यवाद के अनुयायी न होंगे, वे प्रसन्न नहीं होंगे। पूँजीवादी सोचाते हैं कि जब तक लोग पूँजीवादी नहीं होंगे वे निर्धनता से मुक्त नहीं हो सकते। किंतु ये दोनों एक दूसरे के सहयोग के बिना सदैव अपूर्ण ही रहेंगे। किसी भी पूँजीवादी राष्ट्र के किसी राष्ट्रपति से पूछो, "क्या उसके पूँजीवादी राष्ट्र में कोई गरीबी नहीं है?" अथवा किसी भी साम्यवादी राष्ट्र से पूछो जिसे साम्यवादी पर गर्व हो। "क्या वास्तव में उनके पास संपूर्ण सामुदायिक चेतना को नियंत्रित करने की तकनीक है?" यदि एक साम्यवादी राष्ट्र के पास सामुदायिक चेतना को नियंत्रित करने की सामर्थ्य नहीं है, यदि वे नहीं जानते कि कैसे शासन करना है, कैसे लोगों की सामूहिक चेतना को नियंत्रित करना है, तो साम्यवाद में तत्व कहां हैं? यदि एक पूँजीवादी राष्ट्र, अपने देश में प्रत्येक व्यक्ति को समृद्ध नहीं बना सकता तो पूँजीवादी के आदर्श में तत्व कहां है? साम्यवाद की वास्तविकता कहाँ है? पूँजीवादी की वास्तविकता कहाँ हैं? और विश्व में किसी भी वाद की वास्तविकता कहाँ है? विश्व में कहीं भी प्रशासन चाहे वह धर्म पर आधारित हो या धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित हो, जब तक वह सामूहिक चेतना में सतोगुण उत्पन्न करने के कार्यक्रम को लागू नहींं करेगा, तब तक प्रत्येक पीढ़ी की सरकारें असफल होती रहेंगी और प्रशासन करने वाले यह सोचते रहेंगे कि वे देश की सेवा कर रहे हैं, बिना यह जाने कि उनकी यह सेवा अज्ञान पर आधारित है। यह सेवा करने का मात्र भ्रम है, यह रोजगार तो दे सकता है किन्तु वास्तव में देश की सेवा से इसका सम्बंध नहीं है जिसमें पोषण और सहायता प्रमुख है, वर्तमान में तो सेवा केवल अहं और प्राधिकार को ही सन्तुष्ट कर पाती है। ...(निरंतर)
(महर्षि महेश योगी जी के तपोनिष्ठ शिष्य)
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