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नवसंवत्सर का महत्व

नवसंवत्सर का महत्व

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 168 दिन 3 घंटे पूर्व
03/04/2019
भोपाल (महामीडिया) नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।
विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है। माना जाता है विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारत से कैलेंडर अथवा पंचाग का चलन शुरू हुआ। इसके अलावा 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में 7 दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है।
हिन्दू नववर्ष भारतीय कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाता है। इसे नवसंवत्सर कहते हैं। नव संवत्सर 2076 की शुरुआत 6 अप्रैल 2019 से प्रारंभ को रही है। इस संवत्सर के आकाशीय मंत्रिमंडल के गठन के अनुसार राजा शनि और मंत्री सूर्य होंगे। नये वर्ष में तीन ग्रहण पड़ रहे हैं। पहला ग्रहण दो जुलाई को खग्रास सूर्य ग्रहण के रूप में पड़ेगा। दूसरा ग्रह 16 जुलाई को खंडग्रास चंद्र ग्रहण के रूप में पड़ रहा है। 26 दिसंबर को तीसरा ग्रहण कंकणाकृति सूर्य ग्रहण के रूप में पड़ेगा। यह ग्रहण बहुत विशेष है, नवरात्र में दुर्गाष्टमी का पर्व 12 अप्रैल और रामनवमी का पर्व 13 अप्रैल का मनाया जाएगा। ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार नए साल में गुरु 10 अप्रैल को वक्री होंगे और मार्गी 11 अगस्त को होंगे। इसी तरह शनि 30 अप्रैल को वक्री और मार्गी 18 सितम्बर को होंगे। पूरे साल में बुध तीन बार वक्री होंगे और तीन बार ही मार्गी होंगे।

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