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वायुः जीवन की सहयात्री

वायुः जीवन की सहयात्री

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 109 दिन 21 घंटे पूर्व
02/05/2019
भोपाल (महामीडिया) "भूचक्रं ध्रुवयोर्नद्व माक्षित्पं प्रवहानिलै:। पर्यात्यजस्त्रं तंत्रद्धाग्रहकक्षा यथा क्रम:।।" सिद्धांत शिरोमणि में लिखा है कि पृथ्वी के बारह-बारह योजन तक जो वायु है उसी में मेघ और विद्युत रहते हैं। वह प्रवह नाम का वायु है और उसकी गति सदा पश्चिमाभिमुख रहती है, उसी में ग्रह और नक्षत्र हैं। वामन पुराण में सात प्रकार की वायु का उल्लेख है, वही मरुत् के गण हैं। (प्रवह, निवह, उद्वह, संवह, विवह, सुवह, परिवह) इंद्र ने इन सातों वायु का आकाश में पथ-विभाग निश्चित कर दिया है। ये सातों ही मरुत् के गण कहे गए हैं। पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार सर्वप्रथम वायु को दिया जाता है जिसके द्वारा पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, मनुष्य तथा सभी जीवित प्राणी जीवन प्राप्त करते हैं। वायु से प्राप्त आॅक्सीजन के द्वारा ही मनुष्य का जीवन सुचारु रूप से क्रियाशील है अन्यथा एक मिनट के सीमित समय में आॅक्सीजन प्राप्त न होने पर मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इसलिए वायु की अनुपस्थिति में जीवन की कल्पना करना भी कठिन कार्य है। पाँच तत्वों में वायु जो सभी में प्रधान है हमारे शरीर में सन्निवेशित कर हमें प्राणवान किए है। वायु, पाँचों तत्वों में प्रधान है। इसके प्रमाण में तैत्तरीय उपनिषद् की यह श्रुति है-
"तस्मादेतस्मादात्मन: आकाश: सम्भूत आकाशाद्
वायुर्वायोरग्निरग्नेराप: अदम्य पृथिवी।"
परमात्मा की कृपा से पहले आकाश का निर्माण हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी हुई। अग्नि, वायु, जल इन तीनों में वायु सभी में प्रधान है। शरीर के एक-एक अवयव हाथ, पाँव, नाक, कान, आँख इत्यादि में किसी एक के न रहने से भी हम जी सकते हैं। पर शरीर में वायु न रहे तो जीवित नहीं रह पायेंगे। जल और पृथ्वी इन्हीं दो तत्वों से इनका निर्माण हुआ है, ये न भी हों तो मनुष्य लूला और लँगड़ा ही जी सकता है। ऐसा ही हमारे दोनों नेत्र तेजस पदार्थ हैं, न भी हों तो हम अंधे हो जीते रहेंगे। किंतु एक मिनट भी मुँह और नाक बंद कर श्वास बंद कर दिया जाए तो तत्क्षण हम मूर्छित हो जाएँगे। प्राणी-मात्र के लिए वायु तो जीवन है ही वरन् पेड़-पौधे भी हवा न लगने से हरे-भरे नहीं रह सकते। वायु जिसे हम नेत्र से नहीं देख सकते किंतु विचित्र शक्ति, अद्भुत कल्पनाशाली सर्वेश्वर ने उसके ज्ञान
के लिए ज्ञानेन्द्रियां हमें दी हैं किंतु दूसरी इंद्रियों से वायु को हम प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। दार्शनिकों ने शब्द गुण आकाश माना है। मछली आदि जल-चर जंतु जिस प्रकार अनंत, अगाध समुद्र में रहते हैं वैसे ही हम विपुल वसुंधरा के ऊपर इसी विशाल वायु सागर में रहते हैं। मृदु-मंद गामी समीरन वृक्षों के पत्तों को कँपाता है थके-माँदे मनुष्य को शीतल और पुलकित गति प्रदान करते हुए चलती है, तब हम उसकी गति का अनुमान करते हैं किंतु प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। जब यह घोर गंभीर गर्जन से दिग्मंडल को पूरित करता अपने प्रबल आघात से ऊँचे-ऊँचे पेड़ों को उखाड़ डालता है उस समय हम वायु के केवल अस्तित्व मात्र से नहीं वरन इसकी असाधारण शक्ति से परिचित होते हैं। यूरोप के विज्ञान-वेत्ताओं ने परीक्षा द्वारा प्रमाणित कर दिया है कि शब्द आकाश का गुण नहीं है किंतु शब्द भी वायु का गुण है। एक बोतल जिसकी (हवा, वायु) निष्कासन यंत्र द्वारा निकाल ली गई है उसमें कंकड़ भर हिलाओं तो शब्द न होगा। इससे यह बात स्पष्ट है कि बोतल के भीतर आकाश के होते भी जो शब्द नहीं होता तो शब्द वायु का गुण है। केवल इतना ही नहीं कि वायु जगत का प्राण है, 'जगत्प्राण समीरण:' वायु का नाम है अपितु इसमें अनेक गुण हैं। उत्तम गंध वहन कर घ्राण इंद्रिय को तृप्त करता है 'सुरभिर्घ्राणतर्पण:' वह सुगंधि का नाम वायु ही के कारण पड़ा है। इस भू-पृष्ठ पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ वायु न हो, अतल स्पर्श सागर, अंधकार मय शून्य गुफा, अत्युच्च पर्वत श्रृंग, सब ठौर इसका अस्तित्व है। सूर्य-सिद्धांत में लिखा है समस्त राशि-चक्र प्रवह वायु द्वारा आकृष्ट हो अपनी-अपनी कक्षा में निरंतर भ्रमण करते हैं। उसी राशि-चक्र में बँधे हुए सूर्यादिग्रह अपनी-अपनी नियमित कक्षा पर नियमित चाल से चला करते हैं। हमें जीवित रहने के लिए प्रतिदिन औसतन 350 लीटर आॅक्सीजन की आवश्यकता होती है, जिसे हम 8500 से 9000 लीटर वायु का शोषण करके प्राप्त करते हैं। किसी शारीरिक के कार्य तथा तीव्र गति से कार्य करते समय हमारी कोशिकाएँ आॅक्सीजन की अधिक मात्रा का संचय करती हैं जिससे हमारी साँस तीव्रता से चलने लगती है। आॅक्सीजन के अभाव से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। हमारे जीवन को असंतुलित कर सकती है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि के लिए नित्य प्राणायाम करके संतुलन बनाया जा सकता है। हमारे जीवन में जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में तृष्णा, कामना तथा बाधाएँ उत्पन्न होकर जीवन में असंतोष तथा भटकाव की स्थिति उत्पन्न करती हैं जिससे जीवन कष्टदायक व असंतुलित हो सकता है। भावातीत ध्यान का नियमित प्रात: एवं संध्या 15 से 20 मिनट अभ्यास ऐसा प्रयास है, जिसके द्वारा सत्य की परख करके कष्टकारी मानसिकता से मुक्ति प्राप्त कर जीवन संतुलित बनाया जा सकता है। भावातीत ध्यान का अभ्यास करने के साथ उसके अनुभव भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभ्यास करने में कुछ समय लगता है अनुभव में अधिक परन्तु अनुभव हो जाने पर सम्पूर्ण जीवन आनन्दित हो सकता है और अनुभव से ही सफलता प्राप्त होती है।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
-ब्रह्मचारी गिरीश

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