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महर्षि महेश योगी जी ने प्रथम दर्शन में अपना गुरू चुन लिया था- ब्रह्मचारी गिरीश

महर्षि महेश योगी जी ने प्रथम दर्शन में अपना गुरू चुन लिया था- ब्रह्मचारी गिरीश

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 132 दिन 5 घंटे पूर्व
11/05/2019
भोपाल (महामीडिया) यदि यह कहा जाए कि महर्षि महेश योगी जी के जन्म से ही उनका कृतित्व का आंदोलन प्रारंभ हुआ तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। महर्षि जी का संपूर्ण युग ज्ञान से भरा पड़ा है। एक छोटे से गांव एवं एक छोटे से घर में जन्म लेने के बावजूद महर्षि महेश योगी ने पूरे विश्व में जो ज्ञान का अलख जगाया वह किसी से छिपा नहीं है। वह अपने शैक्षणिक जीवन में प्रतिदिन 15 घंटे साईकिल चलाया करते थे। जबलपुर जब वे आये तो गुरू की खोज में लग गये। एक दिन वर्षाकाल के समय जबलपुर में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती पधारे हुए थे। प्रतिदिन सायं को पंद्रह मिनट का समय दर्शन हेतु मिलते थे। गुरूदेव ब्रह्मानंद सरस्वती मात्र पांच मिनट में सभी प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे। एक दिन महर्षि महेश योगी जी को ब्रह्मानंद सरस्वती जी के दर्शन का अवसर मिला। उन्होंने बिना अपने गुरू को सुने तय कर लिया कि उनकी खोज पूरी हो गई है और उन्होंने दर्शन मात्र से ब्रह्मानंद सरस्वती जी को अपना गुरू मान लिया। गुरू मिल जाने के पश्चात् महर्षि महेश योगी जी फिर अनवरत विश्व साधना में लग गये और कभी घर वापस नहीं लौटे। उक्त विचार आज महर्षि विद्या मंदिर विद्यालय समूह के चेयरमैन ब्रह्मचारी गिरीश जी ने महर्षि सेंटर फार एजूकेशनल एक्सीलेंस परिसर लांबाखेड़ा, भोपाल में महर्षि वैदिक जीवन प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए व्यक्त किये।
ब्रह्मचारी गिरीश जी ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि बद्रिका आश्रम हिमालय की पीठ का शंकराचार्य 165 वर्षों तक कोई नहीं बन पाया क्योंकि वैदिक स्कालरों को कोई उपयुक्त विद्वान मिला ही नहीं। 1941 में ब्रह्मानंद सरस्वती जी को शंकराचार्य घोषित किया गया। महर्षि महेश योगी जी कहा करते थे गुरूदेव का ज्ञान नंबर वन एवं गुरूदेव की ब्लेशिंग नंबर दो। जब पूरी दुनिया में संचार का कोई साधन नहीं था तब के दौर में इतने देशों में यात्राओं का प्रबंध और ज्ञान का प्रचार-प्रसार कितना कठिन कार्य था। 124 देशों में न केवल यात्रा बल्कि संस्थाओं, स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी की स्थापना की। इसलिए हमें मैं एक छोटे से गांव से हूं, मैं एक गरीब परिवार से हूं, इन सब बातों को ध्यान में रखे बिना हमें संकल्प लेना चाहिए और लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। मैं स्वयं कई बार महर्षि जी से पूछा करता था जिस पर उनका कहना था धक्के तो लगेंगे, ठोकरें तो लगेंगी, किन्तु इनसे रूकना नहीं है। बिना किसी पारिवारिक सहायता, बिना किसी स्पांसरशिप के 124 देशों की यात्रा करना और निरंतर संवाद स्थापित करना। बसुधैव कुटुम्बकम अर्थात संपूर्ण विश्व मेरा परिवार है की अवधारणा को महर्षि महेश योगी जी ने इस धरा पर फलीभूत किया। इसलिए क्रिया की सिद्धि उपकरणों से नहीं बल्कि सतोगुणी चेतना से होगी। 
9 मई से 13 मई तक चलने वाले इस महर्षि वैदिक जीवन प्रशिक्षण कार्यक्रम में संपूर्ण देश के विभिन्न क्षेत्रों से महर्षि स्कूलों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों का चयन किया गया है, जिनकी संख्या 140 है। इस नौ दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन महर्षि वैदिक प्रशासन प्रशिक्षण संस्थान एवं महर्षि विश्व शांति आंदोलन द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। कार्यक्रम में महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भुवनेश शर्मा, निदेशक संचार एवं जनसंपर्क व्ही.आर. खरे एवं महामीडिया के संपादक नीतेश परमार उपस्थित थे।

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