महामीडिया न्यूज सर्विस
भावातीत ध्यान स्वयं का ज्ञान

भावातीत ध्यान स्वयं का ज्ञान

admin | पोस्ट किया गया 16 दिन 17 घंटे पूर्व
01/02/2019
भोपाल (महामीडिया) एक संत थे बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं लोकसेवी। जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में लगे रहते। एक बार विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। संत साधनारत थे। साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान किया, आसन दिया। देवतागण बोले- 'आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान माँग लें।' संत विस्मय से बोले- 'सब तो है मेरे पास। कोई इच्छा भी नहीं है, जो माँगा जाए।' देवगण एक स्वर में बोले- 'आप को माँगना ही पड़ेगा अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा।' संत बड़े असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है माँगे तो क्या माँगे, बड़े विनीत भाव से बोले- 'आप सर्वज्ञ हैं, स्वयं समर्थ हैं, आप ही अपनी इच्छा से दे दें मुझे स्वीकार होगा।' देवता बोले- 'तुम दूसरों का कल्याण करो!' संत बोले- 'क्षमा करें देव! यह दुष्कर कार्य मुझ से न बन पड़ेगा।' देवता बोले- 'इसमें दुष्कर क्या है?' संत बोले- 'मैंने आज तक किसी को दूसरा समझा ही नहीं सभी तो मेरे अपने हैं। फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा?' देवतागण एक दूसरे को देखने लगे कि संतों के बारे में बहुत सुना था आज वास्तविक संत के दर्शन हो गये। देवताओं ने संत की कठिनाई समझकर अपने वरदान में संशोधन किया। 'अच्छा आप जहाँ से भी निकलेंगे और जिस पर भी आपकी परछाई पड़ेगी उस उसका कल्याण होता चला जाएगा।' संत ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की- 'हे देवगण! यदि एक कृपा और कर दें, तो बड़ा उपकार होगा। मेरी छाया से किसका कल्याण हुआ कितनों का उद्धार हुआ, इसका भान मुझे न होने पाए, अन्यथा मेरा अहंकार मुझे ले डूबेगा।' देवतागण संत के विनम्र भाव सुनकर नतमस्तक हो गए। कल्याण सदा ऐसे ही संतों के द्वारा संभव है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहा करते थे प्रकृतिमय हो जाओ अर्थात आप स्वयं को आनंदित करें। जिस प्रकार समस्त प्रकृति निरंतर आनंदित रहते हुए उन्नतिपथ की ओर अग्रसर होते हैं। ऐसे ही हम सभी को आनंदित व सकारात्मकता के साथ प्रगति का प्रयास करना है। परमार्थ करना है बिना किसी कुटिलता, द्वेष और घृणा से बचते हुए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ही प्रगति का सूचक है। आज की नकारात्मक प्रतिस्पर्धा से बचना अत्यंत कठिन है। एक तो काल का प्रभाव और प्रदूषित वातावरण के कारण एक लक्ष्यहीन दौड़ में हम सब दौड़े जा रहे हैं। संभवत: किसी को लक्ष्य की चिंता ही नहीं या दौड़ प्रारम्भ करने के पहले लक्ष्य का चयन भी नहीं किया और अनवरत दौड़े जा रहे हैं। रूकिये थोड़ा, स्वयं को इस लक्ष्यहीन प्रतिस्पर्धा से अलग कीजिये और शांत मन व मस्तिष्क को स्वयं की चेतना से प्रकाशित कीजिये यही चेतना का प्रकाश आपकी सच्ची प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हुए आपके जीवन को आनंद से भर देगा। विश्वास कीजिये मात्र 15 से 20 मिनट प्रात: एवं सन्ध्या के समय स्वयं के लिये आरक्षित कीजिये, भावातीत ध्यान का अभ्यास कीजिये। सम्भवत: आपको आपका लक्ष्य ज्ञात हो जाये जो आपने स्वयं ने स्वयं के लिये निश्चित किया था या नहीं किया था तो आपको स्वयं में स्थित संभावनाओं के आधार पर आप अपना लक्ष्य चिन्हित कर पायेंगे जो आपके जीवन को नियमित संयमित करते हुए आपको विकास के मार्ग पर आपका सहयात्री बनेगा, तभी तो जीवन आनंदित होगा आनंद की कामना के साथ।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
-ब्रह्मचारी गिरीश
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