महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा

भारत विश्व का सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र होगा

admin | पोस्ट किया गया 16 दिन 17 घंटे पूर्व
01/02/2019
भोपाल (महामीडिया) एक शक्तिशाली व्यक्ति से तात्पर्य अभी तक उसे माना जाता रहा है, जो किसी भी वस्तु को नष्ट कर सके, किंतु अब ज्ञानयुग के उदय काल में शक्ति को एक विभिन्न रूप में जाना जायेगा। शक्ति को पोषण करने की सामर्थ्य के रूप में समझा जायेगा, जीवन देने के रूप में समझा जायेगा न कि जीवन को मृत्यु में बदलने की क्षमता के रूप में। किसी की मृत्यु कर देने की शक्ति विनाश की शक्ति है, यह शक्ति विरोधी है, शक्ति की मर्यादा के विपरीत है, किंतु अज्ञानता के युग में सभी चीजें उलट-पलट हो गयी हैं। जब हम विश्व में भारत को सर्वोच्च शक्ति बनाने जा रहे हैं, तो हमें यह समझना ही चाहिए कि सभ्यता नवीन आचार संहिता से शासित होने जा रही है। लोग नये नियमों से शासित होने जा रहे हैं, सरकारें नये नियमों से शासित होने जा रही हैं। सरकार-राष्ट्र का निर्मल दर्पण- 'जब हम विश्व में सर्वोच्च शक्ति की बात कर रहे हैं, तब स्वाभाविक रूप से सर्वोच्च शक्ति भारत होगा और इसकी अभिरक्षक भारत सरकार होगी। क्योंकि भारत एक मात्र राष्ट्र है जो समस्त राष्ट्रों के लिये श्वांस लेता है- "वसुधैव कुटुम्बकम" विश्व हमारा परिवार है। यदि हम संपूर्ण राष्ट्र को देखना चाहते हैं तो सरकार को देखते हैं। यदि हम सरकार को देखना चाहते हैं तो प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति को देखते हैं, जो भी प्राधिकार के क्रियान्वयन का प्रभारी हो। इस प्रकार संपूर्ण राष्ट्र में एक व्यक्ति होता है जिसमें संपूर्ण राष्ट्र जीवंत होता है। एक देश का प्रधानमंत्री निश्चित रूप से एक व्यक्ति है किंतु यह एक व्यक्ति में राष्ट्रीय संगठन है। जब एक प्रधानमंत्री बोलता है तो यह राष्ट्र की आवाज होती है जो राष्ट्र की सामूहिक चेतना द्वारा निर्देशित होती है। राष्ट्र का प्रमुख राष्ट्र का एक निर्मल दर्पण है। वह केवल उसे ही परिलक्षित कर सकता है जो वास्तव में राष्ट्रीय जीवन में राष्ट्र में है। इस प्रकार सरकार अथवा प्रधानमंत्री राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब भारत विश्व में सर्वोच्च शक्ति होगा, तब भारत की सर्वाेच्च शक्ति भारत के प्रधानमंत्री में निहित होगी। प्रधानमंत्री के प्रत्येक शब्द को विश्व की संपूर्ण जनसंख्या द्वारा आदर, सम्मान एवं श्रद्धाभाव से लिया जायेगा। विश्व में सर्वोच्च शक्ति भारत के प्रधानमंत्री में जीवंत होगी। जब यह परिस्थिति निर्मित होगी, तब स्वाभाविक रूप से जीवन नवीन सिद्धांतों द्वारा संचालित होगा।? जीवन संचालन के नये सिद्धांत- ?भारत में जीवन नये सिद्धांतों द्वारा शासित होगा, भारत का मस्तिष्क एक ब्रह्मांडीय मस्तिष्क होगा, प्रकृति के नियमों से संचालित मस्तिष्क भारत की सामूहिक चेतना वैश्विक चेतना के साथ पूर्ण समन्वय में होगी, समत्व योग के स्तर पर होगी। जब समय विश्व परिवार से सर्वोच्च शक्ति के उदय की मांग करता है, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समय जीवन के नवीन सिद्धांतों को वास्तविकता में जागृत करना चाहता है। पूर्व में जीवन जीने के लिये सिद्धांतों एवं भविष्य में जीवन जीने में प्रयोग किये जाने वाले सिद्धांतों में मूलभूत अंतर है। यह मूलभूत अंतर मानव मस्तिष्क का प्रकृति के विधानों की पूर्ण रचनात्मक सामर्थ्य के साथ समन्वय स्थापित करने वाला होगा। मस्तिष्क का प्रकृति के विधानों के अनुरूप होना विश्व परिवार का सामान्य अनुभव होगा।
जब व्यक्ति प्रात: एवं सन्ध्या भावातीत ध्यान का अभ्यास करते हैं तो पूरे दिन वे अपने विचारों एवं कार्यों में प्रकृति के नियमों को प्रदर्शित करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उनके विचार एवं कार्य प्रकृति के नियमों के अनुसरण में होते हैं एवं इसीलिए वे विचार एवं कार्य पूर्णतया ऊर्ध्वगामी होते हैं। जब पूरे देश के नागरिक प्रकृति के विधानों की उर्ध्वगामी प्रकृति में जीवंत होंगे, केवल तभी राष्ट्र विश्व में सर्वोच्च शक्ति होगा एवं केवल तभी राष्ट्र की सरकार का राष्ट्रों के परिवार पर नियंत्रणात्मक स्वर होगा। यह स्वर उन सर्वोच्च शक्ति की तरह नियंत्रणात्मक स्वर नहीं, जो निरंतर विश्व परिवार में भय उत्पन्न करते हैं, उस प्रकार का प्राधिकार एवं नियंत्रणात्मक स्वर नहीं, बल्कि एक मां का-एक मातृशक्ति का स्वर होगा। भारत- भारतमाता संपूर्ण विश्व की माता होंगी। भारतीय राष्ट्रीय चेतना से समस्त राष्ट्रों के लिए जीवन परक प्रभाव उत्सर्जित होगा, भारतीय राष्ट्रीय चेतना समस्त राष्ट्रों के लिये अजेयता का प्रसार करेगी।' प्रकृति के नियमों का नियंत्रणात्मक प्राधिकार- 'प्रकृति के नियमों की ऊर्ध्वगामी पोषणीय शक्ति पर प्राधिकार एवं नियंत्रण भारत सरकार का होगा- भारत के प्रधानमंत्री का होगा, तब प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञात होगा कि भारत के प्रधानमंत्री जो कुछ कह रहे हैं वह संपूर्ण विश्व के हित में है एवं ऐसा नहीं है कि यह कुछ के लिए अच्छा हो एवं अन्य के लिए अच्छा न हो, नहीं, यह सबके हित में है, व्यक्तिगत रूप में एवं सामूहिक रूप से भी। यह प्रकृति के विधानों का महान चमत्कार है कि यह संपूर्ण विश्व का इस प्रकार पोषण करता है कि विश्व में सब कुछ सदैव ऊर्ध्वगामी होता है। ऐसा नहीं है कि कुछ के लिए ऊर्ध्वगामी हो और अन्य के लिए न हो। प्रकृति के विधान प्रकृति में वह सर्वोच्च पोषणीय शक्ति है, जो सदैव ऊर्ध्वगामी हैं। इसलिए हमारा भारत को सर्वोच्च शक्ति बनाने का कार्यक्रम प्रत्येक राष्ट्र की अजेयता के लिए है। यह प्रकृति के विधानों के पोषणीय ऊर्ध्वगामी प्रभाव का कार्यक्रम है जो सभी के लिए हितकारी होगा। भारत की सहस्वाभाविक गरिमा होगीज गद्गुरु भारत भारतीय जीवन की यह अभिभावकीय भूमिका अनन्त काल से पृथ्वी पर प्रभावशाली रही है- "वसुधैव कुटुम्बकम्"। यह तभी होगा जब भारतीय राष्ट्रीय चेतना प्रकृति के विधानों के गुणवत्ता वाले मूल्यों में जीवंत हो एवं इसके रहते विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं होगी जो भारत से प्रतिस्पर्धा करे, सर्वोच्च शक्ति की प्रतिस्पर्धा का तो प्रश्न ही नहीं है। किसी के पास एक प्रकार के विध्वंसक अस्त्र-शस्त्र हैं तो किसी अन्य के पास एक दूसरे प्रकार के विध्वंसक अस्त्र-शस्त्र हैं। इस प्रकार वर्तमान की महाशक्तियों का ध्यान केवल विनाश पर ही है। भारत एक ऐसी सर्वोच्च विश्व शक्ति बनने जा रहा है जिसका नियंत्रण सापेक्ष क्षेत्र की इन समस्त विध्वंसक शक्तियों पर होगा, क्योंकि यह शक्ति की पूर्णता के लिये होगा। यह प्रकृति के विधानों की वह शक्ति है जो सृष्टि के कण-कण में सदा से विद्यमान है। वैदिक विज्ञान का ज्ञान असाधारण रूप से जीवन का संपूर्ण ज्ञान है। इसका प्रयोग कर हम भारत को प्रत्येक राष्ट्र की अजेयता के हित में विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनाने जा रहे हैं। यह हमें हमारे व्यक्तिगत स्तर से किया जाना चाहिये।'
भारत वैदिक ज्ञान के अभिरक्षक की भूमिका में- 'भारत की भूमिका समस्त मानवता की खुशहाली एवं प्रगति की रक्षा करने में है, क्योंकि केवल भारत के पास ही प्रकृति के विधानों का प्रायोगिक ज्ञान है, जिसे लम्बे समय तक उपेक्षित किया गया, किन्तु यह सौभाग्यवर्धक है कि इस पीढ़ी में यह ज्ञान हमें गुरुदेव की कृपा से प्राप्त हुआ है। गुरुदेव की अनुकंपा से हमारे पास प्रकृति के विधानों का वह ज्ञान-वेद विज्ञान का ज्ञान वैदिक पंडितों की परम्परा से प्राप्त हुआ है। हम इस ज्ञान का उपयोग करने जा रहे हैं एवं इसका परिणाम यह होगा कि भारत विश्व में सर्वोच्च शक्ति बनेगा, राष्ट्रों के परिवार में कोई विध्वंसक तत्व नहीं होगा एवं यह समस्त मानवता के लिए ज्ञानयुग का उदय होगा। इसके लिये व्यावहारिक रूप से हमें क्या करना है, वह यह कि 7000 वैदिक पंडितों का एक समूह तैयार करना है जो प्रात: एवं संध्या योग का अभ्यास करेंगे। जब हम योग करते हैं तो हमारा तात्पर्य भावातीत ध्यान, समाधि एवं हमारे सिद्धि कार्यक्रम से है, जिसे विश्व की सामूहिक चेतना में सुसंबद्धता स्थापित करने में अत्यंत प्रभावी पाया गया है। वैदिक पंडितों समत्व योग की वैदिक प्रौद्योगिकी का अभ्यास करेंगे, जो कि ऋषि, एवं देवता की संहिता है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि हम इसे किन शब्दों में कहते हैं, इसे हम प्राचीन राष्ट्रीय विरासत अर्थात वैदिक विज्ञान की भाषा में कहें अथवा आधुनिक विज्ञान की भाषा में।
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