महामीडिया न्यूज सर्विस
हेयम दु:खम अनागतम्

हेयम दु:खम अनागतम्

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 10 दिन 6 घंटे पूर्व
10/06/2019
भोपाल (महामीडिया) योग हमें यह बताता है कि हम अपने अंदर की नकारात्मकता से कैसे बाहर निकलें। योग हमें मानसिक रूप से समर्थ बनाता है कि अपनी दिशा स्वयं निर्धारित कर सकें। योग हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और अपनी चेतना के विस्तार में हमारी मदद करता है। योग के प्रणेता पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है, 'योग का लक्ष्य ही है कि दु:ख आए, इससे पहले ही वह समाप्त हो जाए।' क्रोध, ईर्ष्या, कुंठा, घृणा सभी को समाहित कर नवजीवन की ओर बढ़ना ही योग है। आपने देखा होगा कि जब आप प्रसन्न होते हैं तो आप स्वयं को फैलता हुआ अनुभव करते हैं और जब अपमानित या असफल होते हैं तो अपने अंदर कुछ कम होता हुआ अनुभव होता है, हम सिकुड़ने लगते हैं। हमारे अंदर जो भी सिकुड़ने या फैलने की घटना घट रही है, योग हमें उसका साक्षी बनाता है। हम अपनी नकारात्मक भावनाओं के प्रति बहुत ही असहाय अनुभव करते हैं। कभी भी स्कूल या घर पर किसी ने नहीं सिखाया कि इन नकारात्मक भावनाओं से पार कैसे पाया जाए यदि आप परेशान हैं तो परेशान रहना होता है या फिर समय का इंतजार करना होता है। योग में वह रहस्य है, जो आपको इसके लिए तैयार कर सकता है। यह आपके मन को स्वतंत्र कर देता है। यह इस तरह से आपका निर्माण कर देता है कि जिस दिशा में आप सोचना चाहें, वह आप सहजता से कर सकते हैं। यह हमें और अधिक जिम्मेदार बनाता है। यह कर्म योग कहलाता है। हम अपने जीवन में कई चरित्र निभाते हैं। हमारे पास यह विकल्प है कि हम उसे योगी की तरह बिताएं या फिर बगैर योगी बने बिताएं। एक इसमें जिम्मेदार है, दूसरा नहीं। एक-दूसरे की देखभाल, मिल कर रहना और उत्तरदायित्वों का निर्वहन, सब कुछ योग के माध्यम से संभव है। योग से ऊर्जा बढ़ोत्तरी और उत्साह का जन्म होता है यही हमें अधिक उत्तरदायित्वों को लेने के लिए प्रेरित करता है। अगर आपके पास ऊर्जा तथा उत्साह है तो आप उत्तरदायित्वों को उठा सकते हैं और इसमें आपको बोझ भी नहीं लगेगा। यदि आप किसी भी विवाद की जड़ में होते हैं तो पाते हैं कि उसमें तनाव, अविश्वास और भय ही है। योग इन तीनों को दूर करने में सहायता करता है। भय तो तब दूर हो जाता है, जब आप अपने चिंतन को विस्तृत करते हैं और अपनी चेतना का विस्तार करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपना अंग समझते हैं। योग के आठ मार्ग हैं, इसमें से एक है शारीरिक मुद्रा। लेकिन इसका केन्द्रीय तत्व है मन की स्थिति को समता में बनाए रखना। यदि आप कोई कार्य मन से करते हैं, तब आपको पता होता है कि आप क्या कह या कर रहे हैं और यही आपको योगी बनाता है। विज्ञान एक व्यवस्थित और तार्किक समझ का पर्याय है। इसीलिए योग भी एक विज्ञान है। यह जानना कि ?यह क्या है?, विज्ञान है और यह जानना कि 'मैं कौन हूं', अध्यात्म है। लेकिन दोनों ही विज्ञान हैं। योग का समस्त विज्ञान योगी और बच्चे में अवश्य होता है। बच्चे सोते समय ?चिन? मुद्रा बनाते हैं, विश्व के हर बच्चे में आप देखेंगे कि लेटते हैं तो पहले पैर उठाते हैं और फिर कंधे, कोबरा सर्प की तरह रखते हैं। आपको एक योग शिक्षक की आवश्यकता नहीं होगी, यदि आप एक बच्चे को देखेंगे। जिस प्रकार बच्चे श्वास लेते हैं, वह वयस्क लोगों से अलग होता है। यह श्वास ही है, जो शरीर और भावनाओं के मध्य सेतु का कार्य करती है। यदि हम श्वास पर ध्यान दें तो हम अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित कर सकते हैं और नकारात्मकता से दूर रह सकते हैं। एक योगी होने की निशानी है कि हम फिर से एक बच्चा बन जाएं। योग का उद्देश्य ही है कि दु:ख आए, इससे पहले ही वह खत्म हो जाए। सभी को समाहित कर नवजीवन की ओर बढ़ना योग है। महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित ?भावातीत ध्यान योग शैली? आधुनिक जीवनशैली को आनंदित करते हुए उसे ऊर्जावान व प्रगतिवान बनाने के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में विश्व के लगभग 124 देशों में प्रसारित है जो महर्षि महेश योगी जी के ध्येय वाक्य जीवन आनंद है- का पर्याय है। वर्तमान समय की अव्यवस्थित व अतिव्यस्त जीवन शैली में हम प्रकृति, समाज, परिवार से तो दूर हो ही रहे हैं साथ ही हम स्वयं से भी दूरी बढ़ा रहे हैं और यह दूरी ही हमारे जीवन से आनंद को दूर कर रही है। अत: हम ज्यों-ज्यों स्वयं के निकट आयेंगे स्वत: ही परिवार, समाज व प्रकृति को स्वयं के समीप पायेंगे। अत: स्वयं को स्वयं से मिलाना ही योग है।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
-ब्रह्मचारी गिरीश

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