महामीडिया न्यूज सर्विस
योगं शरणं गच्छामी

योगं शरणं गच्छामी

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 131 दिन 15 घंटे पूर्व
10/06/2019
भोपाल (महामीडिया) जब मैं किसी के घर मिलने जाता हूँ तो वहाँ पदार्थों की ही विशेष चर्चा होती है। परिवार के सदस्य बताते हैं- आज हमने अमुक वस्तु क्रय की। यह लेटेस्ट मॉडल है। देखने में भी आता है कि उनके घर में एक-से-एक सुन्दर वस्तुओं को सजावट के रूप में रखा गया है, किन्तु वे केवल प्रदर्शन की वस्तुएँ हैं। उनका उपयोग घर के कार्यों में नहीं होता है। ऐसे ही हमारे मन में भी विचारों की भीड़ देखने में आती है। ये विचार भी पदार्थ-चिन्तन को लेकर होते हैं। कौन-सी वस्तु क्रय की जाए? कौन-सी वस्तु की कमी है? इसी प्रकार के विचार मन में चलते रहते हैं। यही स्थिति शरीर की है। उसकी सुन्दरता को लेकर तो पर्याप्त चिन्तन होता है, किन्तु स्वास्थ्य को लेकर उतना चिन्तन नहीं होता। ऐसी ही कुछ बातों को लेकर मैं गुरुदेव के पास गया और उनसे आग्रहपूर्वक कहने लगा कि?? गुरुदेव! आज पूरा विश्व योग की शरण में आ रहा है, किन्तु अधिकतर की रूचि आसन और प्राणायाम सीखने तक है। उनका मानना है कि योग से बीमारियाँ दूर होती हैं। योग एक स्वास्थ्यवर्द्धक प्रक्रिया है। वे केवल स्वस्थ शरीर चाहते हैं और जैसे भी शरीर स्वस्थ रहे, वे उसका स्वागत करते हैं। अगर उन्हें पता लगे कि ध्यान करने से मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है जिसे आज की भाषा में ?स्ट्रेस मैनेजमेंट? कहा जाता है। तो वे ध्यान सीखने के लिए भी तैयार रहते हैं। उनका विश्वास योग में नहीं, हर चीज के ?मैनेज? करने पर है। कृपया स्पष्ट करें, उन्हें योग के वास्तविक स्वरूप को कैसे समझाया जा सकता है।?? गुरुदेव मुस्कराते हुए बोले- ??तुम्हारी चिन्ता नई पीढ़ी को लेकर अधिक है। निश्चित ही अब योग की धारणा बदल रही है। पहले योग साधु-संन्यासियों तक सीमित था, किन्तु आज यह आम आदमी की धरोहर बनता जा रहा है। अत: अब योग को सैद्धान्तिक दृष्टि से नहीं व्यावहारिक दृष्टि से देखना होगा। आज पूरा विश्व तनाव की स्थिति में है। तनाव की स्थिति से मानव-देह का पूरा सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। भौतिकवाद ने उसको संवेदनहीन बना दिया है। भोग और शरीर के सुख की इच्छा ने उसे आसक्ति के मार्ग पर लाकर दिग्भ्रमित कर दिया है। उसका प्रभाव उसके पाचन-तंत्र पर पड़ रहा है। इसके लिए कोई दूसरा घटक नहीं वह स्वयं उत्तरदायी है। हमारे ऋषियों ने इस बात को भली-भाँति अनुभव किया था कि यदि जीवन में संतुलन खो गया, तो उसके लिए रोग के दरवाजे स्वयं खुल जायेंगे। फिर वह न स्वस्य रह सकता है, न सुखी और न शान्ति प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि भारत के चिकित्सक मनुष्य के शरीर के उपचार के साथ-साथ मन और भावना का भी उपचार करते थे। आधुनिक युग में शरीर को खंड-खंड रूप में देखा जा रहा है। जो लोग केवल शरीर का उपचार करते हैं, वे चिकित्सक कहलाते हैं। इस प्रकार उन्होंने जीवन से मानसिक पक्ष को अलग कर दिया और केवल शरीर का उपचार करने लगे। व्याधियों का निदान वे उसी दृष्टि से खोजने लगे हैं। जो लोग मानसिक रोगों का उपचार करते हें, वे मनोचिकित्सक कहलाने लगे हैं और मन को शरीर से अलग कर मात्र मन का उपचार करने लगे हैं। यहाँ तक कि जो भावना के क्षेत्र में रोग- ग्रस्त हैं, उसे साधु-संत सम्हालने लगे हैं और शरीर व मन से उसे दूर कर अध्यात्म की भाषा में उपदेश देने लगे हैं। वे यह भूल ही गये हैं कि तनाव-ग्रस्त व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि, भावना, इन्द्रियाँ, कर्म सभी प्रदूषित होते हैं। इसीलिए योग के महत्व को यदि समझना है तो मानवता की सहायता के लिए चिकित्सकों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों तथा संतों को मिलकर प्रयास करना होगा। आज विश्व में योग के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है, उससे योग तो लोकप्रिय अवश्य बनेगा, किन्तु भारतीय संस्कृति की यह अद्भुत खोज कहीं व्यवसाय मात्र बनकर न रह जाए। अन्यथा इस व्यावसायिक दृष्टिकोण से योग के मूल उद्देश्य की ही उपेक्षा हो जायेगी। यह चिन्ता का विषय है। योग के मार्ग पर चलने का अर्थ है- जीवन का सम्पूर्ण रूपान्तरण। इस दृष्टि से पतंजलि योग को अच्छी तरह आत्मसात् करना होगा। इस योग में जिन प्रक्रियाओं पर चर्चा की गयी है, उसमें सबसे पहले नैतिक पक्ष को देखा जाता है, व्यवहार और आचरण को देखा जाता है। यम िनयम के अन्तर्गत उसकी विस्तार से चर्चा की गयी है। फिर शारीरिक स्वास्थ्य की बात आती है, तब उसके लिए आसन और प्राणायाम की बात कही गयी है। मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्याहार और धारण की चर्चा आयी है। अन्त में, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए ध्यान और समाधि के सूत्र सामने आते हैं। इसी को हम योग कहते हैं। जो जीवन के प्रति जिज्ञासु हैं, उन्हें महर्षि पतंजलि के इन सूत्रों में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने में अवश्य सफलता मिलेगी। हाँ! संस्कृत भाषा के जानकार एवं व्याकरण की कुलाचें ही जानें, पर साधकों का साधन-सत्य यही है कि वह प्रकृति और पुरूष को उसकी संपूर्णता में जानें! ऐसा तभी संभव होगा जब इन योग-सूत्रों का अर्थ स्वयं के अनुभवों में प्रकट होगा। तब योग साधक तनाव-मुक्त जीवन जियेगा और उसकी सभी भटकनें एवं भुलावे ढह जायेंगे, अवरोधों और बाधाओं की दीवारें प्रकाश से भर उठेंगी। फिर उसके लिए उन्हें जन्म देने वाली प्रकृति में न तो कुछ अदृश्य रहेगा, न कुछ अप्राप्त। वह प्रकृति को स्वयं की शक्ति के रूप में अनुभव करेगा। जिस प्रकार प्रकृति और पुरूष दोनों ही साथ-साथ रहकर इस विराट-विश्व का सृजन करते रहे हैं, वैसे ही वह भी प्रकृति के मोह-जाल से दूर होकर अपने कार्य को निष्काम भाव से करेगा। प्रकृति पुरूष का यह संबंध लौकिक एवं आध्यात्मिक विभूतियों को प्रकट करने के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से भी एक अलौकिक वरदान है। 
पतंजलि योग-सूत्र में चार पाद हैं-
माधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद। इन चारों पादों के अन्तर्गत उन्होंने जिस विषय-वस्तु का चयन किया है, आधुनिक अथवा वैज्ञानिक शब्दावली में उसे ?व्यक्तित्व का विकास? कहा जा सकता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक की व्यक्तित्व विकास की धारणा भौतिकीय और जैविकीय अवधारणाओं की पुष्टि करती है। उनकी दृष्टि में केवल शारीरिक, बौद्धिक अथवा भावनात्मक व्यवहार है, जो वंश परम्परा तथा वातावरण से व्यक्तित्व को प्रभावित करता है, जबकि योग की दृष्टि से व्यक्तित्व के गठन में संस्कार पक्ष प्रधान है। व्यक्ति के पूर्व- जन्मों के (प्रारब्ध) और वर्तमान जन्म के संस्कार जो कि उसे गर्भ से प्राप्त होते हैं, ये सभी मिलकर व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं। इस दृष्टि से मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसकी चेतना के विकास पर आधारित है। ऐसा व्यक्तित्व आत्मचेतना से प्रेरणा लेकर सांसारिक कार्यों में रत रहते हुए भी राग-द्वेष से परे रहता है। सुख- दु:ख दोनों ही स्थितियों में सम रहता है। क्रियाओं के फल से उदासीन होकर कर्म करता है। यही व्यक्तित्व की श्रेष्ठ पहचान है। इस दृष्टि से पतंजलि योग-विज्ञान विशुद्ध मनोविज्ञान है, जिसमें व्यक्तित्व के विकास के आठ आयाम दिये गये हैं।?? पतंजलि योग-सूत्र के 200 सूत्रों में से उन्हीं सूत्रों को लेकर तैयार की गयी है, जिसे पढ़कर आपकी यह धारणा बनेगी कि व्यक्तित्व-विकास के सूत्र में तीन पक्ष प्रबल हैं- शरीर, चित्त और आत्मा। इनमें से यदि एक पक्ष भी दोषग्रस्त हो जाए, तो तत्काल उसका प्रभाव अन्य दो पर पड़ता है। अत: व्यक्तित्व के सम्यक् विकास के लिए हममें यह भाव पनपना चाहिए कि मृत्यु के साथ भी व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता है। यह समझकर ही चित्त-वृत्ति निरोध की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। भारतीय चिन्तन की यह अनुपम देन है। योग-सूत्र को पढ़कर कई लोग सिद्धियों के चक्कर में पड़ जाते हैं, किन्तु सिद्धियों का संबंध योग से नहीं है। यदि कोई इस संबंध का पक्षधर है तो वह अवश्य ही चित्तवृत्ति से संचालित है। इस बात को ध्यान में रखकर ही योग-सूत्रों को संदर्भित क्रम में रखते हुए यहाँ विषय-वस्तु प्रस्तुत की गयी है। इससे पाठक को मूल कथ्य समझने में सहायता मिलेगी। पुस्तक का मुख्य ध्येय व्यक्तित्व-विकास की कला में योग कहाँ तक सहायक है, इस पर केन्द्रित है। यह बात इसके सम्पूर्ण अध्ययन के पश्चात् ही आपको स्पष्ट होगी। अत: पाठकों से इसे सम्पूर्ण रूप में अध्ययन करने का आग्रह है। (निरंतर....)
- डॉ. प्रेम भारती 
प्रस्तुति महामीडिया डेस्क

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