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श्री गुरुदेव की कृपा का फल

श्री गुरुदेव की कृपा का फल

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 60 दिन 25 मिनट पूर्व
24/06/2019
भोपाल (महामीडिया) ब्रह्मलीन पूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भारतीय शाश्वत् पारम्परिक वैदिक विज्ञान का अखण्ड दीप प्रज्जवलित कर इसकी प्रकाशमय ज्योति से सारे विश्व को पूर्ण ज्ञान का प्रसाद दिया। महर्षि जी वैदिक भारत के स्वर्णिम इतिहास में एक ऐतिहासिक अद्वितीय उदाहरण छोड़ गयें जब हम अपने गुरु के लिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव और परब्रह्म की उपाधियुक्त स्तुति करते हैं तो किंचित त्रिदेवों का भाव तो जागृत होता है किन्तु उन भक्ति के क्षणों में देवों के गुणों अथवा उनके कार्यों की व्याख्या नहीं हो पाती। महर्षि जी ने कभी भी न स्वयं को गुरु कहा और न किसी से अपने को गुरु कहलवाया। सारा जीवन अपने परमाराध्य गुरुदेव अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के श्रीचरणों का स्मरण, उनका पूजन और सारे विश्व में 'जय गुरुदेव' का उद्घोष कर उनकी जय जयकार करते रहे और करवाते रहे। भारतीय शाश्वत् सनातन वैदिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर वेदभूमि-पूर्णभमि- देवभूमि-पुण्यभूमि-सिद्धभूमि-प्रतिभारत भारतवर्ष का जगद्गुरुत्व और ख्याति जिस तरह महर्षि जी ने समस्त भूमण्डल में हजारों वर्षों के अन्तराल के पश्चात् पुन: स्थापित की और भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान, योग, भावातीत ध्यान का लोहा मनवाया, ऐसा उदाहरण या दृष्टिांत समूचे वैदिक वांङ्गमय में या आधुनिक काल में कहीं भी वर्णित नहीं है। 1953 में श्री गुरुदेव ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज, तत्कालीन शंकराचार्य, ज्योतिर्मठ, बद्रिकाश्रम हिमालय के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद महर्षि जी ने ऋषियों, महर्षियों की तपस्थली उत्तरकाशी में साधना की और फिर सारे विश्व को ज्ञानी बनाने, धर्म अर्थ काम और मोक्ष का मार्ग दिखाने, दु:ख दारिद्र, अशांति आदि ज्वलंत समस्याओं का निदान लिये महर्षि जी अपनी स्वयं की साधना का आनन्द त्यागकर विश्वकल्याणार्थ निकल पड़े। जब जब विश्व में धर्म स्थापना की आवश्यकता होती है, भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। भगवान कृष्ण जी ने गीता में स्वयं कहा-
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
इसी को श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने अपने शब्दों में कहा-
जब जब होइ धरम की हानि, बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।
तब तब ले प्रभु विविध सरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीड़ा।।
या तो भगवान स्वयं प्रकट होते हैं अथवा वे अपना अंश प्रदान कर किसी महान शुद्धात्मा को पृथ्वी पर अवतरित कर देते हैं। पचास वर्षों में विश्व भर में अनगिनत भ्रमण करते हुए, ज्ञान, ध्यान, योग, यज्ञादि के अनेकाने कार्यक्रमों की रचना करके करोड़ों व्यक्तियों की जीवन धारा को एक नया मोड़ देकर विश्व की सामूहिक चेतना को जिस प्रकार थामा और उसमें सतोगुण का संचार कर रजोगुणी और तमोगुणी प्रवृत्तियों पर विजय पाई, कलिकाल के प्रभाव में रहते हुए सतयुग के उदय का उद्घोष किया, यह सब किसी भी एक सामान्य ज्ञानी या प्रशासनिक पुरुष के द्वारा होना सम्भव ही नहीं था। यह केवल किसी देवी शक्ति का महर्षि जी के रूप में अवतरण था जिसके लिये हजारों वर्षों का कार्य केवल 50 वर्षों में कर पाना सम्भव हो सका।
महर्षि जी ने वेद, योग और ध्यान साधना के प्रति जन सामान्य में बिखरी भ्रान्तियों का समाधान कर उनको दूर किया। वैदिक वांङ्गमय के 40 क्षेत्रों- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, निरूक्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त, कर्म मीमांस, योग, गंधर्ववेद, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद, काश्यप संहिता,भेल संहिता, हारीत संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता, शार्ङ्गधर संहिता, माधव निदान संहिता, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण, स्मृति, पुराण, इतिहास, ऋग्वेद प्रतिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य, अथर्व वेद प्रातिशाख्य, सामवेद प्रातिशाख्य (पुष्प सूत्रम्), कृष्ण यजुर्वेद प्रातिशाख्य (तैत्तिरीय), अथर्व वेद प्रातिशाख्य, (चतुरध्यायी) को एकत्र किया, उन्हें सुगठित कर व्यवस्थित स्वरूप दिया और वेद के अपौरुषेय होने की विस्तृत व्याख्या की।
महर्षि जी ने भावातीत ध्यान की सहज शैली प्रदान की, जो हर व्यक्ति अपने ही आवास में, परिवार में रहकर अभ्यास करके अपने लौकिक और पारलौकिक जीवन को धन्य कर सकता है। महर्षि जी ने प्रमाणित कर दिया कि साधना के लिये हिमालय जाकर किसी गुफा में धूनी रमाकर कठिन तपस्या आवश्यक नहीं है। 230 स्वतंत्र शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने 35 देशों में 700 से अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान करके महर्षि जी के भावातीत ध्यान और सिद्धि कार्यक्रम से मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले लाभ की पुष्टि की।
(महर्षि महेश योगी जी के तपोनिष्ठ शिष्य)

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