महामीडिया न्यूज सर्विस
संसद में टकराव

संसद में टकराव

Suraj Singh Chandel | पोस्ट किया गया 1607 दिन 16 घंटे पूर्व
22/07/2015
देश में राजनीतिक परिस्थितियां कुछ इस तरह की हो गई हैं कि संसद हो या राज्यों की विधानसभाएं, हर जगह टकराव के दृश्य सामने आ रहे हैं। आशंका के अनुसार ही मंगलवार को संसद का मॉनसून सत्र अच्छे खासे हंगामे के साथ शुरू हुआ। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने इस बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज,राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे को अपना प्रमुख अजेंडा बनाया है, जबकि सरकार कह चुकी है कि वह यह मांग स्वीकार नहीं करेगी। भूमि अधिग्रहण विधेयक भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। कहने को तो केंद्र सरकार की ओर से सर्वदलीय बैठक तथा मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने का कथित तौर पर प्रयास किया गया, लेकिन बात बनी नहीं। और फिर सरकार विपक्षी दलों से बातचीत कर सहमति का रास्ता बनाने की जगह ईंट का जवाब पत्थर से देने का मन बनाती दिखाई दे रही है। सरकार की सहयोगी शिवसेना ने तो इस सत्र को सत्ता और विपक्ष के महामुकाबले का नाम दे दिया है। भाजपा ने अपनी राज्य सरकारों और मुख्यमंत्रियों के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में कांग्रेस से जुड़े भ्रष्टाचार के पुराने मामलों को उठाने की रणनीति बनाई है। भाजपाइयों का मानना है कि जनता इसे सही मानेगी, लेकिन क्या भ्रष्टाचार का जवाब भ्रष्टाचार होना चाहिए? संख्याबल के आधार पर भाजपा ऐसा करने में भले ही सफल हो जाए, लेकिन जो आरोप केंद्र या भाजपा की कुछ राज्य सरकारों पर लगे हैं, जनता उसका जवाब जरूर जानना चाहेगी। और तो और, स्वयं भाजपा के वर्तमान सांसद और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके वरिष्ठ राजनेता शांता कुमार ने भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को चि_ी लिखकर पार्टी नेताओं के कामकाज पर नजर रखने के लिए केंद्र और राज्य इकाइयों के स्तर पर आंतरिक लोकपाल गठित करने की मांग की है। साफ है, विपक्ष को चुप करा देने भर से बात नहीं बनेगी। पार्टी के अंदर तो लोकतंत्र की बात हो ही नहीं सकती। शांताकुमार भी कह रहे हैं कि यदि उनकी बात पार्टी में सुनी जाती तो वे पत्र क्यों लिखते? ऐसा लगता है कि भाजपा सवा साल सरकार चला लेने के बाद भी चुनाव के मोड से बाहर नहीं निकल पाई है। उसे समझना चाहिए कि मोदी सरकार का हनिमून पीरियड समाप्त हो चुका है। लोग जानना चाहते हैं कि सरकार अपने वादों को पूरा करने को लेकर कितनी गंभीर है। सच कहें तो मोदी सरकार की हालत अभी कुछ-कुछ यूपीए-2 के शुरुआती दौर जैसी है, जब एक के बाद एक घोटालों ने देश को सकते में डाल दिया था। अंतर केवल इतना है कि आरोपों का दायरा राज्य सरकारों पर केंद्रित है, खुद केंद्र सरकार पर अभी उतने गंभीर आरोप नहीं हैं। हां, हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अवश्य ललित मोदी की मदद के मामले में उलझ गईं। इस सत्र में भूमि बिल और जीएसटी बिल जैसे चर्चित विधेयकों के अलावा व्हिसलब्लोअर बिल, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक, 2014, दिल्ली उच्च न्यायालय (संशोधन) विधेयक 2014, बेनामी लेनदेन (निषेध) संशोधन विधेयक 2015, लोकपाल और लोकायुक्त और अन्य संबंधित कानून (संशोधन) विधेयक 2014, रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) विधेयक 2013, विद्युत (संशोधन) विधेयक 2014 को पारित कराने की चुनौती है। परंतु जिस तरह से हंगामेदार शुरुआत हुई है, उसे देखकर लोकतांतित्र परंपराओं को लेकर आशंका होना स्वाभाविक है।
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