महामीडिया न्यूज सर्विस
मोब लिंचिग हमारे समाज के लिए एक महामारी है

मोब लिंचिग हमारे समाज के लिए एक महामारी है

admin | पोस्ट किया गया 131 दिन 16 घंटे पूर्व
27/07/2019
भोपाल (महामीडिया) हमारे समाज में मोब लिंचिंग एक महामारी बन गया है और हम इसे अब अनदेखा नहीं कर सकते। इस तरह की घटनाओं को रोकने का ज़िम्मा केंद्र और राज्य सरकारों का है। किसी को भी कानून को अपने हाथ में लेने और सिर्फ गाय-वध के संदेह के नाम पर किसी को मौत के घाट उतार देने का अधिकार नहीं है । इसी तरह, किसी को भी 'जय श्री राम' या अन्य धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। धर्मांध लोगों द्वारा मोब लिंचिग की घटनाओं की बढ़ती संख्या हम सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और सभी प्रमुख राज्य सरकारों से एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा। याचिका में कहा गया है कि 17 जुलाई, 2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे लेकिन उन पर सरकारें ठीक तरीके से अमल नही कर रही है, तभी ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। याचिका के मुताबिक पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने भी कारगर कदम  नहीं उठाए। कोर्ट ने भीड़ द्वारा हत्याओं को  रोकने के लिए सरकार से कानून बनाने को कहा था। 
सुप्रीम कोर्ट ने लगातार बढ़ रही मोब लिंचिग की घटनाओं की निंदा की और सरकारों से कहा था कि वे हमारे बहुलवादी समाज की शांति और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को बचाये रखने के लिए कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपने संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करें।   
यह बात सच है की भारत के बहुसंख्यक समुदाय में भगवान राम और गाय, कई लोगों के लिए पवित्र और खास स्थान रखते हैं । गंदी राजनीति के कारण, 'जय श्री राम' का नारा आज एक भड़काऊ युद्ध बन गया है। हम इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि 29 अक्टूबर, 2018 से 1 जनवरी, 2009 के बीच 254 से अधिक धार्मिक आधारित घृणा अपराध दर्ज किए गए हैं ।
हाल ही में, भीड़ हिंसा और पीट-पीट कर हत्या की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, 49 प्रतिष्ठित हस्तियों, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग शामिल हैं, के प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को हस्ताक्षर किया पत्र लिखा और उनसे आगाह किया उन लोगों पर सख्त कार्रवाई की मांग की, जो इस अपराध में दोषी पाए गए हैं ।
इसके जवाब में, फिल्म इंडस्ट्री के एक अन्य 62 सदस्यों वाले  प्रतिनिधिमंडल ने भी प्रधान मंत्री को एक खुला पत्र लिखा है और पिछले प्रतिनिधिमंडल के पत्र और उनकी मांग को 'चुनिंदा आक्रोश और झूठा आख्यान' करार दिया। दिलचस्प बात यह है कि बॉलीवुड के इस प्रतिनिधिमंडल में सीबीएफसी प्रमुख प्रसून जोशी, अभिनेत्री कंगना रनौत, शास्त्रीय नृत्यांगना सोनल मानसिंह आदि जैसी जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं। यह स्पष्ट है कि हमारे कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता और फिल्म निर्माता भी इस मुद्दे पर विभाजित हैं। ऐसा लगता है कि यहाँ भी भाजपा बनाम गैर-भाजपा की लड़ाई है और मूल मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय हमारे ये सामाजिक नेता अपनी-अपनी विचारधाराओं के लिए लड़ रहे हैं।
'जय श्री राम? का जाप करना या कहना आस्था का विषय है और हमारे सांसदों को इसे समझना चाहिए। जो लोग 'रामराज्य' का लाभ पाने के लिए राम के नाम का दुरुपयोग करते हैं, वे कहते हैं -

दैहिक, दैविक, भौतिक तापा। रामराज  कहुहिनहि व्यापा।।
सब नर करहि परस्पर  प्रीती। चलहि स्वधर्मनिरत श्रुतीरीती।। 
 
'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं॥1॥

इसलिए, भीड़ हिंसा की ऐसी घटनाओं की निंदा करना बहुत अत्यावश्यक है, न केवल कानून के उल्लंघन के लिए, बल्कि इसलिए कि इससे असली रामभक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचती है और भगवान राम का अपमान होता है ।
हमें यह भी जानना चाहिए कि केवल कानून को सख्त बनाना ही काफ़ी नहीं होगा। सभी जानते हैं कि हत्या के बाद किसी व्यक्ति को मौत की सजा ही हो सकती है। लेकिन फिर भी हर साल बड़ी संख्या में इस तरह की हत्याएं की जाती हैं। लोग जानते हैं कि इंडियल पेनल कोड का कानून मौजूद है और हर अपराध के लिए कारावास का प्रावधान है, फिर भी हर रोज हजारों अपराध होते हैं। हमें समाज की सामूहिक चेतना में सामंजस्य-सत्त्व पैदा करने की जरूरत है, जहां केवल सतोगुण ही ठहर पाते हैं । इससे किसी भी मन और दिल से कोई नकारात्मकता नहीं निकलती है। परम पुज्य महर्षि महेश योगी जी ने इस तरह से सामूहिक नकारात्मकता को रोकने के लिए एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध वैदिक प्रौद्योगिकी दी है। सरकारों को इस तरह की तकनीकों को अपनाना चाहिए और भीड़ हिंसा को रोकना चाहिए।
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