महामीडिया न्यूज सर्विस
जाकी रही भावना जैसी

जाकी रही भावना जैसी

admin | पोस्ट किया गया 131 दिन 8 घंटे पूर्व
01/08/2019
भोपाल (महामीडिया) निंदा-आलोचना करना जिनके व्यवहार में आ गया है, वे हजारों गुण होने पर भी दोष ढूंढ ही लेते हैं और जिनकी गुणग्रहण की प्रकृति है, वे हजार अवगुण होने पर भी गुण देख लेते हैं, क्योंकि विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु या व्यक्ति नहीं है, जो पूर्णत: सर्वगुण संपन्न हो या पूर्णत: गुणहीन हो। एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते हैं। मात्र ग्रहणता की बात है कि आप क्या ग्रहण करते हैं, गुण या अवगुण? रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी कहा है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत दृष्टिगत होती है। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक नाम से पुकारा 'हे निष्पाप अर्जुन'। श्री कृष्ण मात्र अर्जुन भी कह सकते थे। पर उन्होंने निष्पाप विशेषण जोड़ा। गीता में ही एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ जनों का आचरण अनुसरणीय होता है अत: उनका आचरण भी श्रेष्ठ होना चाहिए। ये दो संदेश मात्र महाभारत काल में या मात्र अर्जुन के लिये ही उपयुक्त नहीं है। प्रत्येक काल में और प्रत्येक उस व्यक्ति के लिये भी हैं जो कहीं भी ज्येष्ठ है, वरिष्ठ है। वह घर हो, कार्यालय हो, या सामाजिक। अनेक अवसरों पर हम व्यथित हो जाते है, निराश हो जाते हैं कि अमुक व्यक्ति उचित कार्य नहीं कर रहे या बच्चे हमारे अनुकूल नहीं चल रहे, या घर में कार्य करने वाले या कामवाली कोई छोटा मोटा सामान उठा ले जाती है। आपकी चिंता अपने स्थान पर सही हो सकती है। पर एक बार इस बात पर विचार आवश्यक है कि हम भी तो कहीं गलती नहीं कर रहे हैं। किसी के विषय में यदि हमारे मन में शंका है कि यह कामचोर है और यह विचार बार बार उठा तो मानकर चलिये कि वह व्यक्ति धीरे धीरे कामचोरी करने लगेगा। ऐसा नहीं होता कि हमारे मन का विचार मात्र हमारे मन तक ही सीमित रहता है। हमारा मन और उसके भाव ब्रह्मण्ड की असीम शक्ति से जुड़े होते हैं। जब हम सोचते हैं कि अमुक व्यक्ति कामचोर है तब मन में उसकी छवि भी बनती है चेहरा स्पष्ट होता है और प्रकृति के माध्यम से उसके भीतर प्रवेश करते हैं और धीरे धीरे वह व्यक्ति काम चोरी करने लगता है। अत: आपने ही तो प्रेरित किया काम चोरी के लिये। इसी प्रकार हम कामवाली पर शंका करते हैं कि यह चीजें उठा ले जाती है। तो मानकर चलिये कि वह धीरे-धीरे चोरी करने लगेगी। उसे चोर बनाने के लिये हम भी उत्तरदायी हैं। बच्चो के विषय में भी अनेक कारणों में से यह एक कारण होता है। यदि हम बार बार कहें कि यह चंचल है इसने जीवन दुभर कर दिया। तो मानकर चलिये कि उससे निश्चित ही आपका जीवन दुष्कर हो जायेगा। पुराने समय बच्चो के नाम भी बहुत सोचकर सकारात्मक रखे जाते थे अर्थ प्रधान रखे जाते थे जिससे सार्थक ऊर्जा उत्पन्न हो। इसीलिए भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के नाम के आगे निष्पाप विशेषण लगाया। पाप क्या है? अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए नकारात्मक और निषेधात्मक मार्गों को अपनाना। इससे मन में नकारात्मक विचार आते हैं जो सकारात्मक मार्गों पर सोचने की समझ को ढक लेते हैं। श्री कृष्ण इच्छा रखते थे, कि अर्जुन सकारात्मक मन और ऊर्जा से उनके उपदेश को समझे अत: उन्होंने सकारात्मक नाम का उच्चारण किया। यदि हम चाहते हैं कि हमारे आसपास के लोग श्रेष्ठ रहें, सहयोगी रहें, कर्मशील हों तो हमें सकारात्मक चिन्तन करना चाहिए और सकारात्मक ऊर्जा भी संप्रेषित करना चाहिए। शरीर, अन्न, जल और वायु के आधार पर जीवित रहता है। सम्पन्नता-परिश्रम, चातुर्य और साधनों पर अवलम्बित है, किन्तु अन्तरात्मा को परिपोषण इनमें से किसी के सहारे भी नहीं मिल सकता। सम्पन्नता सुविधा बढ़ाती है, उसके सहारे शरीरगत विलासिता, तृष्णा और अहंभाव (गर्व) का परिपोषण हो सकता है। चाटुकारों के मुँह प्रशंसा भी सुनी जा सकती है, किन्तु आत्मिक अनुभूतियों को अर्जित किये बिना कोई तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का रसास्वादन नहीं कर सकता। समृद्धि दूसरों को चमत्कृत कर सकती है, किन्तु श्रद्धा और सद्भावना उपलब्ध करने के लिए आन्तरिक उत्कृष्टता की आवश्यकता पड़ती है। इसी का दूसरा नाम सज्जनता है। इसे पवित्रता, महानता, उदारता और संयमशीलता के मूल्य पर ही उपलब्ध किया जा सकता है। यदि शरीर को ही सब कुछ माना जाय तो उसके लिए सुविधा सम्पादन से विलास, वैभव से कार्य चल सकता है, किन्तु यदि ऐसा प्रतीत हो कि अपने भीतर अन्तरात्मा नाम की भी कोई वस्तु है और अन्त:करण भी अपनी आवश्यकताएँ व्यक्त करता है, तो फिर यह अनिवार्य हो जाता है कि महानता और शालीनता को अपने चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय। निर्वाह भर से संतोष किया जाय और अपनी प्रतिभा को आत्म- परिष्कार के लिए नियोजित किया जाय। अत: अपनी भावनाओं को भीतर से शुद्ध करने हेतु प्रात: एवं सन्धा प्रतिदिन भावातीत ध्यान-योग का अभ्यास करिये और आनन्दित रहिये। शनै:-शनै: आप आन्तरिक शुद्धता को प्राप्त कर लेंगे।
-ब्रह्मचारी गिरीश
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