महामीडिया न्यूज सर्विस
योग और जीवन लक्ष्य

योग और जीवन लक्ष्य

admin | पोस्ट किया गया 907 दिन 23 घंटे पूर्व
16/06/2017
योग अर्थात मिलन, दार्शनिक दृष्टि से आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है। अत: योग वह माध्यम है जो हमें परमात्मा से साक्षात्कार कराता है। उस परमपिता परमेश्वर तक पहुंचने का माध्यम योग है। योग को समझने का प्रयास ही योगी होने की प्रथम सीढ़ी है जब हम अपने अज्ञान को ज्ञान से मिटा देते है तो वह योग है। जब हम अपने ??मैं??की कमी को ??हम?? से पूरी कर लेते हैं तो यह योग है। जब प्रकृति में सभी स्थान पर ब्रह्म् है और वही मुझमें, मेरे परिवार के रूप में, वही मेरे नगर के रूप में है, और वही राष्ट्र व विश्व के रूप मे है, तो हम ही हम हैं सर्वथा और सर्वत्र तो फिर भय, ईष्या, घृणा, स्पर्धा आदि जो मानव वेदना का मूल स्त्रोत हैं वहीं समाप्त हो जायेंगी व सम्पूर्ण विश्व में आनंद का साम्राज्य होगा, रामराज्य होगा।
सर्वप्रथम स्वयं को जानना होगा और यह कार्य बहुत ही सावधानीपूर्वक व निष्पक्षता से करना होगा क्योंकि यह मानव स्वभाव है कि वह स्वयं को बुराईयों को अनदेखा करता है और यही कार्य योग की यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है। हमे अपने स्वयं के भीतर से नकारात्मकता को पूर्णत: नष्ट करते हुए उसे सकारात्मकता मे परिवर्तित करना होगा वह प्रत्येक कार्य जो सिद्धांत: स्वयं के लिए हानिकारक हो सकता हैं उसे त्यागना होगा और ध्यान रहे जब हम स्वयं से युद्ध करते हैं, तो यह युद्ध बहुत घातक हो सकता है यदि इसे उचित-अनुचित की कसौटी पर प्रतिक्षण परखा न जाये। क्योंकि हमें, हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विश्लेषण करना होगा और एक (सत्यप्रिय) विश्लेषणकर्ता के रूप में स्वयं को व्यवस्थित करना होगा। और यह वही उपाय है जो एक सशक्त व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक जीवन में सफलता की और ले जाती हैं।
सर्वांग आसन के लिए चित्र परिणाम
आज भी अनेक लोग हैं जो धर्म को ज्योतिष या हस्तरेखा तक सीमित रखते हैं क्योंकि वह भौतिकवादी हैं। योग, आध्यात्म का मार्ग है। हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह आवश्यकता नहीं है कि आपको आध्यात्म का ज्ञान हिमालय पर्वत की गगनचुंबी चौटियों पर ही प्राप्त होगा। निसन्देह हिमालय का क्षैत्र निष्ठावान योगियों, महापुरषों को उनकी साधना में सहायता प्रदान करता है। किंतु मात्र ऊचें पर्वतों का एकांत मात्र ही आपको आध्यात्म की और ले जायेगा ऐसा नही हैं। क्योकि हिमालय के क्षेत्र मे निवासरत अनेक लोग भी भारत के मैदानी क्षैत्रों मे रहने वाले लोगो जैसी ही सोच के साथ अपना जीवन यापन करते हैं। हमारे जीवन का निर्माण हमारे अनुभवों, हमारे विचारों और हमारे कार्यो से होता है।  यह सब मन कि गति से सम्बंधित है। 
अत: हमें स्वयं को प्रकृतिमय करना होगा जिस प्रकार समस्त प्रकृति अपना नियत कार्य करती है ठीक उसी प्रकार हमे भी अपने मन में उत्पन्न भावनाओं और अनुभवों को एैन्द्रिय सुख से वास्तविक आनंद की और अग्रसर करें, आत्मा की ओर अग्रसर करें तो यही योग है जो जीवन को काल्पनिक सुख से वास्तिविक आनंद की प्राप्ति के मार्ग मे हमारा सहयात्री है वही योग है। परमपूज्य महर्षि सदैव कहते थे कि भावातीत ध्यान योग शैली वह सरलतम व प्रयासरहित मार्ग है जो हमें परमतत्व से मिलन कराकर आनन्दित कर देता है।

सर्वांग आसन

विधि-सर्वप्रथम हम पीठ के बल आराम के साथ लेट जाते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों की हथेलियों को कमर के बाजू में जमीन पर ऊपर की ओर खुली हुई रखते हैं। दोनों पैरों की एड़ी पंजों को धीरे-धीरे बिना घुटना मोड़े ऊपर की ओर 900 (अंश) के कोण तक ले जाते हैं। दोनों हाथों की हथेलियों की सहायता से पीठ पर सहारा देते हुए कमर वाला भाग ऊपर की ओर आराम के साथ ले जाते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर का वजन दोनों हथेलियों और कुहनियों पर आ जाता है और सीना दाढ़ी के पास आ जाता है। आसन करते समय श्वांस-प्रश्वांस सामान्य रखते हैं और 10 सेकेण्ड से 1 मिनिट तक रुकते हैं। जिस प्रकार शरीर को हाथों व हथेलियों की सहायता से ऊपर ले गये थे ठीक उसी प्रकार जमीन पर धीरे-धीरे वापिस आ जाते हैं। वापस आते समय हाथों की सहायता लेना अनिवार्य है। 


नोट- इस आसन को ताकत लगाकर नहीं करना है। व्यायाम के जैसे न करें। सर्वांग आसन के बाद मत्स्य आसन करना अनिवार्य है। 
लाभ-रक्त संस्थान को व्यवस्थित कर रक्त को शरीर के ऊपरी अंगों में पहुँचाता है। शरीर को सुन्दर बनाता है। अन्त: स्त्रावी ग्रंथियों में लाभकारी है। पाचन संस्थान में लाभकारी है। 
किसे करना है-पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ही इस आसन को करें। 
किसे नहीं करना है-अस्वस्थ व्यक्ति जैसे ज्वर, हृदय रोगी, पीठ दर्द से ग्रसित त्रिकसूल (सायटिका) से पीड़ित व्यक्ति एवं गर्भवती महिलायें इस आसन को न करें।

मत्स्यासन

विधि-सर्वप्रथम हम पीठ के बल आराम के साथ लेट जाते हैं। हथेली कमर के बराबर ऊपर की ओर खुली हुई रखते हैं। दोनों पैरों के एड़ी, पंजे मिलाकर रखते हैं। इसके पश्चात् दोनों घुटनों की सहायता से मोड़कर पद्मासन लगाते हैं तथा जंघा और घुटने जमीन पर रखते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों से पैरों की सहायता लेकर गर्दन वाले भाग को मोड़कर जमीन पर जमा देते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों से पैरों के अंगूठे पकड़ लेते हैं। इस स्थिति में 10-15 सेकेण्ड तक रुकते हैं। एक बार इसका अभ्यास करते हैं। अब हम जिस प्रकार आसन में गये थे, ठीक उसी प्रकार वापस आ जाते हैं। यह आसन शरीर सामर्थ्य अनुसार करते हैं और धीरे-धीरे हाथों की सहायता से पैरों को सीधा कर लेते हैं व कुछ देर विश्राम करते हैं। 
संबंधित चित्र
लाभ-यह आसन शरीर को लचीला बनाता है। श्वसन संस्थान में लाभकारी है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। 
किसे करना है-पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ही इस आसन को करें। 
किसे नहीं करना है-अस्वस्थ व्यक्ति जैसे ज्वर, हृदय रोगी, पीठ दर्द से ग्रसित त्रिकसूल (सायटिका) से पीड़ित व्यक्ति एवं गर्भवती महिलायें इस आसन को न करें।
" >
योग अर्थात मिलन, दार्शनिक दृष्टि से आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है। अत: योग वह माध्यम है जो हमें परमात्मा से साक्षात्कार कराता है। उस परमपिता परमेश्वर तक पहुंचने का माध्यम योग है। योग को समझने का प्रयास ही योगी होने की प्रथम सीढ़ी है जब हम अपने अज्ञान को ज्ञान से मिटा देते है तो वह योग है। जब हम अपने ??मैं??की कमी को ??हम?? से पूरी कर लेते हैं तो यह योग है। जब प्रकृति में सभी स्थान पर ब्रह्म् है और वही मुझमें, मेरे परिवार के रूप में, वही मेरे नगर के रूप में है, और वही राष्ट्र व विश्व के रूप मे है, तो हम ही हम हैं सर्वथा और सर्वत्र तो फिर भय, ईष्या, घृणा, स्पर्धा आदि जो मानव वेदना का मूल स्त्रोत हैं वहीं समाप्त हो जायेंगी व सम्पूर्ण विश्व में आनंद का साम्राज्य होगा, रामराज्य होगा।
सर्वप्रथम स्वयं को जानना होगा और यह कार्य बहुत ही सावधानीपूर्वक व निष्पक्षता से करना होगा क्योंकि यह मानव स्वभाव है कि वह स्वयं को बुराईयों को अनदेखा करता है और यही कार्य योग की यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है। हमे अपने स्वयं के भीतर से नकारात्मकता को पूर्णत: नष्ट करते हुए उसे सकारात्मकता मे परिवर्तित करना होगा वह प्रत्येक कार्य जो सिद्धांत: स्वयं के लिए हानिकारक हो सकता हैं उसे त्यागना होगा और ध्यान रहे जब हम स्वयं से युद्ध करते हैं, तो यह युद्ध बहुत घातक हो सकता है यदि इसे उचित-अनुचित की कसौटी पर प्रतिक्षण परखा न जाये। क्योंकि हमें, हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विश्लेषण करना होगा और एक (सत्यप्रिय) विश्लेषणकर्ता के रूप में स्वयं को व्यवस्थित करना होगा। और यह वही उपाय है जो एक सशक्त व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक जीवन में सफलता की और ले जाती हैं।
आज भी अनेक लोग हैं जो धर्म को ज्योतिष या हस्तरेखा तक सीमित रखते हैं क्योंकि वह भौतिकवादी हैं। योग, आध्यात्म का मार्ग है। हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह आवश्यकता नहीं है कि आपको आध्यात्म का ज्ञान हिमालय पर्वत की गगनचुंबी चौटियों पर ही प्राप्त होगा। निसन्देह हिमालय का क्षैत्र निष्ठावान योगियों, महापुरषों को उनकी साधना में सहायता प्रदान करता है। किंतु मात्र ऊचें पर्वतों का एकांत मात्र ही आपको आध्यात्म की और ले जायेगा ऐसा नही हैं। क्योकि हिमालय के क्षेत्र मे निवासरत अनेक लोग भी भारत के मैदानी क्षैत्रों मे रहने वाले लोगो जैसी ही सोच के साथ अपना जीवन यापन करते हैं। हमारे जीवन का निर्माण हमारे अनुभवों, हमारे विचारों और हमारे कार्यो से होता है।  यह सब मन कि गति से सम्बंधित है। 
अत: हमें स्वयं को प्रकृतिमय करना होगा जिस प्रकार समस्त प्रकृति अपना नियत कार्य करती है ठीक उसी प्रकार हमे भी अपने मन में उत्पन्न भावनाओं और अनुभवों को एैन्द्रिय सुख से वास्तविक आनंद की और अग्रसर करें, आत्मा की ओर अग्रसर करें तो यही योग है जो जीवन को काल्पनिक सुख से वास्तिविक आनंद की प्राप्ति के मार्ग मे हमारा सहयात्री है वही योग है। परमपूज्य महर्षि सदैव कहते थे कि भावातीत ध्यान योग शैली वह सरलतम व प्रयासरहित मार्ग है जो हमें परमतत्व से मिलन कराकर आनन्दित कर देता है।

सर्वांग आसन

विधि-सर्वप्रथम हम पीठ के बल आराम के साथ लेट जाते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों की हथेलियों को कमर के बाजू में जमीन पर ऊपर की ओर खुली हुई रखते हैं। दोनों पैरों की एड़ी पंजों को धीरे-धीरे बिना घुटना मोड़े ऊपर की ओर 900 (अंश) के कोण तक ले जाते हैं। दोनों हाथों की हथेलियों की सहायता से पीठ पर सहारा देते हुए कमर वाला भाग ऊपर की ओर आराम के साथ ले जाते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर का वजन दोनों हथेलियों और कुहनियों पर आ जाता है और सीना दाढ़ी के पास आ जाता है। आसन करते समय श्वांस-प्रश्वांस सामान्य रखते हैं और 10 सेकेण्ड से 1 मिनिट तक रुकते हैं। जिस प्रकार शरीर को हाथों व हथेलियों की सहायता से ऊपर ले गये थे ठीक उसी प्रकार जमीन पर धीरे-धीरे वापिस आ जाते हैं। वापस आते समय हाथों की सहायता लेना अनिवार्य है। 
नोट- इस आसन को ताकत लगाकर नहीं करना है। व्यायाम के जैसे न करें। सर्वांग आसन के बाद मत्स्य आसन करना अनिवार्य है। 
लाभ-रक्त संस्थान को व्यवस्थित कर रक्त को शरीर के ऊपरी अंगों में पहुँचाता है। शरीर को सुन्दर बनाता है। अन्त: स्त्रावी ग्रंथियों में लाभकारी है। पाचन संस्थान में लाभकारी है। 
किसे करना है-पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ही इस आसन को करें। 
किसे नहीं करना है-अस्वस्थ व्यक्ति जैसे ज्वर, हृदय रोगी, पीठ दर्द से ग्रसित त्रिकसूल (सायटिका) से पीड़ित व्यक्ति एवं गर्भवती महिलायें इस आसन को न करें।

मत्स्यासन

विधि-सर्वप्रथम हम पीठ के बल आराम के साथ लेट जाते हैं। हथेली कमर के बराबर ऊपर की ओर खुली हुई रखते हैं। दोनों पैरों के एड़ी, पंजे मिलाकर रखते हैं। इसके पश्चात् दोनों घुटनों की सहायता से मोड़कर पद्मासन लगाते हैं तथा जंघा और घुटने जमीन पर रखते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों से पैरों की सहायता लेकर गर्दन वाले भाग को मोड़कर जमीन पर जमा देते हैं। इसके पश्चात् दोनों हाथों से पैरों के अंगूठे पकड़ लेते हैं। इस स्थिति में 10-15 सेकेण्ड तक रुकते हैं। एक बार इसका अभ्यास करते हैं। अब हम जिस प्रकार आसन में गये थे, ठीक उसी प्रकार वापस आ जाते हैं। यह आसन शरीर सामर्थ्य अनुसार करते हैं और धीरे-धीरे हाथों की सहायता से पैरों को सीधा कर लेते हैं व कुछ देर विश्राम करते हैं। 
लाभ-यह आसन शरीर को लचीला बनाता है। श्वसन संस्थान में लाभकारी है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। 
किसे करना है-पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ही इस आसन को करें। 
किसे नहीं करना है-अस्वस्थ व्यक्ति जैसे ज्वर, हृदय रोगी, पीठ दर्द से ग्रसित त्रिकसूल (सायटिका) से पीड़ित व्यक्ति एवं गर्भवती महिलायें इस आसन को न करें।
और ख़बरें >

समाचार

MAHA MEDIA NEWS SERVICES

Sarnath Complex 3rd Floor,
Front of Board Office, Shivaji Nagar, Bhopal
Madhya Pradesh, India

+91 755 4097200-16
Fax : +91 755 4000634

mmns.india@gmail.com
mmns.india@yahoo.in