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पाकिस्तान कब सबक सीखेगा ?

पाकिस्तान कब सबक सीखेगा ?

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 87 दिन 4 घंटे पूर्व
17/08/2019
भोपाल (महामीडिया) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की एक दुर्लभ बैठक बंद कमरे में शुक्रवार को वाशिंगटन में आयोजित की गई और जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भारत के अलग करने की पाकिस्तान की कोशिश एक बार फिर से धराशायी हो गई, क्योंकि चीन को छोड़कर किसी भी सदस्य को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। रूस, फ्रांस और यूके ने कथित तौर पर भारत की स्थिति का समर्थन किया। रूस के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि ने बताया की यह भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं है।
पिछले दो हफ्तों से, भारत इस बात पर अटल रहा है कि जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करना, पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है, जिसका कोई बाहरी संबंध नहीं है और पाकिस्तान को दृढ़ता से बताया कि अगर पाकिस्तान को बातचीत करनी हो तो पहले आतंकवाद रोकना होगा।  
हालांकि यह स्पष्ट है कि चीन और पाकिस्तान दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंच पर अलग-थलग पड़ गए हैं। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत मालेहा लोधी ने यह कहते हुए अपने दांव को बदलने की कोशिश की कि "कई दशकों के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यह मुद्दा उठा है और इस मंच पर उठने के बाद यह साबित हो गया है कि यह भारत का आंतरिक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामला है"। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और उनके राजनयिकों ने जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए विभिन्न देशों से समर्थन हासिल करने की बहुत कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके सभी प्रयास विफल रहे।
हालांकि, शुक्रवार को हुई यूएनएससी की बैठक के परिणाम की घोषणा किसी बयान के माध्यम से घोषित नहीं किये गए क्योंकि परामर्श अनौपचारिक था। बैठक में ना तो भारत और ना ही पाकिस्तान के सदस्यों ने भाग लिया, चीन समेत सुरक्षा परिषद के 5 स्थाई सदस्य और 10 अस्थाई सदस्य ही शामिल हुए थे।  
जब से धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए को निरस्त किया गया, तब से पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ-साथ राजनयिकों में भी एक तरह की निराशा घिरी हुई  है। वो सदमें और घबराहट में जम्मू-कश्मीर के प्रति भारत की पहल का जवाब दे रहे हैं। यहां तक कि, पाकिस्तान नेशनल असेंबली में भी एक उन्माद देखा गया, जिसमें सांसदों ने प्रधानमंत्री इमरान खान को बेइज्जत किया। जिन्होंने अति उत्साहित होकर, अपने सहयोगियों से पूछा: "तुम क्या चाहते हो की मैं क्या करूं ? भारत पर हमला करूं ?" निश्चित रूप से, यह पाकिस्तान के नेतृत्व में हताशा की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
दुनिया जानती है कि पिछले 30 सालों से, पाकिस्तानी सशस्त्र बलों ने सड़क प्रदर्शन और उच्च-प्रेरित आतंकवादियों को कश्मीर घाटी में भेजकर राज्य की नीति को जिहाद के साधन की तरह इस्तेमाल किया है।
हालांकि, भारत पर कम से कम तीन दशकों तक दबाव बनाये रखने के बाद, पाकिस्तान अब खुद को मुश्किलों में फंसता दिखाई दे रहा है। सितंबर 2016 की "सर्जिकल स्ट्राइक" और इस साल फरवरी में भारत द्वारा किये गये बालाकोट हवाई हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पार के किसी भी आतंकवादी हमले का जवाब भी जवाबी कार्रवाई के साथ दिया जाएगा और इसका परिणाम आखिरकार युद्ध भी हो सकता है।
पाकिस्तानी विचारकों को अब यह डर है कि अगर अब कश्मीर में कोई हिंसा होती है, तो पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाएगा और भारतीयों की तरफ से भी तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। चरमपंथ के साथ अपने स्थापित जुड़ाव के कारण, पाकिस्तान की विश्वसनीयता बहुत कम है। दुनिया के प्रमुख राष्ट्र अन्य चिंताओं से विचलित हैं - खाड़ी संकट, ब्रेक्सिट, यूक्रेन, चीन-अमेरिकी व्यापार युद्ध, उत्तर कोरिया। यही कारण है कि पाकिस्तान को समर्थन देने के लिए कोई भी देश आगे नहीं आया है, जिसकी उसे बहुत उम्मीद थी । बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इससे कोई सबक सीखेगा?

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