महामीडिया न्यूज सर्विस
पूर्वजों को याद करने के दिन हैं पितृ-पक्ष

पूर्वजों को याद करने के दिन हैं पितृ-पक्ष

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 40 दिन 46 मिनट पूर्व
08/09/2019
भोपाल [ महामीडिया ]  अनंत चतुर्दशी के अगले दिन से देश में 16 दिवसीय श्राद्ध-पक्ष का प्रारंभ होता है। भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक घरों में पितरों की मोक्ष-प्राप्ति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का पर्व चलता है। इसे महालया इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि नौदुर्गा महोत्सव नौ दिन का होता है, गणपति उत्सवदस दिन का होता है, पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है। गरुड़, विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों कठोपनिषद् एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में पितृ-पक्ष का उल्लेख मिलता है।दुनिया की लगभग सभी सभ्यताओं में पितृपक्ष से मिलती-जुलती परंपराओं का अस्तित्व है। हर सभ्यता में यह अलग समय और अलग तरह से मनाया जाता है। चीन में चोंगयाग और क्विंगमिंग, बौद्धों में उल्लमबाना, जापान में ओबोन, यूरोप में ऑल सेंट्स डे और ऑल सेंट्स डे, अमेरिका में हैलोवीन और इस्लाम में शब-ए-बारात जैसी परंपराएं अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मनाई जाती है। हमारे देश में भी उत्तर और उत्तर-पूर्व भारत में श्राद्ध पक्ष, तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से मनाया जाता है।हिन्दू धर्म शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋणों का उल्लेख मिलता है - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन तीनों में पितृ ऋण सबसे बड़ा है और इस ऋण से मुक्ति के लिए ही हमारे पूर्वजों ने श्राद्ध का विधान बनाया था।12 महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) 7वें माह आश्विन के प्रथम 16 दिन में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है। सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है।उपरोक्त ज्योतिषीय पारंपरिक गणना का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी कहा गया है कि आपको सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी यानी बैकबोन का मजूबत होना बहुत आवश्यक है, जो शरीर के लगभग मध्य भाग में स्थित है और जिसके चलते ही हमारे शरीर को एक पहचान मिलती है।उसी तरह हम सभी जन उन पूर्वजों के अंश हैं अर्थात हमारी जो पहचान है यानी हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत बनी रहे उसके लिए हर वर्ष के मध्य में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करें और हमें सामाजिक और पारिवारिक पहचान देने के लिए श्राद्ध कर्म के रूप में अपना धन्यवाद अर्थात अपनी श्रद्धाजंलि दें।ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है।पितृ-पक्ष में तर्पण और श्राद्ध सामान्यत: दोपहर 12 बजे के लगभग करना ठीक माना जाता है। इसे किसी सरोवर, नदी या फिर अपने घर पर भी किया जा सकता है। परंपरा अनुसार, अपने पितरों के आवाहन के लिए भात, काले तिल व घी का मिश्रण करके पिंड दान व तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात विष्णु भगवान व यमराज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ अपने पितरों की पूजा भी की जाती है। अपनी तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वजों की पूजा करने की मान्यता है।पित पृक्ष में पिंड दान अवश्य करना चाहिए ताकि देवों व पितरों का आशीर्वाद मिल सके। अपने पितरों के पसंदीदा भोजन बनाना अच्छा माना जाता है। सामान्यत: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कद्दू की सब्जी, दाल-भात, पूरी व खीर बनाना शुभ माना जाता है।पूजा के बाद पूरी व खीर सहित अन्य सब्जियां एक थाली में सजाकर गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना अति आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर ही पितरों को सही मायने में भोजन प्राप्त होता है, क्योंकि पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे शु्द्ध घी का दिया जलाकर गंगा जल, दूध, घी, अक्षत व पुष्प चढ़ाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।यह महत्वपूर्ण है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्ना करना चाहिए। विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति जो नाना प्रकार के पकवान बनाकर अपने पितरों को विशेष भोजन अर्पित करने में सक्षम नहीं हैं, वे यदि मोटा अनाज या चावल या आटा और यदि संभव हो तो कोई सब्जी-साग व फल भी यदि पितरों को प्रति पूर्णआस्था से किसी ब्राह्मण को दान करता है तो भी उसे अपने पूर्वजों का पूरा आशीर्वाद मिल जाता है। यदि मोटा अनाज व फल देना भी मुश्किल हो तो वो सिर्फ अपने पितरों को तिल मिश्रित जल को तीन ऊंगलियों में लेकर तर्पण कर सकता है, ऐसा करने से भी इसे पूरा माना जाता है।

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