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विद्यालयों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने की जरूरत

विद्यालयों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने की जरूरत

admin | पोस्ट किया गया 83 दिन 7 घंटे पूर्व
19/09/2019
भोपाल (महामीडिया) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने पर जोर देने के वाले बयान से उपजे विवाद और दक्षिणी राज्यों में इस पर छिड़े विरोध के बीच, उत्तराखंड सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा तीन से आठवीं तक में संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने का  फैसला लिया है।  राज्य के शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ने कहा, "संस्कृत हमारी प्राचीन और देवताओं की भाषा है। हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस भाषा ने जितना हमारी संस्कृति को समृद्ध बनाया है उसका कोई हिसाब नहीं है।"
इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि राज्य के शिक्षा विभाग ने राज्य में संचालित सभी सरकारी और निजी स्कूलों में इस फैसले को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। राज्य शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संस्कृत को पाठ्यक्रम में लागू करने के लिए जल्द ही दिशा-निर्देश जारी किये जाएंगे ।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, केवल 24,821 लोगों ने संस्कृत को अपनी मातृभाषा के रूप में पंजीकृत किया है, जबकि 14,135 लोगों ने 2001 में संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताया था। अफसोस की बात यह है कि भारत की कुल आबादी में १ % से भी कम लोगों द्वारा  संस्कृत बोली जाती है। ज्यादातर धार्मिक समारोहों के दौरान हिंदू पुजारी द्वारा ही संस्कृत का उपयोग किया जाता है। हालांकि यह भारत की आधिकारिक भाषाओं में से एक है और देश की एक शास्त्रीय भाषा के रूप में लोकप्रिय है। संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहा जाता है और इसे "देव वाणी" (ईश्वर की भाषा) भी कहा जाता है - जैसा कहा जाता है कि ब्रह्मा ने आकाशीय पिंडों के ऋषियों से इस भाषा का परिचय कराया था।
संस्कृत देवनागरी में लिखी गई है और भारत के अलावा, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों, जापान, चीन और थाईलैंड के कई बौद्ध विद्वान भी इस भाषा का उपयोग करते हैं। इसलिए, यह हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों में एक औपचारिक भाषा के रूप में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है। वैदिक संस्कृत, संस्कृत भाषा का सबसे प्रारंभिक रूप था (लगभग 1500-200 ईसा पूर्व), जब 'ज्ञान' को मौखिक रूप से अपनी पीढ़ियों के माध्यम से सौंप दिया जाता था।
संस्कृत एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित भाषा है। इसमें कोई शक नहीं, इसका साहित्य मानव जाति के इतिहास का सबसे सरल साहित्य है। पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी संस्कृत के महत्व और गुणवत्ता को समझा है, यही कारण है कि वे इसे कंप्यूटर के साथ प्रयोग करने के लिए सबसे अच्छी भाषा मानते है। अधिकांश लोग सोचते हैं कि हिंदी या कोई अन्य उत्तर भारतीय भाषा संस्कृत की सबसे निकटतम आधुनिक भाषा है। लेकिन कई इतिहासकारों और भाषाविदों का कहना है कि लिथुआनियाई, संस्कृत की सबसे करीबी आधुनिक भाषा है, जिसमें लात्विया दूसरे क्रम पर आती है। 
इसलिए हमारी आने वाली पीढ़ियों को संस्कृत भाषा के महत्व के बारे में जानकारी होनी चाहिए। उन्हें इसके मंत्रों, श्लोकों की मूल बातें सीखनी चाहिए, जो ध्वनि कंपन के संयोजन से बनाई गई हैं, जो कि पाठ करने पर मन और मानस पर एक विशिष्ट प्रभाव डालती है। इसलिए संस्कृत भाषा की समृद्धि कल्पना से परे है।

प्रभाकर पुरंदरे
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