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श्री गुरुदेव की कृपा का फल

श्री गुरुदेव की कृपा का फल

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 29 दिन 3 घंटे पूर्व
23/09/2019
भोपाल (महामीडिया) महर्षि जी ने स्थापत्यवेद-वास्तु विद्या के अनेक पाठ्यक्रम बनवाये और अपने सभी केंन्द्रों और शैक्षणिक संस्थानों में इसे उपलब्ध करवाया। साथ ही सारे विश्व में वास्तु परामर्श देने की व्यवस्था भी की। महर्षि जी ने ज्योतिष विद्या की खोती हुई प्रतिष्ठा पुन: प्रतिस्थापित की। सैकड़ों ज्योतिषी विभिन्न देशों में भ्रमण कर परामर्श देते रहे और उनके फलादेश के आधार पर व्यक्तियों और राष्ट्रों के लिये ग्रहशांति, यज्ञों और अनुष्ठानों की स्थायी व्यवस्था कर दी गई। महर्षि जी ने मध्य प्रदेश में 4 महर्षि महाविद्यालयों की स्थापना की जिनमें अब तक प्रमुख रूप से शिक्षा सम्बन्धी पाठ्यक्रम संचालित होते रहे हैं। अब इन महाविद्यालयों में अन्य पाठ्यक्रम भी उपलब्ध होंगे। भारत में और सम्पूर्ण विश्व में इतनी बड़ी संख्या में विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और शिक्षण केन्द्र स्थापित करने के पीछे आखिर क्या उद्देश्य था?
शिक्षा देने वाले संस्थानों की कमी नहीं है, किन्तु किसी भी संस्थान में समस्त ज्ञान के स्त्रोत, जीवन के आधार, जीवन को संचालित करने वाले परम तत्व "आत्मा" चेतना की शिक्षा नहीं दी जाती। वास्तव में शिक्षा तभी पूर्ण होती है जब उसके तीनों तत्वों का ज्ञान विद्यार्थी को मिले- ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञान प्राप्ति की क्रिया। आज की शिक्षा में 'ज्ञाता' के विषय कोई ज्ञान नहीं दिया जाता। जीवन के तीन तत्व अध्यात्म, अधिदेव और अधिभूत में से भौतिक जीवन की शिक्षा तो दी जाती है, महर्षि जी ने शिक्षा में अध्यात्म और अधिदेव का समावेश करके शिक्षा को पूर्ण बना दिया। केवल पुस्तकीय और मष्तिष्क में भरा ज्ञान क्या करेगा? ज्ञान का घर तो चेतना है, आत्मा है। 'ज्ञानम् चेतनायाम् निहितम्'। महर्षि जी ने बताया कि केवल ज्ञान के भण्डार को भरदेने से विद्यार्थी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं निखरेगा, ज्ञान के भण्डार का विस्तार भी करते रहना होगा और उसे भरते जाना भी होगा। केवल पूर्ण ज्ञानी मनुष्य ही सभी अर्थों में सक्षम मानव होगा। उसका जीवन सुखमय, समृद्धिमय, शांतिमय, विजयी, अजेय, दूसरों को सुख देने वाला, सकारात्मक और भूतल के स्वर्ग के आनन्द वाला जीवन होगा। 
इस तरह की चेतनावान, सर्वसमर्थता और सर्वव्यापकता वाला मनुष्य ही सब कुछ कर पाने में सब कुछ पा लेने की योग्यता रखेगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में-शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा, पर्यावरण, पुनर्वास, व्यापार-व्यवसाय, प्रशासन आदि के क्षेत्रों में ऐसा व्यक्ति सफल होगा। यह हमारे प्रतिभारत भारतवर्ष के ज्ञान-विज्ञान की महती परम्परा है जो कालवश लुप्तप्राय हो रही थी, लेकिन महर्षि जी ने इसे पुनर्जाग्रत करके सम्पूर्ण विश्व में पुनर्स्थापित कर दिया है। भौतिक शरीर से महर्षि जी हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनका पुनर्गठित, पुनर्स्थापित यह सत्य, सनातन, शाश्वत् ज्ञान हजारों लाखों वर्षों तक पुन: जाग्रत रहकर मानव कल्याण करता रहेगा। 
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्
दु:खभाग्भवेत्।।
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
महर्षि जी की यह दोनों अभिव्यक्तियाँ अतिप्रिय थीं। आइये हम सब मिलकर उनके देवीय आशीर्वाद की छत्रछाया में संकल्प लें कि समस्त चराचर विश्व के कल्याणार्थ महर्षि जी के समस्त संकल्प शीघ्र ही पूर्ण हों। श्री गुरूपूर्णिमा के पावन पर्व पर हम अपनी वैदिक गुरू परम्परा, गुरूदेव स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज और महर्षि महेश योगी जी के श्रीचरणो में अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। 
ऐंकार ह्रींकार रहस्ययुक्त: श्रींकार गुढार्थ महाविभूत्या।
ॐकार मर्मप्रतिपादिनीभ्यां नमो नम: श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।
काले वर्षतु पर्जन्य: पृथिवी शस्यशालिनी।
लोकोऽयं क्षोभरहित: सज्जना: सन्तु निर्भया:।।
गुरुपूर्णिमा में गुरूदेव का पूजन करके अपने लोगों ने अपनी चेतना में गुरुतत्व अनुप्राणित किया है, संहिता तत्व अनुप्राणित किया है, ब्रह्म तत्व अनुप्राणित किया है। विद्या तत्व की सफलता पाई है, ये गुरुदेव का ही प्रसाद है कि सब कुछ सरल हो गया है। सारी विश्वचेतना को इतना पावन कर देना कि कहीं कोई समस्या न रहे, यह अत्यन्त सरल हो गया है, ये गुरुतत्व का प्रभाव है, प्रत्यक्ष है, गुरूदेव का प्रत्येक गुरूपूर्णिमा में पूजन करते-करते विश्व चेतना इस महान उपलब्धि पर पहुँची है। विश्व चेतना में इतना वैभव का जागरण, इसमें इतनी निर्मलता का जागरण, इसमें इतना संहिता तत्व के जागरण हेतु केवल गुरुकृपा, क्रिया सिद्धि: सत्वे भवति महताम् नोपकरणे, हमारे पास कोई साधन नहीं था सिवा इसके कि गुरुचरणों में एक अभिन्न निष्ठा थी। सिवाय गुरुदेव के हमको जीवन में कुछ सूझा नहीं। सारे विश्व में कितनी घटनायें घटी, कितना ऊहापोहु हुआ, विश्व चेतना में कितनी पवित्रता जागी, हमें इन चीजों से भीतर से कोई सम्बन्ध न था। केवल जय गुरुदेव, जय गुरु देव, जय गुरुदेव कहते रहे, गुरुदेव का पूजन करते रहे, सारे विश्व की जनता में जीवन के सम्बन्ध में एक आशा बंधी, कुछ जीवन की वास्वतिकता का लोगों को अनुभव हुआ।
(महर्षि महेश योगी जी के तपोनिष्ठ शिष्य)

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