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गाँधी जयंती की 150वीं जयंती आज

गाँधी जयंती की 150वीं जयंती आज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 21 दिन 10 घंटे पूर्व
02/10/2019
 नई दिल्‍ली [  महामीडिया ]क्‍या आपने सुना है कि कभी किसी अपराधी ने अदालत में अपने ऊपर लगे देशद्राह के आरोप स्‍वीकार कर लिए हों और सुनवाई कर रहे जज ने आरोपी के सामने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया हो।हां, ऐसा तब हुआ था, जब पूरा भारत एकजुट होकर ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए लड़ रहा था। स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान मार्च, 1922 में लाखों भारतीयों का नेतृत्‍व कर रहे महात्‍मा गांधी पर यंग इंडिया  में देशद्रोहपूर्ण लेख लिखने के लिए मुकदमा चलाया गया था।प्रारंभिक सुनवाई में ही 11 मार्च, 1922 को महात्‍मा गांधी ने कोर्ट में स्‍वीकार कर लिया कि ये लेख मैंने ही लिखे हैं।बाद में इस केस को ग्रेट ट्रायल  के नाम से जाना गया.सुनवाई की शुरुआत में परिचय देते हुए महात्‍मा गांधी ने अपना व्‍यवसाय किसान और बुनकर बताया।उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि हां, मैं अपराधी हूं. मुकदमा लंबित रहने तक उन्‍हें साबरमती जेल में रखा गया. प्रारंभिक सुनवाई के बाद 18 मार्च को मामला अहमदाबाद के सर्किट हाउस में जस्टिस सीएन ब्रूमफील्‍ड की अदालत में पहुंचा।अभियोग पढ़े जाने के बाद जस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने कहा कि ये आरोप ब्रिटिश भारत में सरकार के प्रति असंतोष फैलाने के प्रयास से जुड़े हैं. इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा-124ए के तहत दंडनीय अपराध है।आरोप है कि महात्‍मा गांधी ने 29 सितंबर 1921, 15 दिसंबर 1921 और 23 फरवरी 1922 को यंग इंडिया में तीन लेख लिखकर सरकार के खिलाफ असंतोष भड़काया है।इसके बाद महात्‍मा गांधी के लिखे गए 'वफादारी से छेड़छाड़' 'पहेली और इसके समाधान'  और 'प्रेतों को हिलाना'  लेखों को कोर्ट में पढ़ा गयाजस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने गांधी जी से पूछा कि क्या वे दोष स्वीकार करते हैं या वकालत करने का दावा करते हैं।इस पर महात्‍मा गांधी ने कहा, 'मैं सभी आरोपों के लिए खुद को दोषी स्वीकारता हूं.' जस्टिस ब्रूमफील्‍ड तुरंत अपना फैसला देना चाहते थे, लेकिन सरकारी वकील सर जेटी स्ट्रेंजमैन ने जोर दिया कि मुकदमे की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।उन्‍होंने जज से बंबई, मालाबार और चौरी-चौरा में दंगा व हत्याओं का ध्यान रखने को कहा. उन्होंने कहा कि इन लेखों में अहिंसा पर तो जोर दिया गया है, लेकिन अगर आप लगातार सरकार के प्रति असंतोष का उपदेश देते हैं और उसे एक विश्वासघाती सरकार सिद्ध करते हैं तो खुले तौर पर जानबूझकर दूसरों को उसे उखाड़ फेंकने के लिए भड़काने की कोशिश करते हैं. लिहाजा, जज सजा सुनाते समय इस पर भी विचार करें.महात्‍मा गांधी के आरोप स्‍वीकार करने के बाद जस्टिस ब्रूमफील्‍ड तुरंत फैसला सुनाना चाहते थे, लेकिन सरकारी वकील सर जेटी स्ट्रेंजमैन ने कई और बिंदुओं पर विचार करने को कहा.जस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने महात्‍मा गांधी से कहा कि क्या आप सजा के सवाल पर कोई बयान देना चाहते हैं? इसके बाद महात्‍मा गांधी कोर्ट में दिए बयान में कहा, 'मैं अपने बारे में सरकारी वकील की टिप्पणी को सही मानता हूं. मैं कोर्ट से छिपाना नहीं चाहता हूं कि सरकार की मौजूदा प्रणाली के खिलाफ असंतोष का प्रचार करना मेरे लिए एक जुनून बन गया है।यह मेरा कर्तव्य है, जिसे मुझे निभाना होगा।मैं बंबई, मद्रास और चौरी-चौरा की घटनाओं को लेकर लगाए गए आरोपों को स्‍वीकार करता हूं।मुझे लगता है कि चौरी-चौरा के खतरनाक अपराधों या बंबई के दंगों से खुद को अलग करना मेरे लिए असंभव है।मुझे छोड़ा गया गया तो मैं फिर ऐसा ही करूंगा.महात्‍मा गांधी ने आगे कहा, 'मैं हिंसा से बचना चाहता थाअहिंसा मेरे विश्वास का पहला लेख है. लेकिन, मुझे अपना चयन करना था. या तो मैं एक ऐसी व्‍यवस्‍था के सामने समर्पण कर देता, जिसने मेरे देश को नुकसान पहुंचाया था या अपने लोगों के गुस्‍से का जोखिम उठाना पड़ता, जो मुझसे सच जानने के बाद उनके अंदर भड़का. इसलिए मैं एक हल्की सजा के लिए नहीं बल्कि इस अपराध में सबसे बड़ी सजा के लिए तैयार हूं।मैं दया के लिए प्रार्थना नहीं करता।मैं किसी भी मौजूदा अधिनियम की वकालत नहीं करता। इसलिए मैं इस मामले में सबसे बड़ी सजा भुगतने को तैयार हूं।न्यायाधीश के रूप में आपके लिए केवल एक रास्‍ता खुला है कि या तो आप पद से इस्तीफा दे दें या मुझे गंभीर सजा दें.बापू ने इसके बाद लिखित बयान पढ़ते हुए कहा, 'भारत और इंग्लैंड की जनता को यह बताना जरूरी है कि मैं एक सहयोगी से असंतोष पैदा करने वाला क्यों बन गया हूंमैं अदालत को भी बताऊंगा कि मैंने भारत में सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ावा देने के आरोप में खुद को दोषी क्यों माना है?' उन्‍होंने बताया कि ब्रिटिश सत्ता के साथ मेरा पहला संपर्क दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जो अच्छा नहीं था. मुझे पता चला कि एक व्यक्ति के रूप में मेरे पास कोई अधिकार नहीं था क्योंकि मैं एक भारतीय था. मैंने स्वतंत्र रूप से इसकी आलोचना की, लेकिन सरकार को सहयोग दिया.महात्‍मा गांधी ने कोर्ट से कहा कि मैंने हर बार मुश्किल समय में ब्रिटिश हुकूमत का सहयोग किया, लेकिन समय के साथ मेरी सारी उम्‍मीदें टूट गईं.बापू ने कहा कि जब 1899 में बोअर चुनौती के कारण ब्रिटिश साम्राज्य को खतरा खड़ा हुआ, तब मैंने अपनी सेवाओं की पेशकश की. साल 1906 में ज़ुलु विद्रोह के समय मैंने एक स्ट्रेचर वाहक पार्टी बनाई और अंत तक सेवा की. दोनों मौकों पर मुझे पदक मिला. दक्षिण अफ्रीका में लॉर्ड हार्डिंग ने मुझे केसर-ए-हिंद का स्वर्ण पदक दिया. 1914 में इंग्लैंड और जर्मनी के युद्ध के समय मैंने लंदन में प्रवासी भारतीयों के साथ मिलकर स्वयंसेवक एम्बुलेंस कारें शुरू कीं. वहीं, 1918 में दिल्ली में लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने भारत में युद्ध के लिए रंगरूटों की भर्ती के लिए अपील की तो मैंने एक टुकड़ी बनाने के लिए संघर्ष किया. सेवा के इन प्रयासों के दौरान मुझे विश्वास था कि इस तरह से भारतीयोंं के लिए ब्रिटिश साम्राज्य में पूर्ण समानता का दर्जा हासिल किया जा सकता था.महात्‍मा गांधी ने कहा कि मुझे पहला झटका रोलेट एक्ट से लगा, जो लोगों से सभी प्रकार की स्वतंत्रता छीनने के लिए बनाया गया था. मैंने इसके खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया. इसके बाद जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के साथ पंजाब में भयावहता की शुरुआत हुई. मैंने 1919 में अमृतसर कांग्रेस में दोस्तों की कड़ी चेतावनी के बावजूद इस उम्मीद से ब्रिटिश हुकूमत का सहयोग किया कि पंजाब के घाव भरे जाएंगे. लेकिन, सभी आशाएं बिखर गईं. खिलाफत के वादे को पूरा नहीं किया गया. पंजाब के अपराध पर पुताई कर दी गई और अधिकांश अपराधियों को ना केवल सजा से बचाया गया, बल्कि वे सेवा में भी बने रहे. कुछ को भारतीय राजस्व से पेंशन देना जारी रखा गया. कुछ मामलों में तो उन्हें पुरस्कृत भी किया गया.जस्टिस ब्रूमफील्‍ड के कोर्ट में महात्‍मा गांधी ने कहा, 'मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ब्रिटिश संबंधों ने भारत को राजनीतिक और आर्थिक रूप से इतना असहाय कर दिया था जितना वह पहले कभी नहीं रहा था. आज भारत के पास किसी हमलावर से निपटने की क्षमता नहीं है. भारत इतना गरीब हो गया है कि अकाल से निपटने की शक्ति भी नहीं बची है. भारत के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग को बेरहमी से बर्बाद कर दिया गया है. छोटे से शहरों में रहने वाले लोग भूख का शिकार हो रहे हैं. कोई भी कुतर्क, आंकड़ों में हेरफेर कई गांवों में दिखने वाले कंकालों के बारे में लिखने से नहीं रोक सकता. भारत में विदेशी शोषक की सेवा करने के लिए कानून का इस्तेमाल किया गया है.'जस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने देशद्रोहपूर्ण लेख लिखने के मामले में महात्‍मा गांधी को छह साल कैद की सजा सुनाई. पहले उन्‍हें साबरमती जेल भेजा गया. इसके बाद पुणे की यरवदा जेल में भेज दिया गया.महात्‍मा गांधी ने कहा, 'मुझ पर धारा-124ए के तहत आरोप लगाए गए हैं. यह कानून नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया है. मेरा मानना है कि अगर किसी के मन में एक व्यक्ति या व्‍‍‍‍‍‍‍‍यवस्‍था के खिलाफ असंतोष है तो उसे विरोध की आजादी होनी चाहिए. लेकिन, इस धारा के तहत असंतोष जताना ही अपराध है. मुझे लगता है कि सरकार के प्रति असंतुष्‍ट होना पुण्य माना जाना चाहिए. मेरा विश्वास है कि भारत और इंग्लैंड की मौजूदा स्थिति के प्रति असहयोग का रास्ता दिखाकर मैंने सेवा ही की है. मेरी राय में बुराई के साथ असहयोग करना अच्छाई के साथ सहयोग करने से ज्‍यादा जरूरी है. मैं यहां मुझे दी जाने वाली बड़ी से बड़ी सजा के लिए तैयार हूं.महात्‍मा गांधी के इस बयान पर जस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने बापू के सामने सिर झुकाया और सजा सुनाई. सजा सुनाते हुए उन्‍होंने कहा, 'एक न्‍यायसंगत सजा निर्धारित करना बहुत मुश्किल है. मैंने अब तक जितने भी लोगों के खिलाफ सुनवाई की है या भविष्‍य में सुनवाई करूंगा, आप उन सबसे अलग व्‍यक्ति हैं. आपसे राजनीतिक मतभेद रखने वाले लोग भी आपको उच्‍च आदर्शों पर चलने वाले और संत के तौर पर मानते हैं.' वरिष्‍ठ गांधीवादी लेखक प्रमोद कपूर ने महात्‍मा गांधी की जीवनी में लिखा है कि इसके बाद जस्टिस ब्रूमफील्‍ड ने बापू को छह साल कैद की सजा सुनाते हुए कहा कि अगर सरकार इस सजा को कम कर दे तो मुझसे ज्‍यादा खुश कोई नहीं होगा. इसके बाद उन्‍होंने एक बार फिर महात्‍मा गांधी के सामने सिर झुकाया. इस पर महात्‍मा गांधी ने कहा कि कोई भी जज मुझे इस अपराध में इससे कम सजा नहीं दे सकता था. इसके बाद उन्‍हें साबरमती जेल ले जाया गया. दो दिन बाद उन्‍हें पुणे की यरवादा जेल भेज दिया गया।


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