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देवी कात्यायनी की उपासना से इन ग्रहों की पीड़ा से मिलती है मुक्ति

देवी कात्यायनी की उपासना से इन ग्रहों की पीड़ा से मिलती है मुक्ति

admin | पोस्ट किया गया 19 दिन 10 घंटे पूर्व
04/10/2019
भोपाल [ महामीडिया]   नवरात्रि के छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी की आराधना से भक्तों के सभी दुखों का नाश होता है और वह सभी सुखों की प्रप्ति होती है। कात्यायनी माता का शास्त्रों में भी बड़ा महत्व बताया गया है। गोपियों को इनकी पूजा से श्रीकृष्ण की प्राप्ति हुई थी। ज्योतिष में देवी का संबंध बृहस्पति और शुक्र ग्रह से है।कन्याओं के शीघ्र विवाह में देवी कात्यायनी की पूजा का विशेष महत्व है। सफल और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कात्यायनी देवी की उपासना की जाती है। कुंडली में वैवाहिक योग के कम होने पर इस दोष को दूर करने के लिए माता कात्यायनी की आराधना की जाती है। यह भी मान्यता है कि महिलाओं के विवाह से संबंधित होने की वजह से देवी का संबंध बृहस्पति से है और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए देवी का संबंध शुक्र ग्रह से है। इन दोनों ग्रहों के अत्यंत तेजस्वी होने के कारण माता का तेज भी अद्भुत है।माता कात्यायनी की पूजा में लाल या पीले वस्त्र धारण करें। कुमकुम, अक्षत, मेंहदी, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेंहदी और वस्त्र समर्पित करें। माता को गाय के घी का दीपक लगाकर धूपबत्ती लगाएं। पीले सुगंधित फूल और नैवेद्य में भी पीले मिष्ठान्न चढ़ाएं। देवी को 3 गांठ हल्दी की चढ़ाएं और इनको अपने पास रख लें। माता को शहद अर्पित करें। शहद को चांदी के या मिटटी के पात्र में समर्पित करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा। माता को शहद चढ़ाने से साधक की आकर्षण क्षमता में वृद्धि होगी और प्रभाव भी बढ़ेगा।
देवी कात्यायनी के मंत्र-
चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
माता कात्यायनी का ध्यान
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
माता कात्यायनी का स्तोत्र
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
देवी कात्यायनी का कवच
कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥


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