महामीडिया न्यूज सर्विस
चीनी राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री मोदी ने भेंट की खास पेंटिंग

चीनी राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री मोदी ने भेंट की खास पेंटिंग

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 40 दिन 12 घंटे पूर्व
12/10/2019
मामल्लपुरम[ महामीडिया ] दो दिन के भारत दौरे पर आए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री ने कल दोपहर बाद 5 घंटे बिताए। इस दौरान दोनों के बीच कईं मुद्दों पर चर्चा हुई। यही वो मौका था जब चीनी राष्ट्रपति अपने साथ लाया दोस्ती का तोहफा प्रधानमंत्री को देते और प्रधानमंत्री ने भी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक खास तोहफात दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने जिनपिंग से मुलाकात के दौरान उन्हें भेंट में नाचियरकोइल और तंजावुर की पेंटिंग दी। नाचियरकोइल दरअसल सोने की परत चढ़ा छह फीट लंबा अन्नम दीप है। जबकि तीन फीट लंबी तंजावुर पेंटिंग में मां सरस्वती को नृत्य की मुद्रा में दर्शाया गया है।शुक्रवार को हुई प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग की दूसरी अनौपचारिक मुलाकात पूरी तरह से तमिलनाडु के रंग में रंगी रही। जहां प्रधानमंत्री मोदी पारंपरिक तमिल ड्रेस में नजर आए वहीं डिनर में भी तमिल खाने की छाप रही। लिहाजा, मोदी की ओर से दिए जा रहे बेशकीमती तोहफों पर भी इस दक्षिण भारतीय राज्य की पूरी छाप है।पीएम मोदी द्वारा दिए गए तोहफे में तमिलनाडु की परंपराओं और संस्कृति का प्रतीक अन्नम दीप कांस्य का बना है जिस पर सोने की परत चढ़ाई गई है। छह फीट लंबे दीप का वजन 108 किलोग्राम है। इसका बेस गोलाकार और बेहद सुंदर अलंकरण से सुसज्जित है। इस पर तीन स्तरों में घुमावदार बेलें बनी हुई हैं। दीप के ऊपरी सिरे में पांच दीये लगे हैं जिसमें ज्योति जलाई जाती है। सबसे ऊपर अन्नम नाम के पक्षी की प्रतिमा बनी है। कहा जाता है कि यह पक्षी दूध को पानी से अलग करने में सक्षम होता है। अन्नम नाम के पक्षी को पवित्रता, समृद्धि, दिव्यता और बेजोड़ सुंदरता से जोड़कर देखा जा सकता है। कारीगरों को इसे बनाने में 12 दिन से अधिक का समय लगा।इसी तरह से नृत्य करते हुए सरस्वती देवी की नृत्य करती हुई तंजावुर पेंटिंग तीन फीट ऊंची और चार फीट चौड़ी है। पेटिंग में सरस्वती को वीणा बजाते हुए और मगन होकर नाचते हुए दिखाया गया है। इसे बनाने में 45 दिन लगे थे। मोतियों से कढ़ी यह पेंटिंग लकड़ी के फ्रेम से मढ़ी है। तमिलनाडु के तंजावुर शहर की यह कारीगरी "पल्लगई पतम" कहलाती है। यह पेंटिंग तंजावुर की 16वीं और 18वीं सदी की प्राचीन कला है।
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