महामीडिया न्यूज सर्विस
मप्र में दादी की राह पर चल सकते हैं सिंधिया

मप्र में दादी की राह पर चल सकते हैं सिंधिया

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 32 दिन 10 घंटे पूर्व
13/10/2019
भोपाल (महामीडिया) मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ और गुना से पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच पनपी जंग बढ़ती ही जा रही हैं। कमलनाथ को घेरते हुए अब सिंधिया ने मध्य प्रदेश में किसानों की कर्ज माफ़ी को मुद्दा बनाया है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिराजे सिंधिया के बीच का टकराव पुष्टि कर रहा है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी जहां गहरी है तो वहीं विरोध के स्वर भी बुलंद हैं। 
मध्यप्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से ये कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या सूबे में एक बार फिर सिंधिया 'राजघराने' की चहारदीवारी के भीतर प्रदेश कांग्रेस सरकार के पतन की पटकथा रची जा रही है! ठीक वैसी ही पटकथा जैसी कि करीब आधी सदी पहले 1967 में पूर्व ग्वालियर रियासत में महारानी रहीं विजयाराजे सिंधिया ने रची थी। विजयाराजे ने विधायकों को साध कर सरकार गिराई थी। 
बता दें ज्योतिरादित्‍य की दादी राजमाता विजयाराजे उस समय कांग्रेस में हुआ करती थीं और मध्यप्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार थी। युवक कांग्रेस के एक जलसे में भाषण करते हुए डीपी मिश्र ने राजे-रजवाड़ों को लेकर एक तीखा कटाक्ष कर दिया। जलसे में मौजूद विजयाराजे सिंधिया को वह कटाक्ष बुरी तरह चुभ गया। उन्होंने मिश्र को सबक सिखाने की ठानी। उन्होंने मिश्र से असंतुष्ट कांग्रेस विधायकों को गोलबंद करना शुरू किया। किसी समय मिश्र के बेहद करीबी रहे गोविंद नारायण सिंह को भी वे अपने पाले में ले आने में वे सफल हो गईं। गोविंद नारायण सिंह भी विंध्य इलाके की रीवा रियासत से ताल्लुक रखते थे। उधर विधानसभा में विपक्ष भी पहली बार अच्छी-खासी संख्या में मौजूद था। जनसंघ के 78 और सोशलिस्ट पार्टी 32 विधायक थे। इसके अलावा निर्दलीय व अन्य छोटे दलों के विधायकों को भी विजयाराजे ने साध लिया था। जब कांग्रेस के 36 विधायक उनके साथ हो गए तो उन्होंने विधानसभा में डीपी मिश्र की सरकार को ही गिरा दिया। डीपी मिश्र की सरकार गिरने के बाद गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकार बनी। वह देश की पहली संविद सरकार थी। 
इस समय भी मध्यप्रदेश के राजनीतिक हालात कमोबेश 5 दशक पहले जैसे ही हैं। विधानसभा में सत्तापक्ष और विपक्ष के संख्याबल के लिहाज से भी और सत्तारूढ़ दल की अंदरुनी कलह के मद्देनजर भी। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में सूबे के शीर्ष नेताओं के बीच जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के आक्रामक तेवर को देखकर लगता हैं कि राज्य में कांग्रेस सरकार का पतन तय हैं। सूबे का मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में पिछड़ जाने और फिर अप्रत्याशित रूप से लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद सिंधिया इस समय पार्टी एक तरह से भूमिकाविहीन हैं। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन के लिए बनी छानबीन समिति का अध्यक्ष बनाया था, लेकिन सिंधिया इस जिम्मेदारी से संतुष्ट नहीं थे। वे अपने गृह प्रदेश में कांग्रेस संगठन का मुखिया और प्रकारांतर से राज्य में सत्ता का दूसरा केंद्र बनना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता का दूसरा केंद्र बनकर ही वे राज्य में सत्ता का पहला केंद्र यानी मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने माना कि उनकी सरकार का किया हुआ कर्जमाफी का वादा पूर्णतया पूरा नहीं हुआ है। ध्यान रहे कि इससे पहले दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा था कि सूबे के किसानों के साथ धोखा हुआ है इसलिए राहुल गांधी को किसानों से माफी मांगनी चाहिए।

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