महामीडिया न्यूज सर्विस
अंतर्मन को आलोकित करने वाला पर्व है "दीपावली"

अंतर्मन को आलोकित करने वाला पर्व है "दीपावली"

admin | पोस्ट किया गया 32 दिन 9 घंटे पूर्व
21/10/2019
भोपाल (महामीडिया) आज ज्योति पर्व है। रंक की झोंपड़ी से लेकर राजा के महल तक प्रकाश की अनुपम लहर लहरा रही है। भारत की समस्त धरती पर दीपों का मेला लगा है। गाँव, कस्बे, शहर सर्वत्र प्रकाश के साथ मानव-मन का उल्लास बिखरा पड़ा है। दीपोत्सव हमारा सांस्कृतिक पर्व है। पावस ऋतु के उपरांत विजयादशमी और उसके कुछ ही दिन बाद, यह ज्याति-पर्व आता है। संघर्षों पर मानव-विजय का प्रतीक बनकर। भारतीय जीवन की उल्लासमयी भावना के सच्चे प्रतीक दीपोत्सव को भारतीयता का प्रतिनिधि राष्ट्रीय पर्व मान लिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्योंकि इस उज्जवल प्रकाश के शुभ उत्सव के साथ न जाने कितनी लोक कथाओं की मालायें ऐतिहासिक घटनाओं की लड़ियाँ तथा विविध धर्मों व महापुरूषों की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। परम दानी दैत्येन्द्र बलि का महादान, मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान रामचन्द्र का राज्यभिषेकोत्सव, जितेन्द्रिय हनुमान का जन्म-दिन, परमहंस स्वामी रामकृष्ण की ब्रह्मलीनता, आयुर्वेद के आचार्य धन्वतरि का आविर्भाव, स्वामी दयानंद का निर्वाण, भगवान महावीर का महाप्रयाण, धर्मराज की संतुष्टि, पितृगणों की अनुकम्पा नवीन अन्न का आगमन (अवान्न ग्रहण) प्रकृति प्रयत्यावर्तन, व्यापारिक वर्ष का प्रारंभिक दिन आदि कितनी ही घटनाओं तथा विशेषताओं का सूचक यह उत्सव है।
भारत का कोना-कोना पाप पर, कलुषता पर पुण्य की, विजय की, इस संध्या को वर्ष-भर के पश्चात आज फिर चिर नूतन स्मृतियों के टिमटिमाते दीपकों की पंक्तियों से आलोकित हो रहा है परंतु इन प्रकाश-दीपों की यह उज्जवल ज्योति देखकर हमें एक बार सहसा ध्यान हो आता है। इस विस्तृत अंधकार, पाप तथा कलुषता का जो वर्तमान स्वतंत्र भारत में हमारे पथ पर बिखरी है, वह है रिश्वतखोरी, बेईमानी भ्रष्टचार व हिंसा। चूंकि दीपोत्सव भारतका सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पर्व है, इसलिए हम समस्त भारतवासियों को चाहिए कि अपनी संस्कृति को भूलकर इंसान से हैवान हो रहे हैं, वे इस ज्योति पर्व से प्रकाश लेकर सच्चे मानव बनें।
जहाँ देखो वहां रिश्वतखोरी, हिंसा, भ्रष्टाचार, अत्याचार, चोरी, डाकेजनी, मेल मिलावट इत्यादि घृणित उपायों से भारतवासी धन कमाते दिखाई देते हैं। यथार्थ में यह पाप की कमाई, कमाई नहीं गमाई है, आमद नहीं आफत है, पूंजी नहीं पलीता है, माया नहीं मौत है, धन नहीं धमाका है, नोट नहीं चोट है, रूपया नहीं अग्नि के अंगारे हैं। इन पाप की कमाई खाने वालों को राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के निम्नलिखित शब्द याद रखने चाहिए।
क्या पाप का धन भी किसी का दूर करता कष्ट है।
उस पाप कर्ता के सहित हो शीघ्र होता नष्ट है।। 
इस वर्ष दीपमालिका के प्रकाश से न केवल घर-घर के अंधकार को ही दूर करना है वरन् देशव्यापी इस अंधकार को भी दूर करना है। इस स्वतंत्रता के युग में यदि हम मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम के रामराज्य को पुन: स्थापित करना चाहते हैं तो सबको आज इस पावन, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय पर्व पर यह प्रतिज्ञ करनी चाहिए कि हम अपनी नैतिकता को सदा सुरिक्षत रखेंगे और देश की खुशहाली के लिए दुष्ट वृत्तियों को तिलांजलि दे देंगे।
विचरो अपने पैंरो के बल, भुल बल से भव सिन्धु तरो।
जियो कर्म के लिए जगत में, और धर्म के लिए मरो।।
जो बीत गया उसे भूल जाओ, आने वाला कल तुम्हारे, अधिकार के बाहर है। केवल वर्तमान को सुधारो कहीं यह क्षण भी व्यर्थ न बीत जाये। समय ने, कर्त्तव्य ने, विवेक एंव पौरूष ने हमें पुकारा है। आज देश में अनेकानेक ज्वलंत समस्याये हैं, उनका शीघ्र समाधान अत्यन्त जरूरी है। राष्ट्र के लिए, समाज के लिए धर्म व न्याय के लिए हमें आगे बढ़ना है।
उठो जागो, चलो और आगे बढ़ो हार कर बैठने से कहाँ सार है। चलने वालों के चरणों में रहती विजय, आलसी अधमरा भूमि का भार है। इसलिए जागो और जगाओ भष्ट्राचार एवं आतंकवाद के विरूद्ध एक जुट होकर इनका नामो निशान मिटाओं।
प्रकाश की परंपरा लक्ष्मी पूजन का विधान
दीपावली पर मुख्य रूप से लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि पूजन से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और साल भर धन-धान्य से संपन्न रखती हैं। लक्ष्मी के साथ-साथ गणेश और ज्ञान की देवी सरस्वती का भी पूजन किया जाता है। कुबेर को धन-संपत्ति का स्वामी माना गया है, इसलिए उनकी भी पूजा होती है।
लक्ष्मी पूजन आमतौर पर सूरज छिपने के बाद किया जाता है, पर इसके लिए मुहूर्त तय होता है। कई लोग सुबह से ही पूजन शुरू कर देते हैं। इस पूजन के लिए पारंपरिक तौर पर पूजन सामग्री उपयोग की जाती है, पर इसमें इस मौसम में पैदा हुए अन्न से बनी सामग्री शामिल करना अनिवार्य होता है। इस मौसम में चूंकि धान की फसल तैयार होती है, लक्ष्मी पूजन में खीर अवश्य चढ़ाई जाती है। खीर के साथ बताशे भी चढ़ते हैं। अगले दिन जब गोवर्धन पूजा होती है, तब भी धान की खीर या चिवड़ा चढ़ाया जाता है।
दीपावली की प्रार्थना-
बृहदाण्यक उपनिषद की यह प्रार्थना प्राय: सभी करते हैं, जिसमें प्रकाश उत्सव चित्रित है:
असतो मा सद्गमया।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शांति: शांति: शांति:।।
दीपावली स्वच्छता, पवित्रता, सौभाग्य, संपन्नता, ज्ञान और सौहार्द का त्यौहार है। नई फसल, नए मौसम के स्वागत का भी त्योहार है। दीपावली पर पांच त्योहार एक साथ आते हैं, परस्पर गुंथे हुए। दीपावली मनाने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं।
इसे केवल हिंदू नहीं, अन्य समुदायों के लोग भी मनाते हैं। दीपावली से संबंधित मान्यताओं इसकी प्रकृति और इसे कहां-कहां, किस-किस रूप में मनाया जाता है, विहंगम दृष्टि। दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाया जाने वाला त्योहार है। भारत में प्राचीन काल से दिवाली को हिंदू कैलेंडर के कार्तिक माह की अमावस्या को एक त्योहार के रूप में दर्शाया जाता है। दिवाली का उल्लेख पद्मपुराण और स्कंदपुराण नामक संस्कृत ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण में दीपक को सूर्य के भाग का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है। सूर्य जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा देता है और जो भारतीय कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्थिति बदलता है।
अलग-अलग नाम- 
सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक 'नागनंद' के राजा हर्ष ने इसे 'दीपप्रतिपादुत्सव:' कहा है, जिसमें दीये जलाए जाते थे और दुल्हन तथा दूल्हे को उपहार स्वरूप दिए जाते थे। नौवीं शताब्दी में राजशेखर ने 'काव्यमीमांसा' में इसे ?दीपमालिका? कहा है, जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों को सजाया जाता था। फारसी यात्री और इतिहासकार अल-बेरूनी ने भारत पर अपने ग्यारहवीं सदी के संस्मरण में दीपावली को कार्तिक महीने में नए चंद्रमा के दिन पर वैदिकों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार कहा है।
अलग-अलग मान्यताएं- 
आमतौर पर दीपावली को लंका विजय के बाद राम के अयोध्या लौटने की तिथि के रूप में मनाया जाता है, पर कुछ क्षेत्रों में लोग दीपावली को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ते हैं। नचिकेता की कथा, जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है, क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंसा राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीये जलाए। एक पौराणिक कथा अनुसार विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकयप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के बाद लक्ष्मी और धन्वंतरि प्रकट हुए।
जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को ज्ञान प्राप्त हुआ था। सिखों के लिए भी दीपावली महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अलावा 1619 में दीपावली के दिन सिखों के छठें गुरु हरगोविंद सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ।
भारत के पूर्वी क्षेत्र ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लोग लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) के भोज में कृष्ण के लिए छप्पन या एक सौ आठ विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और इसे साझा तौर पर स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।
त्योहारों का समुच्चय- 
दीपावली अकेला त्योहार नहीं, बल्कि यह त्योहारों का समुच्चय है। दशहरे के बाद से ही इसकी तैयारियां शुरु हो जाती हैं। यह पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा क्षीर सागर के मंथन से जन्मी लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है, जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश: संगीत साहित्य की प्रतीक सरस्वती और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। मान्यता है कि इस दिन धातु की चीजें खरीदना सौभाग्य की बात है। इसलिए सोना-चांदी के आभूषण और विभिन्न धातुओं के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली होती है। इस दिन यम पूजा के लिए दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। पूरे घर की साफ-सफाई करके इस दिन तरह तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाजारों में खील-बताशे, मिठाइयां, खांड के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियां बिकने लगती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयां और उपहार बांटने लगते हैं। दिवाली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक और मोमबत्तियां जलाकर रखते हैं। देर रात तक कार्तिक की अंधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है।
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा कर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बचाया था। इस दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते और गोबर का पर्वत बना कर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। इस दिन भाई और बहन के गांठ जोड़ कर यमुना नदी में स्नान करने की परंपरा है। बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उसके मंगल की कामना करती है और भाई उसे कुछ न कुछ भेंट देता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बही-खाते बदल देते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक समाज के लिए इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ की फसल पककर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व प्रसन्नता पूर्वक मनाता है।
मुगलकाल में दीपावली- 
आमतौर पर दिवाली हिंदू मनाते हैं, पर सिख, जैन आदि समुदाय के लोगों के अलावा अनेक जगहों पर मुसलिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़ इसमें हिस्सा लेते हैं। मुगल काल में दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने चालीस गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप दिवाली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहांगीर भी दिवाली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दिवाली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलस द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था और लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिंदू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।
दीपावली पर कुरीतियां- 
दीपावली जहां स्वच्छता, पवित्रता और सौहार्द का त्योहार है, वहीं इसके साथ कुरीतियां भी जुड़ गई हैं। कई लोग इस दिन जुआ खेलने को शुभ मानते हैं। कुछ लोग शराब का सेवन करते हैं। इसके अलावा पटाखे फोड़ने की प्रथा अब समस्या का रूप ले चुकी है। कोई भी त्योहार मनुष्य के जीवन में मंगलकामना के साथ मनाया जाता है, उसमें लोग स्वयं से यह तर्क क्यों नहीं करते कि ऐसी कुरीतियों का त्योहारों में क्यों स्थान होना चाहिए।
कहां-कहां मनाई जाती है दीपावली-
दीपावली दुनिया भर में मनाई जाती है। श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, नीदरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन सहित संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका में दीपावली मनाई जाती है। भारतीय संस्कृति की समझ और भारतीय मूल के लोगों के वैश्विक प्रवास के कारण दिवाली मनाने वाले देशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कुछ देशों में यह भारतीय प्रवासियों द्वारा मुख्य रूप से मनायी जाती है, अन्य दूसरे स्थानों में यह सामान्य स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बनता जा रही है।

-कृष्णचंद्र टवाणी
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