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भारतीय बाजार के लिए चुनौतियां

भारतीय बाजार के लिए चुनौतियां

Suraj Singh Chandel | पोस्ट किया गया 1488 दिन 17 घंटे पूर्व
23/07/2015
दुनिया भर में इस समय बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है। भारत में भी आनलाइन खरीददारी का बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। मल्टी ब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश काफी शर्तों के साथ आता है, लेकिन ऑनलाइन वेबसाइटों में इस पर कोई शर्त नहीं होने से भारतीय उद्योग जगत की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसलिए देश के छोटे और बड़े सभी रिटेल कारोबारियों को ई-कॉमर्स के महत्व को समझते हुए इससे जुड़ी चुनौतियों का सामना करने की तैयारी भी करनी होगी। लेकिन इन चुनौतियों से जूझने के लिए भी यदि हम विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो गए तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह मेक इन इंडिया की राह में भी बहुत बड़ी बाधा साबित होगा। अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों ने हमारे लिए कई नई चुनौतियां पेश की हैं, जिनसे निपटने के लिए ठोस तैयारी जरूरी है। हाल में भारत के ई-कॉमर्स बाजार में अपना सीधा दखल बढ़ाने के मकसद से चीन की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी 'अलीबाबा डॉट कॉमÓ ने मुंबई में कारोबार सहायता केंद्र (टीएफसी) शुरू किया है। अलीबाबा अब भारत में टीएफसी के माध्यम से छोटे और मझोले कारोबारियों को व्यापार संबंधी सुविधाएं और प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएगी। अलीबाबा रिसेलर प्लैटफॉर्म पर कारोबारियों से सूचीबद्ध होने और पंजीकरण के एवज में शुल्क वसूलकर कमाई करेगी। चूंकि अमेजन जैसी वैश्विक रिटेल कंपनियां भारत में सीधे तौर पर ग्राहकों को अपने उत्पाद नहीं बेच पा रही हैं, इसलिए वह मार्केट प्लेस मॉडल के तहत कारोबार कर रही हैं। कई मामलों में विदेशी कंपनियों ने भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए घरेलू कंपनियों के साथ साझेदारी की है। यह हाल फिलहाल के लिए तो ठीक है, लेकिन बाद में यदि भारतीय कंपनियों को हटा दिया गया तो दिक्कत हो जाएगी। खबर आई है कि ई-कॉमर्स की चुनौती से निपटने के लिए खुदरा कारोबारियों के संगठन 'कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने लाखों छोटे-मझोले और बड़े किराना दुकानदारों के लिए इसी साल अक्टूबर में ई-लाला के नाम से राष्ट्रव्यापी पोर्टल लॉन्च करने का फैसला किया है। खुदरा कारोबारियों की तरह अन्य कारोबारियों को भी ध्यान में रखना होगा कि वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना आसान है, लेकिन चेहराविहीन उन अंतरराष्ट्रीय ई-कारोबारियों से बचना मुश्किल है जो देश के युवा उद्यमियों को ई-कॉमर्स की ओर आकर्षित कर रहे हैं। देश के कारोबारियों को यह भी समझना होगा कि ई-कॉमर्स का मतलब यह कतई नहीं है कि शोरूम में चलने वाली दुकानें बंद हो जाएंगी। खुदरा विक्रेताओं को अपना माल ग्राहकों तक पहुंचाने एवं उनकी आकांक्षाएं पूरी करने के लिए अपने कारोबारी मॉडल के साथ ई-कॉमर्स संबंधी अभिनव प्रयोग जरूर करने होंगे। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो भारत ई-कॉमर्स के मामले में आज भी काफी पीछे है। अप्रैल 2015 में वैश्विक सलाहकार सेवा संगठन एटी कियर्नी ने ई-कॉमर्स का वैश्विक परिदृश्य बताने वाली जो सूची प्रकाशित की है, उसमें भारत 3.8 अरब डॉलर के ई-कॉमर्स के साथ बहुत नीचे है जबकि अमेरिका 238 अरब डॉलर के ई-कॉमर्स के साथ बहुत ऊपर। फिर भी, हाल के दिनों में भारत में ई-कॉमर्स के प्रसार में तेजी आई है। इस बढ़ी हुई गति के मद्देनजर भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) का अनुमान है कि 2020 तक देश का संगठित रिटेल सेक्टर सात गुना और ई-रिटेल सेक्टर 26 गुना बढ़ सकता है। माना जा रहा है कि भारत का ई-कॉमर्स बाजार 2020 तक 100 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच जाएगा। चूंकि देश के घरों और दुकानों में ई-कॉमर्स के मार्फत चीन सहित कई देशों की कंपनियों के माल का ढेर बढ़ता जा रहा है, इसलिए जरूरी है कि सरकार भारतीय कंपनियों को ई-बाजार का विस्तार करने में मदद करे। साथ ही एफडीआई को मंजूरी देने पर विचार करते समय सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि इस समय भारतीय ग्राहकों के साथ विदेशी कंपनियों का सीधा कारोबार ग्राहकों के हित में नहीं है। चीन और जापान ने भी विदेशी ई-कॉमर्स के लिए अपने दरवाजे नहीं खोले हैं। ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश की मंजूरी के पहले यह भी ध्यान रखना होगा कि निर्माण लागत से कम कीमत पर उत्पाद बेच रही विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां देश में डंपिंग कर सकती हैं। इसलिए भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियों को विदेशी कंपनियों के मुकाबले सक्षम बनाया जाए। मेक इन इंडिया को इस ई-कामर्स से बहुत बड़ा धक्का लग सकता है, इसलिए सरकार को तत्काल प्रभाव से इसका मुकाबला करने की रणनीति तैयार करनी होगी।
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