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छठ पूजा का पौराणिक महत्व

छठ पूजा का पौराणिक महत्व

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 13 दिन 7 घंटे पूर्व
30/10/2019
भोपाल [ महामीडिया ]छठ पूजा का पर्व पूर्वांचल यानी पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार बिहार, उत्तर प्रदेश व नेपाल में मुख्य रूप से प्रचलित है।बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र दरभंगा में इस पर्व का बड़ा महत्व है। अब यह त्यौहार देश के बड़े हिस्से में मनाया जाता है। छठ के तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य की पूजा फिर आखिरी दिन उगते हुए सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं। संध्या अर्घ्य के लिए बांस की टोकरी में अर्घ्य की सामग्री सूप में सजाई जाती है और इस सामग्री को लेकर व्रत रखने वाले परिवार अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नदी, तालाब या घाट पर जाते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य समर्पित किया जाता है और छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।वहीं, उषा अर्घ्य में उदय हो रहे सूर्य को अर्घ्य समर्पित किया जाता है। व्रति उसी जगह पर फिर से इकट्ठा होते हैं, जिस जगह पर उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। संध्या अर्घ्य की सारी प्रक्रिया को फिर से दोहराया जाता है। पूजा के बाद व्रत रखने वाले कच्चे दूध का शरबत पीकर व्रत का पारायण करते हैं।पौराणिक मान्यता के अनुसार, लंका विजय और रावण दहन के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने यह उपवास करते हुए सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी के दिन सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, छठ पर्व का प्रारंभ महाभारत काल में हुआ था। मान्यता है कि सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य आराधना का प्रारंभ किया था। शूरवीर कर्ण भगवान सूर्य के अनन्य भक्त थे। वह रोजाना घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे।सूर्य की कृपा से ही वह कुंती पुत्र कर्ण शूरवीर योद्धा और दानवीर बने थे। पौराणिक काल से चली आ रही छठ में अर्घ्य दान की यह परंपरा आज भी प्रचलित है। छठ पर्व को सूर्य षष्ठी और डाला छठ के नाम से जाना जाता है। षष्ठी तिथि को मनाया जाने की वजह से इस त्यौहार को छठ पर्व कहते हैं। इस पर्व में सूर्य की पूजा की जाने की वजह से इस त्योहार को सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।

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