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चुनावी जंग में फिसलती जुबानें

चुनावी जंग में फिसलती जुबानें

Suraj Singh Chandel | पोस्ट किया गया 1582 दिन 15 घंटे पूर्व
10/08/2015
बिहार में चुनावी रणभूमि सज गई है और राजनीतिक दलों की रैलियों का दौर तेज हो गया है। उसी गति से नेताओं की बयानी जंग भी जेज हो गई है और उनकी जुबानों का फिसलने की तो जैसे प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। बोलने का तो मानो कोई स्तर ही नहीं रह गया है। प्रधानमंत्री कुछ कह जाते हैं तो उनकी पार्टी के लोग कमर के नीचे वार शुरू कर देते हैं और फिर बिहार के नेताओं के शब्द बाणों की झड़ी लग जाती है। यूं तो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ही प्रचार के दौरान नेताओं के बयानों का स्तर कुछ अधिक ही गिरना प्रारंभ हो गया था, पर अब तो जैसे कोई स्तर रह ही नहीं गया है। जिसके मन में जो आए, बोल जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने बिहार के मुजफ्फरपुर की भाजपा रैली में आरजेडी का मतलब रोजाना जंगलराज का डर बताया था। रविवार को गया की रैली में उन्होंने जेडी-यू का अर्थ जनता का दमन-उत्पीडऩ बताया। मुजफ्फरपुर में मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए में गड़बड़ी की बात कही थी। गया में उन्होंने लोगों को जंगलराज-2 की आशंका से आगाह किया और चारा घोटाले में लालू प्रसाद की जेल यात्रा को लेकर कटाक्ष किया। कहा कि लोग जेल से बुरी आदतें सीखकर लौटते हैं। उनके भाषण के फौरन बाद नीतीश कुमार ने भी व्यक्तिगत निशाना साधा। उन्होंने कहा, जनता के दमन और उत्पीडऩ के संदर्भ में (अटल बिहारी) वाजपेयी जी द्वारा 2002 में आपको (दी गई) राजधर्म निभाने की नसीहत से पूरा देश वाकिफ है, और फिर पूछा, कृपया बताएं कि जेल से निकले आपकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह जी कौन-सी बुराइयां लेकर आए हैं? मोदी की गया रैली में भाजपा नेता शकुनि चौधरी ने नीतीश को लुच्चा मुख्यमंत्री बोल दिया। इन बयानों में शब्दों के प्रयोग की मर्यादा का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं दिखाई दे रहा है। साफ है कि बिहार में संग्राम तीखा होता जा रहा है। इसके बीच गोटियां सेट करने में पार्टियां अपेक्षित कायदों और मर्यादाओं का पालन करेंगी, यह आशा निरर्थक हो गई है। इस बीच केंद्र सरकार ने बिना राज्य सरकार से मशविरा किए रामनाथ कोविंद को बिहार का राज्यपाल बना दिया। इस प्रक्रिया पर जेडी-यू ने एतराज किया, तो भाजपा ने जातीय अंक हासिल करने की कोशिश की। पूछा कि क्या दलित को राज्यपाल बनने का हक नहीं है। लेकिन जब चुनाव का माहौल हो, ऐसे में नए राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र की मंशा पर संदेह व्यक्त करता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि फिर न सिर्फ राज्यपाल पद को लेकर विवाद उठा है, बल्कि इसमें जातीय कोण भी जोड़ा गया है। साफ है कि बिहार चुनाव के अत्यधिक महत्व को देखते हुए पार्टियां वहां जुबान और व्यवहार दोनों में अपेक्षित अनुशासन की अनदेखी कर रही हैं। आम समझ है कि बिहार के नतीजे राष्ट्रीय राजनीति के कथानक व दिशा पर निर्णायक असर डालेंगे। नरेंद्र मोदी की आभा और गैर-भाजपा दलों की संभावनाएं वहां दांव पर हैं, इसलिए चुनाव में धन-बल-प्रभाव के इस्तेमाल में कोई पिछडऩा नहीं चाहता। लेकिन जिस तरह से बयान युद्ध चल रहा है, यह राजनीति के और गिरते स्तर को ही साबित कर रहा है।
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