महामीडिया न्यूज सर्विस
डीएनए बनाम स्वाभिमान

डीएनए बनाम स्वाभिमान

Suraj Singh Chandel | पोस्ट किया गया 1469 दिन 16 घंटे पूर्व
11/08/2015
बिहार चुनाव में अब डीएनए की बात हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए पर टिप्पणी कर दी, तो नीतीश ने उसे पूरे बिहार से जोड़ दिया। सही कौन और गलत कौन, इस पर तो आजकल बात होती ही नहीं, बस बयानों का जोरदार युद्ध प्रारंभ हो जाता है। नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके डीएनए वाला अपना बयान वापस नहीं ले रहे हैं, इसलिए 50 लाख से ज्यादा बिहारवासी हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे और अपना डीएनए सैंपल प्रधानमंत्री को भेजेंगे। असल में थोड़ा समय को पीछे खिसकाएं तो पता चलता है कि निजी राजनीतिक आक्रमण को अपने राज्य के स्वाभिमान के साथ जोडऩे की रणनीति का उपयोग मोदी ने भी बखूबी किया था। गुजरात में सन 2002 के दंगों के बाद जब मोदी पर चौतरफा हमला किया जा रहा था, तो उन्होंने गुजरातियों को यह बताने की कोशिश की कि हमला दरअसल गुजरात के स्वाभिमान पर हो रहा है। इसमें वह काफी हद तक कामयाब भी हुए, जैसा कि उनकी राजनीतिक सफलता से जाहिर होता है। अब बारी नीतीश कुमार की है। नीतीश वही रणनीति उन पर आजमा रहे हैं। नीतीश ने प्रदेश के स्वाभिमान की बात पहली बार नहीं की है। अपने सुशासन के दावे को उन्होंने हमेशा बिहार के स्वाभिमान से जोड़ा। लंबे समय से बिहार की छवि कुशासन और पिछड़ेपन की थी। इस कारण बड़ी संख्या में बिहारवासी शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर जाने पर मजबूर थे और इस छवि की वजह से उन्हें नीचा भी देखना पड़ा। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व के दौरान बिहार में प्रशासन बेहतर हुआ, विकास की गति भी तेज हुई और यह माना गया कि बिहार की परंपरागत छवि भी बदली। इसलिए बिहार की परंपरागत छवि बिहार वासियों के लिए संवेदनशील मुद्दा है, जिसे नीतीश कुमार भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा ने किसी नेता को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया है, उनके अभियान के केंद्र में नरेंद्र मोदी हैं, ऐसे में नीतीश कुमार राज्य के स्वाभिमान को मुद्दा बनाने में फायदे देख रहे हैं। वैसे देखा जाए तो राज्य के स्वाभिमान की राजनीति की परंपरा इंदिरा गांधी के दौर में शुरू हुई। तब ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी और वह हाईकमान के आदेश पर चलती थी, इस स्थिति ने राज्यों के स्वाभिमान या पहचान को एक बड़ा मुद्दा बना दिया। महाराष्ट्र में शिव सेना या आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी या तमिलनाडु में द्रमुक, अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों का सबसे बड़ा और कभी-कभी एकमात्र मुद्दा यही रहा है। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि राज्यों को अपनी स्वायत्तता लगभग छीननी पड़ती है, अगर केंद्र व राज्य में अलग-अलग पार्टियों का गठबंधन हो, तो यह रिश्ता शायद ही मित्रतापूर्ण रहता है। बीमारू राज्यों वाली मोदी की टिप्पणी और नीतीश कुमार की उस पर प्रतिक्रिया भी इसी संदर्भ में देखी जा सकती है। देखना यह होगा कि 50 लाख डीएनए सैंपल का मुद्दा भाजपा को भारी पड़ता है या फिर नीतीश अपनी रणनीति में असफल होते हैं। वैसे यह चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार हो गया है और बिहार के सारे भाजपा नेता हाशिये पर चले गए हैं। इस मुद्दे को भी नीतीश हवा में उछालने का प्रयास कर रहे हैं।
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