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आजादी का पर्व मनाएं

आजादी का पर्व मनाएं

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 1524 दिन 12 घंटे पूर्व
14/08/2015
अट्ठावन वर्ष की हो गई हमारी स्वतंत्रता। इसे उम्र से तौलने की आवश्यकता नहीं है। और न ही हमें किसी प्रकार से निराश होने की आवश्यकता है। हमारे देश में पर्व मनाने की जो शानदार परम्परा है, उसका निर्वहन करते हुए हम स्वतंत्रता का महापर्व मनाएं। इस स्वतंत्रता के लिए कितने ही लोगों ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया। कितनी माताओं की गोद सूनी हुई। कितनी सुहागनों का सिंदूर उजड़ा। कितने ही घर उजड़ गए। परंतु उनका जुनून कम नहीं हुआ। अंग्रेजों की बेडिय़ां काटने के लिए लोग बिना कुछ सोचे-समझे निकल पड़ते और जुट जाते अपने अभियान में। न खाने-पीने की चिंता और न रहने की। प्राण न्यौछावर करने की तो जैसे होड़ लगी थी। वो दौर बीत गया। स्वतंत्रता मिल गई। आज हम पूरी तरह स्वतंत्र हैं। हमारा देश, हमारी भारत माता। हमारा समाज। हमारा व्यक्तित्व। सभी आजाद हैं। हम खुली हवा में सांस ले सकते हैं। हमारे देश में हमारे कानून हैं। हमारा संविधान है। सब कुछ हमारा अपना है। और इस हमारे अपने में ही छिपी हुई हैं, हमारी बहुत सारी जिम्मेदारियां। अधिकार पाने के पहले यदि हम अपने कर्तव्यों को समझते हुए उन कर्तव्यों का पालन करने का प्रयास करें, तो हमारी इस स्वतंत्रता के कुछ मायने निकल सकेंगे। हालांकि पर्व के अवसर पर नकारात्मक भाव मन में नहीं आने चाहिए, परंतु यह अवसर उन लोगों को याद करने का तो है, जिनके कारण आज हमें यह पर्व मनाने का सौभाग्य मिल रहा है। स्वतंत्रता के इतिहास की पृष्ठभूमि में हमें हमारे कर्तव्यों का भी स्मरण करना चाहिए। परिवार, समाज और फिर देश। स्वतंत्रता का अर्थ निश्छलता, निरंकुशता या अराजकता तो कदापि नहीं होना चाहिए, जो इस देश में लगभग हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है। इस पर चिंता करने के बजाय चिंतन होना चाहिए। हम आजादी का पर्व मनाते हुए खुले मन-मस्तिष्क से बस इतना सा संकल्प ले लें कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन भी पूरी निष्ठा के साथ करेंगे। हम भी तो अपने देश के सच्चे नागरिक होने का कोई उदाहरण देने का प्रयास करें। वो अपने प्राण न्यौछावर करके चले गए। सैकड़ों सैनिक आज भी सीमाओं पर और देश के अंदर भी हमारी सुरक्षा के लिए शहीद हो जाते हैं, इसके बदले हम क्या कर सकते हैं, इस पर विचार करें। समय गतिमान है। हमारा देश इस अंतराल में जहां होना चाहिए था, नहीं हैं। क्यों नहीं है, इस पर विचार करते हुए देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें। कोई सीमा पर शहीद होता है तो हम अपने आसपास कोई ऐसा काम तो कर ही सकते हैं, जिससे हमारे समाज को कुछ उपलब्धि प्राप्त हो। व्यक्तिगत हितों से थोड़ा सा ऊपर उठ कर देखेंगे तो सब कुछ समझ में आ जाएगा। आइए मिलजुल कर स्वतंत्रता का महापर्व मनाएं और अपने मन में देशभक्ति की अलख जगाएं। -संजय सक्सेना
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