महामीडिया न्यूज सर्विस
उच्च शिक्षा के सुधार में बाधाएं

उच्च शिक्षा के सुधार में बाधाएं

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 1460 दिन 16 घंटे पूर्व
20/08/2015
पूरी दुनिया में भले ही भारत के आईआईटी का डंका बज रहा हो, परंतु सही बात तो यह है कि देश में उच्च शिक्षा का स्तर उठ नहीं पा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नित ही कोई न कोई नियम निकाल कर उच्च शिक्षा गुणवत्ता लाये जाने के प्रयास किये जाते हैं, लेकिन दूसरी ओर खुद उसी के द्वारा उच्च शिक्षा के साथ खिलवाड़ की जाती है। यूजीसी, सरकार और विश्वविद्यालयों की ओर से लगातार उत्कृष्ट शोधकार्यों की बात तो की जाती है, किन्तु उन पर वास्तविक रूप से अमल नहीं किया जाता है। बस पीएचडी की उपाधि देकर ही यह मान लिया जाता है कि देश में शोध कार्य हो रहे हैं। देखा जाए तो देश के विश्वविद्यालयों और अधिकांश शिक्षण संस्थानों का उद्देश्य शोधकार्य की प्रमाणिकता, उसकी मौलिकता तथा स्तर को जांचे-परखे बिना स्वीकृति प्रदान कर देना मात्र रह गया है। यदि ऐसा न होता तो आज भी तमाम विश्वविद्यालयों से पीएचडी के नाम पर कूड़ा-करकट समाज में न आया होता। यदि ऐसा न हो रहा होता तो शैक्षिक क्षेत्र में मौलिक शोधकार्यों का अभाव न दिख रहा होता। यदि ऐसा न हो रहा होता तो अध्यापन कार्य में रत बहुतायत लोगों को इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर अपना शोधकार्य पूरा न करना पड़ रहा होता। जो स्वयं को शोधकार्य के लिए उपयुक्त पाता है, अपनी सोच का, अपनी मौलिकता का शोधकार्य में गुणवत्तापूर्ण उपयोग कर सकता है, उसे शोध करने नहीं दिया जाता है और जो इसके लिए तैयार नहीं होता या उपयुक्त ही नहीं होता, उससे शोध कराया जाता है। ऐसी स्थिति में सोचा जा सकता है कि कोई अपनी भूमिका के साथ न्याय कैसे कर सकता है? इसके साथ-साथ प्राध्यापकों के करियर के लिए गुणांकों की अनिवार्यता ने इस स्थिति को और भी विकृत कर दिया है। इसके चलते जहाँ एक तरफ रिसर्च जर्नल्स की बाढ़ सी आ गई है वहीं दूसरी तरफ इसने बौद्धिकता को भी बाजार बना दिया है। कुछ रुपयों की कीमत पर शोध-पत्र प्रकाशित कर दिए जाते हैं। सेमिनार, गोष्ठी आदि के प्रमाण-पत्र बांटे जा रहे हैं, घर में प्रकाशन खोलकर, पुस्तकों से सामग्री की चोरी कर, उसमें जरा सा हेर-फेर करके अपने नाम से अंधाधुंध प्रकाशन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी बहुतायत लोगों के चलते उच्च शिक्षा में शोध के नाम पर, अध्यापन के नाम पर लगातार गिरावट आ रही है। भोपाल शहर में तो एक अंग्रेजी के पीएचडी धारी के लिए कहावत ही चली कि ये इनसाइक्लोपीडिया की स्पेलिंग नहीं लिख सकते। भोपाल विश्वविद्यालय के बारे में तो यह भी कहा जाता रहा कि यहां रेवडिय़ों की तरह पीएचडी बांटी जाती है। उच्च शिक्षा में गिरावट की इस स्थिति का रहा-सहा कचूमर निजी शैक्षणिक संस्थानों ने शामिल होकर निकाल दिया है। 'कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ाÓ की तर्ज पर इनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है। किसी गांव में, खेतों के मध्य खड़ी होती इमारतें, तमाम सारे पाठ्यक्रमों का संचालन, हजारों-हजार विद्यार्थियों का प्रवेश किन्तु अध्यापकों के नाम पर जबरदस्त शून्यता, स्थिति की भयावहता, उच्च शिक्षा के माखौल का इससे ज्वलंत उदाहरण क्या होगा कि महाविद्यालय में किसी विषय में अनुमोदन किसी और व्यक्ति का है, उसके स्थान पर महाविद्यालय में पाया कोई और व्यक्ति जा रहा है। निजी विश्वविद्यालयों ने तो और शिक्षा के स्तर को गिराने का ठका ले लिया है। शिक्षा के साथ घनघोर मजाक हो रहा है और ऐसा महज उच्च शिक्षा क्षेत्र में ही नहीं अपितु शिक्षा के आरंभिक बिन्दु से ही हो रहा है। शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का दुष्परिणाम है कि जहाँ किसी समय हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था गौरव का विषय हुआ करती थी, आज हम विश्व के सैकड़ों सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में भी शामिल होने से वंचित रह जा रहे हैं। ऐसी व्यवस्था के लिए किसी एक को दोष देना उचित नहीं है। एक तरफ सरकारें हैं जिनके पास कोई जमीनी नीति नहीं है, आयोग है जिसके पास क्रियान्वयन के कोई ठोस बिन्दु नहीं हैं, राज्य सरकारें हैं जो किसी भी नीति पर केन्द्र सरकारों से दुश्मनी निकालती रहती हैं, विश्वविद्यालय हैं जिनके पास नीति-निर्देशक नहीं हैं, महाविद्यालय हैं जिनके पास नियंत्रण नहीं है. ऐसे में उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण विकास होगा, इसमें संदेह ही है। कुछ ठोस काम इस क्षेत्र में करने की महती आवश्यकता है और जो संस्थान वास्तव में काम करना चाहते हैं, उन्हें आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
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