महामीडिया न्यूज सर्विस
आनंदमय चेतना है जीवनसत्ता का स्वभाव

आनंदमय चेतना है जीवनसत्ता का स्वभाव

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 663 दिन 5 घंटे पूर्व
24/10/2017
भोपाल (महामीडिया) यह ब्रह्मांड अनंत है। परिवर्तन इसका सतत् नियम है। जीवन और मृत्यु तो इसके छोटे से अंग है। किन्तु जो अमर है, परम है, सनातन है वह है जीवनसत्ता। यक्ष प्रश्न है कि यह जीवनसत्ता क्या है? वस्तुतः इसे जानना एक कला है। एक विज्ञान है। क्या जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जीने का ढंग ऐसा नहीं हो सकता कि उससे व्यक्ति के साथ-साथ ब्रह्मांड भी सकारात्मक रूप से प्रभावित हो? हम जीवन के विभिन्न क्षेत्रों तथा जीने की विभिन्न तकनीकों पर गंभीरता और गहराई से विचार करें तो इस प्रश्न का उत्तर संभव है। 
जीवनसत्ता जिसे अंग्रेजी में बीइंग कहा गया है जीवन का मूल तत्व है। इसकी प्रकृति भावातीत है। इसकी मूल्यगत विशेषता दैनंदिन जीवन का प्रत्यक्ष चरित्रगत विशेषताओं से परे हैं अतः जीवनसत्ता की कला के निहितार्थ है कि जीवन-मूल्यों का उपयोग व्यक्ति तथा ब्रह्मांड के कल्याण हेतु प्रज्ञोप्रेरित हो। इन मूल्यों को न केवल देश-काल के परे सहेजा जाये वरन् जीवन की समग्रता के हित में इन्हें चेतना के समस्त स्तरों पर चिरस्मरणीय बनाये रखा जाये। इससे जीवन महिमामंडित होगा।
प्रायः जीवन के विभिन्न पक्ष हैं शरीर, मस्तिष्क, संवेदन ग्रंथियां, तंत्रिका तंत्र, मनः स्थिति, परिस्थिति, कर्म, सोच, वाणी, अनुभव, व्यवहार आदि। जागृति, स्वप्न और निद्रा हमारी चेतना की तीन स्थितियां हैं।
जीवनसत्ता सृष्टि के मूल में है। उसके बिना कहीं कुछ भी नहीं है। वह समस्त अस्तित्व का मूलाधार है किंतु दृश्य से परे है। जीवनसत्ता की प्रकृति तो आनंदमय-चेतना है। वह परम, चरम और स्थायी स्थिति में आनंद का संकेन्द्रीकरण है, समाहरण है। अतः जीवनसत्ता की कला का सीधा-सपाट अर्थ है कि सभी परिस्थितियों में समग्र प्रसन्नता के साथ जीवन जिया जाये। हमारे मनःमानस से जीवनसत्ता एक क्षण के लिये भी ओझल न हो बल्कि जीवन पर उसी का वर्चस्व हो।
इसका अर्थ कि प्रकृतिशः जीवन आनंदपूर्ण है और दुख, दर्द, दबाव, भ्रम और अमरसत्ता के भंवर से मुक्त है। यदि हमारी मनसा-वाचा-कर्मणा, जीवनसत्ता की चेतना हर स्तर पर बनी रहेगी तो जीवन-मूल्यों को अक्षुण्ण रखकर जी सकेंगे। अतः प्रस्थान बिन्दु पर इसे जीवन की अटल गहराइयों में उतारना होगा और फिर अव्यक्त प्रकृति के भावातीत क्षेत्र से सापेक्ष अस्तित्व मेें बाहर लाना होगा। अतः जीवनसत्ता की कला में निहित तकनीक के दो पक्ष हैं- पहले हम चेतन मस्तिष्क को स्थूल और सापेक्ष अनुभव क्षेत्र से अव्यक्त की ओर स्थानांतरित करने के लिये जीवनसत्ता-क्षेत्र की पड़ताल करते हैं और फिर जीवन मूल्यों से पुष्ट मस्तिष्क को बाहर लाते हैं। अतः सामान्यतः जीवनसत्ता की कला प्राकृतिक रूप से जीने में है। तकनीक या कला क्या है? यह एक ऐसी पद्धति या प्रणाली है जिसे बिना तनाव दबाव के व्यवहार में लाया जा सके। इस प्रसंग में भावातीत ध्यान जीवनसत्ता की कला की व्यवहारिक तकनीक है। आइये इसके लिये जीवन के विभिन्न पक्षों पर चर्चा करें।
जब मस्तिष्क में जीवनसत्ता की चेतना नैसर्गिंक यानी स्वाभाविक रूप से रहती है तो हमारी समस्त विचार सृष्टि भी उसी स्तर पर होती है। इसमें जीवनसत्ता और हमारी विचार श्रृंखला का सहअस्तित्व रहता है। जब विचार, जीवनसत्ता के स्तर पर प्रतिष्ठापित हो जाते हैं तो जीवनसत्ता का संचालन स्वभावतः विचार प्रक्रिया के माध्यक से होने लगता है। अतः विचार संदर्भ में जीवनसत्ता की कला आवश्यक रूप से मस्तिष्क की प्रकृति में भावातीत जीवनसत्ता के मूल्यों का समावेश कर देती हैं
जीवनसत्ता यानी बीइंग ही विचार स्त्रोत है। विचार प्रक्रिया, मस्तिष्क से अपने आवश्यक स्वभाव यानी जीवनसत्ता से दूर खींचती है। इस प्रकार ऐसा लगता है कि विचार प्रक्रिया जीवनसत्ता की स्थिति की विरोधी है। यही कारण है कि मस्तिष्क जब भावातीत ध्यान में विचार की महीन स्थिति के परे चला जाता है तभी वह जीवनसत्ता की स्थिति पर पहुंच पाता है। जब वह पुनः सोचने लगता है तो उसे जीवनसत्ता के भावातीत क्षेत्र से निकलकर बाहर आ जाना चाहिये। 
हमारा चेतन-मस्तिष्क या तो विचार प्रक्रिया में व्यस्त रहता है या फिर पावन जीवनसत्ता की भावातीत स्थिति में। अतः विचारणा, जीवनसत्ता के लिये चुनौती की भांति है। इसका कारण संभवतः यह है कि हमने मस्तिष्क को जीवनसत्ता की स्थिति और विचार प्रक्रिया में एक साथ रहने के लिये शिक्षित नहीं किया है। मस्तिष्क सदैव सोचने की प्रक्रिया में लगा रहा है। विचारों का संग्राहक है। लेकिन भावातीत ध्यान के अभ्यास से चेतन मस्तिष्क विचार के स्त्रोत तक पहुंच कर जीवनसत्ता की स्थिति से इतना परिचित हो जाता है कि तब इस पावनसत्ता की स्थिति इतनी सम्भावी और आनंददायक हो जाती है कि फिर मस्तिष्क उसे किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं होता। फिर मस्तिष्क की प्रकृति में इस तरह परिवर्तित हो जाती है कि वह विचारशील रहकर भी जीवनसत्ता के क्षेत्र में समा जाती है। यह है विचार क्षेत्र में जीवनसत्ता की कला। यदि मस्तिष्क, जीवनसत्ता के क्षे़ में स्थापित नहीं है तो विचार प्रक्रिया निर्जीव और विचार शक्ति अत्यंत निःशक्त होती है। परिणामतः गतिविधियों के क्षीण होने से उपलब्धियां संतोषजनक नहीं होती और जीवन में आनंद का अभाव हो जाता है। अतः जीवनसत्ता की कला और विचार प्रक्रिया के विज्ञान में तालमेल बैठाना अत्यन्त आवश्यक है। चेतन-मस्तिष्क को जीवनसत्ता की परिधि में लाये बिना जीवनसत्ता को जानने का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। इससे तो चेतन-मष्तिष्क जीवनसत्ता की गिरफ्त में बना रहेगा, उसी में लिप्त रहेगा। तब उसमें जीवनसत्ता का अभाव रहेगा, क्योंकि जीवनसत्ता के विषय में ही सोचते रहना जीवनसत्ता की स्थिति तो नहीं। हम इस प्रकार मस्तिष्क को विभाजित तो नहीं कर सकते। हमारा मस्तिष्क किसी अन्य विचार को भी पूरी तरह से समाहित करने की स्थिति में नहीं होगा। न तो जीवनसत्ता का प्रभाव पूरी तरह हो पायेगा और न विचार-प्रक्रिया सृदृढ़ होगी।
जीवनसत्ता और विचार-प्रक्रिया में तालमेल के अभाव को सहन करने वाली विचारधारा दिशाहीन है। इससे भ्रम ही उत्पन्न होगा। यह भ्रामक है। जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है जीवनसत्ता जीवन का मूल स्त्रोत है जो केवल विचार प्रक्रिया से उपलब्ध नहीं हो सकता। हम जीवनसत्ता की स्वाभाविक स्थिति में क्यों नहीं जी पाते? क्योंकि हम जीवन के भावातीत क्षेत्र से अपरिचित हैं। इसे प्राप्त करने की एक मात्र विधि है कि हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जायें ताकि चैतन्य अवस्था में जीवनसत्ता के क्षेत्र में प्रवेश कर सकें। इसके लिये नियमित अभ्यास की आवश्यकता हैं
अब वाणी के विषय में विचार करें। वाणी हमारे विचारों का स्थूल या व्यक्त पक्ष ही तो है। बोलने के लिये सोचने से अधिक ऊर्जा लगती है। इसमें मस्तिष्क पर भी ज्यादा जोर पड़ता है, इसलिये वाणी के स्तर पर जीवनसत्ता की कला विचार-स्तर की अपेक्षा अधिक जटिल है। मस्तिष्क विषयक चेतना-क्षमता के विस्तार को लेकर सोचें। हमारे विचार चेतना के सूक्ष्मतम स्तर से निकलते हैं और धीरे-धीरे विस्तृत होकर चैतन्यावस्था की विचार-श्रृंखला को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। विचारों का बुलबुला ही अंततः चैतन्य स्तर पर वाणी बन जाता है।
मूलतः वाचा, मनसा से बहुत भिन्न नहीं है केवल मात्रा या सीमा का अंतर जीवनसत्ता की स्थापना विचार स्तर की तुलना में अधिक श्रमसाध्य हैं निरंतर अभ्यास के पश्चात् जब जीवनसत्ता की स्थिति वाणी के स्तर पर स्थापित होने लग जाती है, तब समस्त वाणी प्रवाह जीवनसत्ता से होने लगता है और फिर वह ब्रह्मांडीय नियमों के अनुरूप होता हैं इससे व्यक्ति का जो विकास होता है वह सर्वत्र समरसता कायम करता है। इस प्रयास में भी मस्तिष्क का विभाजन नहीं करना है कि आधा जीवनसत्ता की सोचे और आधा वाणी को लेकर चिंतित रहे।
हमारी श्वांस-प्रतिश्वांस का भी बहुत महत्व है क्योंकि वे व्यक्तिशः अस्तित्व और ब्रह्मांडीय जीवन के मध्य सेतु का काम करती है। व्यक्ति और ब्रह्मांड का योग है। ऐसा लगता कि ब्रह्मांडीय जीवनसत्ता के महासागर से जो लहर उठती है उसी का एक अंश व्यक्तिगत स्तर पर श्वास प्रवाह है। यह अव्यक्त को व्यक्त करने वाली प्रथम हलचल है। प्राण के माध्यम से यह सर्वव्यापी ब्रह्म का स्पन्दन है, प्राण है। श्वास बन कर उसके अनुलोम-विलोम से व्यक्तिगत जीवन के प्रवाह को प्रवाहित रखता है और उसे अपने मूलस्त्रोत यानी परमसत्ता से जोड़ता हैं
जीवनसत्ता की कला को श्वसन-प्रक्रिया से कैसे जोडें? श्वास का मूल क्या है? वह है प्राण। हमें ज्ञात है कि धरती की उर्वराशक्ति से वृक्ष बनते हैं। किंतु क्या बीज के बिना यह संभव है? हम कल्पना करें कि भावातीत जीवनसत्ता तो धरती की उर्वराशक्ति के समान है जबकि वृक्ष, व्यक्तिगत जीवन सरिता है, जीवनसत्ता सर्वव्यापी है किंतु व्यक्तिगत जीवन को विशेषता देने के लिये जीवनसत्ता को उसी प्रकार का बीज चाहिये। व्यक्तिगत जीवन का बीज, वृक्ष के बीज की भांति ही है जो कुछ भी नहीं है बल्कि व्यक्त उर्वरता की नितांत सूक्ष्म अभिव्यक्ति हैं
जीवनसत्ता, प्राण के रूप में प्रकट होती है। विचार का विकास उसी पर आधारित है। उसी से इच्छा बनती है जिसकी परिणति है कर्म।
वृक्ष और बीज के चक्र की भांति ही विचार, इच्छा, कर्म तथा कर्मफल का चक्र और उनका प्रभाव। इससे हम समझ सकते हैं कि व्यक्तिगत जीवन, प्राण के माध्यम से वैश्विक जीवन से किस प्रकार अनुप्राणित हैं
प्राण, जीवनसत्ता का स्पंदन है। अव्यक्त जीवनसत्ता को स्पंदित होने के लिये किसी बाहरी तंत्र की आवश्यकता नहीं है। वह तो अस्तित्व के विभिन्न क्षण भंगुर चरणों को पार करते हुये स्वयंमेव स्पंदित रहती है, प्राण और मस्तिष्क के संयोजन से जीवनसरिता प्रवाहित है। श्वसन-प्रणाली से जीवनसत्ता को जोड़ने की कला समझने के लिये जीवन-मूल्यों को मस्तिष्क से जोड़ना होगा क्योंकि यह प्रणाली प्राण और मस्तिष्क के योग का परिणाम है। क्या प्राण और मस्तिष्क अलग-अलग हैं? इसका उत्तर है नहीं। इस प्रकार व्यक्तिगत स्थिति को ब्रह्मांडीय स्थिति तक उन्नत करने की सीढ़ी प्राप्त हो जायेगी। महर्षि योगी जी के इस शताब्दी वर्ष में जीवन का आनंद-स्त्रोत बनाने के लिये उसके विभिन्न पक्षों में जीवनसत्ता की प्रतिष्ठापना की कला का वैज्ञानिक विश्लेषण आवश्यक है।
ब्रह्मचारी गिरीश
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश 
एवं 
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी

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