महामीडिया न्यूज सर्विस
सिक्ख गुरू नानक देव

सिक्ख गुरू नानक देव

admin | पोस्ट किया गया 762 दिन 7 घंटे पूर्व
04/11/2017
भोपाल (महामीडिया) सिक्ख धर्म के संस्थापक संत कवि गुरूनानक का जन्म विक्रम संवत् 1526 में कार्तिक पूर्णमा को लाहौर जिले के तलवंडी नाम गाँव में हुआ था। वह स्थान आज ननकाना साहब नाम से विश्व में प्रसिद्व है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को हजारों तीर्थयात्री इस पवित्र स्थान की यात्रा करने पाकिस्तान स्थित ननकाना साहिब बड़ी श्रद्धा से जाते हैं। इनके पिता का नाम कालू चन्द्र और माता का नाम तृप्ता था। बाल्यावस्था से ही नानक देव अपना समय ध्यान और अध्यात्म प्रकृति में व्यतीत करते थे।
नानक को संस्कृत सीखने शिक्षक के पास भेजा गया। पंडित जी ने ऊँ लिखा नानक जी ने ऊँ का अर्थ पूछा। पंडितजी ने कहा- अभी अर्थ ज्ञान की आवष्यकता नहीं है। मैं उनकी अर्थ नहीं समझ सकता। इस पर नानक ने कहा- बिना अर्थ समझे लिखने या सीखने से कोई लाभ नहीं। बाद में नानक जी ने विस्तृत रूप से ऊँ के अर्थ का विवेचन किया। यह सुनकर पंडित जी आष्चर्यचकित हो गये। एक बार इने पिता ने बीस रूपये देकर कहा कोई ऐसी वस्तु बाजार से लाओ जिसमें कुछ लाभ हो और बाला नाम के नौकरी को साथ भेज दिया। वह कुहर बबा नाम के गाँव में पहुंचे तो वहाँ साधुओं की मंडली देखकर नानक देव ने विचार किया इससे अच्छा लाभ और क्या मिलेगा। बाजार से सामान खरीदा और पेट भर साधु संतों को खिला दिया और बाद में घर आ गये। नौकर ने जब यह वाक्या उनके पिताजी को बताया तो वे बड़े क्रोधित हुए और नानक को एक तमाचा मारा। इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था। इनके दो पुत्र श्री चन्द्र और लक्ष्मीचन्द्र हुए। लेकिन इससे इनकी आध्यात्मिक साधना में कोई अंतर नहीं पड़ा। जल्द से भगवान का साक्षात्कार करने के लिए नानक देव जी ने उग्र तपस्या की और अपने शरीर की कोई परवाह नहीं की। पिता ने समझा कोई बीमारी हो गई है इस कारण वैद्य को बुलाया। नानक देव ने वैद्य से कहा- आप मेरा उपचार करने आए हैं आप मेरा हाथ पकड़ो, नाड़ी परीक्षा करो लेकिन रोग मेरे तन में नहीं है मन में है। मुझे दिव्य नशा चढ़ा है। आपकी दुआ मेरे लिए बेकार है जिस प्रभु ने यह दुख दिया वही दुख का निवारण करेंगे। प्रभु की विरह व्यथा का में अनुभव कर रहा हूं। प्रभु का सतनाम ही नानक को पार लगा। पितृपक्ष के दिन थे जिसमें लोग अपने पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्ममण भोजन का आयोजन करते हैं तथा जलांजलि देते हैं उस दिन भी लोग नदी में नहा रहे थे। कई लोग हाथों में पानी भर-भरकर सूर्य की दिषा में अध्र्य दे रहे थे। अचानक वहाँ से नानक देव जी गुजरे तो यह सब देखकर ठिठक गए। नानक नदी तट के पास गये और नहाते हुए व्यक्ति से बोले- यह क्या कर रहे हो भाई। उस व्यक्ति ने अंजलि में पानी भरकर सूर्य की ओर उलीचते हुए जबाब दिया हम अपने पितरों की प्यास बुझा रहे हैं। उन्होंने पूछा वह कैसे भाई। सूर्य की ओर देखते जलांजलि देने से जल सीधा स्वर्ग में बैठे पितरों के पास पहंुच जाता है वह लोग बोले। नानक को बहुत अचंभा हुआ। फिर न जाने क्या सोचा। फिर स्वयं भी पानी में उतरकर हाथों से पानी भर-भरकर जोरों से उछालने लगे। लोग पूर्व की आरे पानी दे रहे थे और नानक पश्चिम की ओर। उन्हें ऐसा करते देखकर लोग जलांजलि देना भूल गए।
पास खड़े एक व्यक्ति से नहीं रहा गया और उसने पूछा- आप क्या कर रहे हैं। नानक जी ने कहा मेरा गांव पश्चिम में है और मेरे खेत पानी के अभाव में सूख गये हैं। मैं उन्हें सींच रहा हूं। लोग नानक की बात सुनकर हंसने लगे। उनको हंसते देखकर नानक जी ने शांत भाव से कहा- यदि वहाँ से पानी उलीचने से लोगों की अज्ञानता पर नानक का यह करारा प्रहार था। गुरूनानक जी 1502 ई. में वायव्य सरहद से अटक जिला में स्थित हसन अबठाल आए। पर्वत की तलहटी में एक पीपल के वृक्ष के नीचे अपना आसन बनाया। पर्वती की चोटी पर एक कंधारी नाम का मुस्लिम संत रहता था। पर्वत की चोटी से पानी का झरना बहता था। नानक देवजी के शिष्य मर्दाना उस झरने में से पानी लाते, कुछ समय पश्चात ही वहाँ नानक देव जी की बड़ी ख्याति हो गई।
यह देखकर मुस्लिम संत को ईष्र्या होने लगे और उसने मर्दाना से कहा हमारे झरने से पानी मत लेना। उसे बहुत दुख हुआ उसने नानक जी से कहा। नानक जी ने कहा तुम चिंता मत करो तुम्हें यहीं से पानी मिल जायेगा। थोड़ी देर में झरना सूख गया और पहाड़ की तलहटी में जहाँ नानक देव जी बैठै थे पानी बहने लगा। यह देखकर उस मुस्लिम संत को बड़ा गुस्सा आया और उसने नानक देव जी को मारने कीे लिए एक बड़ा पहाड़ का पत्थर गिराया। नानक देव जी ने उसे हाथ के पंजे के बीच में ही रोक लिया आज भी उस पत्थर में गुरूनानक देव जी के पंजों के दर्षन होते हैं। बाद में वहाँ विषाल गुरूद्वारा बनाया गया और वह स्थान आज पंजा साहिब के नाम से विख्यात है। इस चमत्कार को देखकर उस संत ने गुरूनानक देव के पास आकर क्षमायाचना की। गुरूनानक देव ने उन्हें उपदेष और आर्षीवाद दिया। गुरू नानक देव सुधारक थे। उन्होंने संपूर्ण मानवता को प्रेम और शांति का संदेष दिया। नानक ने मानव सेवा पर विषेष रूप से बल दिया। स्त्रियों के सम्मान में उन्होंने स्त्रियों को धार्मिक उत्सवों में भाग लेने और हरिकीर्तन में भाग लेने की अनुमति प्रदान की। गुरू नानक देव जी द्वारा लिखित सिक्खों का प्रमुख ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहब के नाम से विख्यात है। प्रत्येक समुदाय का प्रमुख मंदिर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के नाम से विष्व में विख्यात है। इनकी दूसरी धार्मिक पुस्तक जपुजी नाम से है। इसमें गुरू नानक देव जी के भक्तिमय काव्यों का संग्रह है। प्रातःकाल में प्रायः प्रत्येक सिख इनका पाठ करता है। तीसरी धार्मिक पुस्तक सोहिला नाम नाम से है इसमें संख्या समय की प्रार्थना है। सन् 1538ई. में 69 वर्ष की आयु में गुरू नानक देव जी का स्वर्गवास हुआ। गुरू अंगद देव को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया। सिक्ख धर्म में कुल दस गुरू हुए हैं। सिक्ख धर्म का धार्मिक नारा प्रसिद्व है- बोले सो निहाल, सत श्री अकाल।
गुरू नानक देव को सिख धर्म का आदि प्रर्वतक और गुरू माना जाता है। उनके उपदेश सभी समुदाय वालों के समान रूप से उपदेष हैं। उन्हें सभी धर्मावलंबियों के लोग मानते हैं। 

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