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भावातीत ध्यान सीखने हेतु महर्षि महेश योगी जी की दीक्षा-पद्धति

भावातीत ध्यान सीखने हेतु महर्षि महेश योगी जी की दीक्षा-पद्धति

admin | पोस्ट किया गया 689 दिन 4 घंटे पूर्व
28/11/2017
भोपाल (महामीडिया) महर्षि महेश योगी जब भोपाल पधारे थे तो दो दिन तक उनका दीक्षा कार्यक्रम स्थानीय राधा टाकीज में सम्पन्न कराया गया था। दीक्षा लेने वालों में राजा से लेकर रंक तक के स्तर के सभी लोग थे। उनकी दीक्षा विधि अत्यंत मितव्ययी और सरल थी। एक नया रूमाल और एक मौसमी फल ले आइये। उनके द्वारा दिये गये मंत्र से दीक्षा सम्पन्न हो जाती थी। किंतु जो दीक्षान्त प्रवचन उन्होंने किया था उसमें दीक्षा का सारसत्य था। उनके उद्बोधन का सारांश था कि जहां से हमारा दायित्व समाप्त होता है वहां से परमात्मा का दायित्व प्रारम्भ होता है-
'कर्मण्येवाधिकारस्ते'
महर्षि जी ने जो उदाहरण दिये थे, वे दिनप्रतिदिन के जीवन से संबंधित थे। खैरागढ़ के पूर्व-नरेश महाराज वीरेन्द्र बहादुर सिंह और उनके आई.पी. (हम्वीरिमल पुलिस) भ्राता विक्रम बहादुर सिंह ने इन्हें रिकार्ड भी किया था। उन्होंने जो कहा उसकी संक्षिप्ति इस प्रकार है ?बीज बोने के बाद सिंचाई कर दो। किसान का दायित्व समाप्त। परमात्मा का दायित्व शुरू। अंकुर फूटने के लिये अधीर होने से कुछ नहीं मिलेगा।...लिफ्ट के लिये बटन दबाया। आर्डर दे दिया....अकल होने से खाना आने वाला नहीं है। हमें शांतिपूर्वक प्रतीक्षा करने की कला सीखना चाहिए। अपना कर्तव्य पूरा करने के बाद आध्यात्मिक उत्थान के लिये अपना कर्तव्य करें 'मा फलेशु कदाचन' अधीर हो उठने पर आप वांछित अनुभव के साक्षी होने के बजाय कर्तव्य-अहं के साक्षी बनकर रह जाते हैं। अपने मूल से आपका जुड़ाव नहीं हो पाता 'वर्ल्ड इज मच विद अस' हमारी परिपक्वता जीवन में होने वाले हर अनुभव से एक पायदान नीचे ही रहती है। 
हम स्वयं को भले ही विश्व स्तर का समझें किन्तु हमें परिपक्व बनाता है गुरु। वह व्यक्ति भी हो सकता है और विचार भी । वह मृत भी हो सकता है और अमृत भी। जीवन सदैव प्रवाह का, लय-ताल का तारतम्य बिगाड़ने के लिये बीच में आ जाता है। आगे भयावह मोड़ है, यह सावधान करता है गुरु। महर्षि महेश योगी जी अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टांत देते थे। 
मैंने स्वयं दो दिन उनका दीक्षा-समारोह देखा था। अब कुछ-कुछ समझ में आता है। तब मैं 36 वर्ष का था। अब 85 में पदार्पण हो चुका है। उन्होंने कहा था-' आपके जीवन में आपकी हर गतिविधि का परिणाम ही आपका गुरु है।' यह दैनिक व्यवहारिक यथार्थ है बशर्तें कि हम गुरु दीक्षा लें। कहते हैं कि 'गुरु बिनु होय न ज्ञान' और ज्ञान क्या है? शास्त्रों में ज्ञान का अर्थ है 'एकस्य ज्ञानं ज्ञानम्' ... सबके भीतर वही एक ज्ञान है। यहां वह ज्ञान है जो हमें 'स्व' का विस्तार करके 'स्वयम' बना देता है।
महर्षि जी छोटे-छोटे वाक्यों में बोलते थे। यही थी उनकी दीक्षा... 'शरीर में आत्मा है....आत्मा में जीव और ईश्वर-अंश है...' ईश्वर-अंश जीव अविनाशी'... एक दृष्टारूप है दूसरा योग्यता है। दोनों ही दृष्टा बन जायें तो काम पूरा। दोनों एक हो गये... आपमें से कितनों ने मेरी पुस्तक पढ़ी है 'साइंस ऑफ बीइंग एंड आर्ट ऑफ लिविंग...'
महर्षि महेश योगी हमें हमारा मनपसंद मंत्र देकर कहते थे कि इसी पर ध्यान लगायें। इसे जपें। 'दैन इट गोज फाइनर एंड फाइनर' अभ्यास करें... पहुंच जायेंगे अपने मूलस्वरूप तक, यही है भावातीत ध्यान 'द ट्रान्सेन्डेन्टल मेडिटेशन'...।
कहतें हैं कि गुरु दो प्रकार के होते हैं-एक है पारस गुरु जिनके स्पर्श से स्पन्दन होता है। दूसरे हैं चंदन-गुरु जिनके ध्यान मात्र से सम्पूर्ण अस्तित्व गुरु-गंध से गंधायित हो उठता है।
यथार्थतः गुरुदीक्षा हमारे दो मूलभूत कार्य निरन्तर सम्पन्न कराती है- ये हैं देखना और जानना।
'यः किंचित् करोति यश्च किंचित् जानाति स आत्मा'
चेतना के बिना 'करोति' असंभव है। चेतना आती है गुरु दीक्षा से। फिर सच्चा दीक्षित शिष्य तो गुरु का प्रतिबिम्ब बन सकता है।
'सोह जानहि जेहि देहु जानई
जानत तुमहिं तुमहिं हुई जाई'
महर्षि जी अपनी पुस्तक 'साइंस ऑफ बीइंग एंड आर्ट ऑफ लिविंग' में समझाते हैं कि हमारी देह हमारे तंत्रिका-तंत्र यानी नर्वस सिस्टम की बाह्य अभिव्यक्ति है। सारा ज्ञान समझना या न समझना इसी में स्थित कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। अतः देह के संपर्क में जीवनसत्ता की कला का अर्थ है कि उसका तारतम्य तंत्रिका-तंत्र से कितना बैठा सकते हैं। इस गतिविधि का विस्तार इस तरह करें कि देह जीवन सत्ता के स्तर से विमुख हुये बिना अपनी सम्पूर्ण क्षमता से कार्यरत रहे। 
महर्षि जी कहते थे कि हम स्वयं अपने सबसे बड़े संसाधन हैं। इस मूल-संसाधन का वैज्ञानिक प्रबंधन ही ज्ञान की कला है जीवनसत्ता का विज्ञान है।
गुरु शिष्य के गहन संबंध के प्रस्थान बिन्दु का एक दृष्टान्त है।
'गुरुदेव! मुझे दीक्षा दें'- जिज्ञासु कहता है।
-तुम कौन हो? - गुरु पुछते हैं।
'मैं घनश्याम' 
'यह तो तुम्हारा नाम हैं'
'मैं व्यापारी..' 
'यह तो तुम्हारा काम है'
'मैं पुरूष'
'यह तो तुम्हारा लिंग है'
'गुरुदेव इसके आगे मैं नहीं जानता' 
'अब ठीक है। सब लेबिल हट गये। विशुद्ध रह गया। यही है दीक्षा का ज्ञान-प्राप्ति का प्रस्थान बिन्दु' गुरु ने बाताय था। प्रकृति का समावेश दैहिक प्रकृति में हो जाए। जीवन सत्ता तो स्थायी, अपरिवर्तनीय और अमृत है। हम अस्थायी, सतत परिवर्तनीय और नित्य-मृतप्राय देह में इसी अविनाशी का समावेश करते रहते है। भावातीत ध्यान करने वाले साधक जानते हैं कि इस ध्यान पद्धति के निरंतर अभ्यास से एक ऐसी मनोस्थिति बन जाती है। जिसमें सक्रियता या निष्क्रियता के बिना समस्त तंत्रिका-तंत्र विश्राम पा जाता है। जब हमारा तंत्रिका-तंत्र इस स्थिति में पहुंच जाता है तब जीवन सत्ता यानी बीइंग देह के स्तर पर आ जाती है। 
सम्पूर्ण तंत्रिका-तंत्र और देह निलंबन की स्थिति में आ जाते हैं जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता और शरीर जीवन की समग्रता में बना रहता है। इन्द्रियां तथा प्राण हमारी देह में अतिच्छिन्न अंग हैं। देह के संदर्भ में जीवन सत्ता की कला का अध्ययन तभी पूरा होगा जब हम उसे तंत्रिका-तंत्र के संबंध में समझें कि अपनी मूल प्रकृति में जीवन सत्ता विशुद्ध आनंद चेतना है- विशुद्ध आनंद ही ब्रह्म है, अव्यक्त अव्यय है। अव्यक्त पुरुष यानी सृष्टि का मूल निर्गुण है। सापेक्ष संदर्भ में देखें तो अस्तित्व के सापेक्ष क्षेत्र में समस्त गुणों का आधार यह जीवन सत्ता ही है।
जीवन की कला को प्रकृति के नियमों के अनुसार होना चाहिये तभी व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव प्राकृतिक व्यवस्था में अधिकाधिक समन्वय और समायोजन स्थापित कर सकेगा। शरीर विज्ञान में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं को मानव विकास का अध्ययन रुचिकर लगेगा। इस उद्देश्य से उन साधकों का अध्ययन करना चाहिये जो भावातीत ध्यान-साधना निरंतर करते रहे हैं।
जैसा कि ऊपर बताया गया है 'सृष्टि का मूल अव्यय-पुरूष है जो अक्षर और क्षर सृष्टि का निर्माण करता है। इसी अव्यय-पुरुष में आनंद, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् नामक पांच कलायें है। ये सभी वहां विशुद्ध रूप में हैं। इसी निगुर्ण भाव को आत्मा कह सकते हैं। यही जब अक्षर रूप में विस्तृत होता है तब प्रकृति यानी सत् , रज, तम की त्रिगुणात्मक प्रकृति से घिर कर नये स्वरूप में आता है। 
अहं उत्पन्न होता है और यही अहं भाव जीवात्मा को परमात्मा से विलग कर देता है। मन और बुद्धि दोनों इसी निर्गुण-माया से घिरे रहते हैं। अभ्यास तथा स्वरूप से इसे प्रत्यक्ष रूप में जाना जा सकता है। मन और बुद्धि दोनों को भावातीत ध्यान के निरंतर अभ्यास से स्थिर किया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप हमारा तंत्रिका-तंत्र मूल जीवन सत्ता से विलग हुये बगैर सक्रिय रह सकता है।

ब्रह्मचारी गिरीश 
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश एवं
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी,
भारत का ब्रह्मस्थान, म.प्र.

घनश्याम सक्सेना
प्रसिद्ध लेखक एवं चिन्तक, भोपाल, म.प्र.


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