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कहानी लेखन में पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं-ममता

कहानी लेखन में पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं-ममता

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 648 दिन 15 घंटे पूर्व
10/12/2017
नई दिल्ली [ MAHAMEDIA]  चर्चित लेखिका ममता कालिया का कहना है कि पिछले कुछ समय से हिंदी में महिला लेखिकाएं जिजीविषा के साथ काफी कुछ लिख रही हैं और कहानी लेखन में एक तरह से पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं.ममता को उनके उपन्यास दुक्खम-सुक्खम के लिए प्रतिष्ठित व्यास सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है. इस घोषणा पर प्रसन्नता जताते हुए उन्होंने एक विशेष बातचीत में कहा कि उनके लिए यह दुगुनी खुशी की बात है क्योंकि इसी वर्ष हिंदी की एक अन्य वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है. उन्होंने कहा कि हिंदी में पिछले कुछ समय से महिलाओं द्वारा अपने बारे में खुलकर लिखा जाना एक अच्छा संकेत है.उन्होंने कहा कि देखा जाए तो समाज में एक सकारात्मक किस्म का वातावरण बन रहा है. उन्होंने कहा कि वह कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से भी काफी खुश हैं क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही लेखन में लगा दिया और वह हम जैसे कितने ही लोगों की प्रेरणा स्रोत हैं.उन्होंने कहा कि ऐसे पुरस्कारों के कारण लेखिकाओं के प्रति नजरिया बदलता है. उन्होंने कहा, यह अच्छा संकेत है कि महिलाएं अपनी पीड़ा, संघर्षों और अनुभवों के बारे में खुलकर लिख रही हैं.में गल्प लेखन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, 10-15 साल पहले कहा जाता था कि स्त्रियां भी लिखती हैं. स्त्रियों ने इस बीच लिखकर यह साबित कर दिया कि स्त्रियां ही लिख रही हैं. मुझे एक तरह से लगता है कि कहानी लेखन में पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं. आप उन्हें अंगुलियों पर गिन सकते हैं. इस स्थिति के पीछे कारण आप कह सकते है कि स्त्रियों की जिजीविषा हो. उनका अड़ियलपन हो? आप कुछ भी कह सकते हैं.मानती है कि कहानी कहने के कई तरीके होते हैं. कोई मुकम्मल तरीका नहीं होता. इधर, लेखिकाएं बहुत तरीके से लिख रही हैं. उनमें लेखन का एक छोटा-सा जलजला उठा हुआ है. रोज ही कोई न कोई रचना आ जाती है जो ध्यान खींचती है.दुक्खम-सुक्खम उपन्यास लिखे जाने की पृष्ठभूमि के बारे में ममता ने बताया कि यह उपन्यास दरअसल महात्मा गांधी के महिलाओं पर पड़े प्रभाव की पृष्ठभूमि में लिखा गया.उन्होंने कहा कि इस उपन्यास को लेकर वह शुरू में काफी सशंकित थी कि आज के जमाने में उनकी दादी से जुड़ी कहानी को कौन पढ़ेगा. इसमें कोई आंदोलन, कोई उठापटक नहीं है. सीधी-सीधी सी कहानी है. किंतु उनके पति एवं प्रसिद्ध कहानीकार दिवंगत रवींद्र कालिया और वरिष्ठ कथाकार अमरकांत ने उन्हें समझाया था कि उपन्यास की यह शैली बिल्कुल सही है और इसे काफी पसंद किया जाएगाउन्होंने बताया कि यह महात्मा गांधी का ही प्रभाव था कि कई महिलाओं ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन के समय रेशमी साड़ियों की जगह खादी की धोती पहनना शुरू कर दिया था. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ा, इस बारे में बहुत कम लिखा गया है. उन्होंने कहा कि यह नये किस्म का फेमिनिज्म है जिससे समाज में सकारात्मक विचार आते हैं.पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वह मथुरा की रहने वाली हैं. दुक्खम-सुक्खम भी मथुरा के आसपास की ही कहानी है. उनके पति स्वयं एक अच्छे कथाकार रहे हैं. इस संबंध में उन्होंने हंसते हुए अपने पति के एक वाक्य का हवाला दिया, ममता की पृष्ठभूमि कल्चर से है और मेरी एग्रीकल्चर से. रवींद्र कालिया का संबंध पंजाब से था     
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