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वैदिक परंपरा के ये गुरुकुल

वैदिक परंपरा के ये गुरुकुल

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 940 दिन 16 घंटे पूर्व
18/04/2017
कर्नाटक के मंगलुरु से 40-50 कि.मी. दूर है विट्टला और विट्टला से कोई चार-पांच कि.मी. दूर है मुरकजे। इसी गांव में नारियल और सुपारी के घने उपवन के बीच परमेश्वरी अम्मा की छोटी सी कुटिया में मानो ?सतयुग? वापस लौट आया है। परमेश्वरी अम्मा अब नहीं रहीं लेकिन उनके आंगन में जिस प्रकार वैदिक ऋचाएं गूंज रही हैं, वह कालचक्र के इस महान निर्णायक मोड़ को स्वत: परिभाषित कर रही हैं। अभी कुछ ही वर्ष पहले की बात है, देश में विवाद का विषय बन गया था कि स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है। यह विवाद जब उफान पर था, उसके पूर्व ही मुरकजे ग्राम ने इस रूढ़ि को धता बता दिया था। आज एक-दो नहीं सैकड़ों की संख्या में बालिकाएं परमेश्वरी अम्मा के आनन्द आंगन में वेद पाठ कर रही हैं।  परमेश्वरी अम्मा मुरकजे गांव की रहने वाली थीं। 1997 में उनका शरीरांत हुआ किन्तु इसके पूर्व अपने भतीजे वेंकटरमण भट्ट की प्रेरणा से उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, सैकड़ों एकड़ जमीन कन्याओं के गुरुकुल के लिए दान कर दी। कन्याओं को वेद शिक्षा देने वाले इस मैत्रेयी गुरुकुल की स्थापना श्री कृष्णप्पा, श्री सीताराम केदिलाय, श्री सूर्यनारायण राव प्रभृति वरिष्ठ प्रचारकों की प्रेरणा रा.स्व. संघ के स्वयंसेवकों के प्रयासों एवं 1994 में बंगलुरु में हुई। 1999 में मंगलुरु स्थित परमेश्वरी अम्मा के घर, उससे जुड़ी सैकड़ों एकड़ जमीन में मैत्रेयी गुरुकुल स्थानांतरित हो गया। आज यहां 101 कन्याएं हैं जो वेद शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों की शिक्षा भी ग्रहण कर रही हैं। छह वर्षीय पाठक्रम, किन्तु भोजन, आवास एवं शिक्षा का कोई शुल्क नहीं। योग्यता, प्रतिभा और रुचि के मूल्यांकन पर आधारित चयन प्रक्रिया और पूरे छह साल तक कठोर दिनचर्या के अन्तर्गत गुरुकुल में निवास। आधुनिक पद्धति की पांचवीं कक्षा से यहां कन्याओं का प्रवेश होता है और दसवीं श्रेणी तक की शिक्षा प्राप्त कर वे अपनी वेद और आधुनिक विषयों की शिक्षा पूर्ण कर लेती हैं। इन छह वर्षों में इन्हें कोई परीक्षा नहीं देनी होती। वार्षिक मूल्यांकन हेतु यहां वैदिक पद्धति का अनुसरण किया जाता है जिसमें कोई भी किसी विषय में कम अंक के कारण अनुत्तीर्ण नहीं किया जाता। मातृश्री मीनाक्षी इसका कारण बताते हुए स्पष्ट करती हैं- ?निसर्ग में तो सभी कुछ न कुछ गुण लेकर ही आते हैं, फिर कोई उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण कैसे हो सकता है। विद्यालय प्रतिभा निखारें, बस! ईश्वर की अनमोल कृतियां अपना भविष्य स्वयं तय कर लेंगी।  लगभग एक दर्जन मातृश्री (शिक्षिकाएं) यहां रहकर प्रमुख मातृश्री सावित्री देवी के सुयोग्य संचालन में इन कन्याओं को पंचमुखी शिक्षा पद्धति के अनुसार विविध विषयों का शिक्षण देती हैं। पांचवीं कक्षा को यहां श्रद्धा कहते हैं और दसवीं तक क्रमश: मेधा, प्रज्ञा, प्रतिभा, धृति: और धी: नाम से श्रेणी-कक्षाओं का सुन्दर नामकरण किया गया है। वेद शिक्षा के अन्तर्गत यहां ऋग्वेद के चयनित सूक्तों, तैत्तरीय उपनिषद सहित अन्य संकलित ऋचाओं, यज्ञ विधियों, शांतिपाठ, नित्य पूजा कर्म के साथ श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत के अनेक अंशों का शिक्षण दिया जाता है। सभी कन्याएं श्रद्धा श्रेणी के स्तर पर ही स्वर-लय के साथ वेदमंत्रों का पठन करने लगती हैं। इसके अतिरिक्त गणित, इतिहास, भूगोल, अंग्रेजी, कन्नड़, संस्कृत, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, योग शिक्षा, कृषि-कर्म के साथ कम्प्यूटर, स्वरुचि के अनुसार पेंटिंग, नृत्य-कला, नाट शिक्षण, संगीत आदि का शिक्षण भी प्रत्येक श्रेणी के अनुसार यहां दिया जा रहा है। आधुनिक विज्ञान के शिक्षण के लिए यहां कणाद नामक सुन्दर प्रयोगशाला है, तो भारद्वाज नामक कम्प्यूटर रूम है, जिसका संचालन वरिष्ठ श्रेणी की कन्याएं करती हैं। जिज्ञासा नामक पुस्तकालय, निरामया नामक चिकित्सा कक्ष और कन्याओं के निवास तथा अध्ययन के लिए यहां विश्ववारा, गार्गी, आराधना, सुनैना, चुड़ाला आदि अनेक प्रकोष्ठ हैं। अन्नपूर्णा नामक भोजनालय और सुन्दर गोशाला भी यहां है। पूरे परिसर की देखभाल करने वाले 5 गृहस्थ परिवार भी यहां रहते हैं।

प्रतिदिन प्रात:काल 5 बजे से गुरुकुल की दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है, कक्षाओं का प्रारंभ सामूहिक वेदपाठ, श्रीमद्भगवद् गीता-पाठ से होता है, उसके पूर्व योग-शिक्षण और योगाभ्यास सभी के लिए अनिवार्य है। इसके बाद पंचायतन पूजा और फिर जलपान और भोजन अवकाश के साथ शाम 4.30 बजे तक शिक्षण-कक्षाएं। परिसर के मध्य में भारत माता की अत्यंत सुन्दर प्रतिमा, नित्य भारत माता की आराधना और रा.से. समिति की शाखा भी इस गुरुकुल की दिनचर्या का हिस्सा है। शाम के समय बागवानी और कृषि कार्य में सभी कन्याएं जुटती हैं। जिसकी जैसी रुचि, वो वैसे कार्य में सक्रिय हो जाती है। कहीं फूलों की क्यारियां, कहीं सब्जी-तरकारी तो कहीं नारियल, सुपारी, वनिला, केले व अन्य फलदार वृक्षों की सेवा, गोमाता की सेवा, गोशाला की भी देखभाल और इन सभी कार्यों में वेंकटरमण सपत्नीक कन्याओं का मार्गदर्शन करते हैं। सभी मातृश्री भी अपनी-अपनी श्रेणी के साथ निरन्तर किसी न किसी युक्ति से कन्याओं का शिक्षण करती हैं।

श्रृंगेरी की आश्रिता, उडुपी की रक्षिता, बागलकोट की सहना, शिवमोगा की वत्सला, बंगलुरु की अपर्णा, हासन की स्वाती से हम मिले, ये सभी यहां की वरिष्ठ छात्राएं हैं। सभी को यहां रहने-पढ़ने का आनन्द भाता है, वेद मंत्रों का सस्वर पाठ इनके मुंह से सुनने का आनन्द ऐसा कि तुरंत ध्यान लग जाए। ग्रीष्म अवकाश में सभी कन्याओं के माता-पिता इन्हें घर ले जाते हैं लेकिन गुरुपूर्णिमा के पूर्व सभी को वापस आना होता है। बीच-बीच में अभिभावक इन बच्चों का हाल-चाल लेने आते रहते हैं।

श्रृंगेरी में रहकर संगीत साधना में जुटी आश्रिता ने हाल ही में मैत्रेयी गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूर्ण की। उसने बताया, ?मैत्रेयी गुरुकुल ने जीवन जीने की कला सिखाई है, जीवन का उद्देश्य भी बताया है। संगीत और कन्नड़ साहित्य की साधना करने की मेरी योजना है। दीक्षान्त में समाज के लिए कुछ न कुछ करने का जो वचन मैंने दिया, उसे निभाऊ?ंगी।? कर्नाटक के बीजापुर जिले के इंडी तालुके का एक छोटा सा गांव है- गुदूवाना। यहां के लिंगायत समुदाय की कन्या ज्योति कोई दो साल पहले गुरुकुल से पढ़ाई पूरी कर अपने गांव पहुंची। गांव में उसने अपने माता-पिता को विधिपूर्वक पूजा-पाठ करना सिखाया, घर में उसके बाबा, जो उसके गुरुकुल जाने से कभी नाराज थे, घर में वेद मंत्रों का नित्य पाठ देख भावविह्वल हो उठे, परिवार में संस्कृत भाषा के साथ सुसंस्कृत वातावरण निर्मित हुआ। पूरा गांव मानो ज्योति की ज्योति से जगमगा उठा। गुरुकुल की यह प्रेरणा कि ?घर में बैठने के लिए ये शिक्षा नहीं ली,? को पूर्ण करते हुए ज्योति ने आस-पास की अन्य छोटी बालिकाओं को सुशिक्षित करने के प्रयास शुरू किए हैं। कुछ ऐसा ही शुरू किया चित्रदुर्ग जिले के पास मडकालमोरु के कोंडलाहल्ली गांव की एक कृषक कन्या शकुन्तला ने। शकुन्तला वेद और आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर घर पहुंची तो लोगों को लगा कि अब ये गांव में क्या करेगी। लेकिन नहीं, शकुन्तला ने अपने पिता को खेती के कार्य में सहयोग देना प्रारंभ किया। गुरुकुल में जैविक खेती का अभ्यास जो उसने किया था, अब ये प्रयोग उसकी प्रेरणा से घर वालों ने प्रारंभ किया। घर में नित्य यज्ञ धूम्र भी उठने लगा। पास-पड़ोस की स्कूल न जाने वाली कन्याओं को नियमित पढ़ाने का काम भी शकुंतला ने प्रारंभ कर दिया।

गुरुकुल में ही पढ़ी-लिखी वैशाली का विवाह चिकमंगलूर के होरानाडु गांव के एक सुप्रसिद्ध धर्माधिकारी के पुत्र से हुआ। अन्नपूर्णा देवी शक्ति स्थल के उक्त धर्माधिकारी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि उनकी बहू वेदमंत्रों का विधिपूर्वक पाठ करती है। घर के सारे काम भी निपटाती है और अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़कर घर के अन्य सदस्यों को देश-विदेश की जानकारी भी देती है। सुसंस्कारित वातावरण को और अधिक सुसंस्कारमय बनाने वाली बहू धर्माधिकारी परिवार को मिली, इससे बढ़कर आनन्ददायक और क्या हो सकता है।

मैसूर में एक महाविद्यालय में ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने वाली निवेदिता भी जब गुरुकुल में आई थी तब उसे कल्पना नहीं थी कि एक दिन उसकी गिनती एक विदुषी नारी के रूप में होगी। गुरुकुल से उसे जो शिक्षा मिली, उसका उपयोग करते हुए जहां उसने स्नातक स्तर पर ज्योतिष-संस्कृत- व्याकरण को अपने अध्ययन का विषय बनाया वहीं कम्प्यूटर तथा अंग्रेजी के ज्ञान को भी और निखारा।

यहां से पढ़कर निकलने वाली बालिकाएं न सिर्फ संस्कृत-ज्योतिष -वेद- धर्मशास्त्रों वरन् इंजीनियरिंग, एयरोनोटिक इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्नीक, आई.टी.आई., आयुर्वेद, शिक्षा शास्त्र, संगीत, हिन्दी, अंग्रेजी एवं कन्नड़ साहित्य में उच्च अध्ययन कर रही हैं। मैत्रेयी गुरुकुल द्वारा आस-पास के ग्रामों में बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने के लिए बाल-गोकुलम के आयोजन बहुत लोकप्रिय हुए हैं। गुरुकुल ने अपनी स्थापना के 12 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य उत्सव का आयोजन किया जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय महिलाओं ने हिस्सा लिया।

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