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शंकर का अद्वैत-एकात्म दर्शन

शंकर का अद्वैत-एकात्म दर्शन

admin | पोस्ट किया गया 672 दिन 11 घंटे पूर्व
19/12/2017
भोपाल (महामीडिया)  धन्य है मध्यप्रदेश और उसका नगर ओंकारेश्वर जहां भारतीय अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना के आधार स्तंभ, सांस्कृतिक एकता और मानव मात्र में एकात्मता के उद्घोषक, अद्वैतवाद के अजेय धर्म योद्धा ने दीक्षा प्राप्त की। विडम्बना है कि मानव समानता का शंकर का यह ब्रह्मज्ञान केवल दर्शन शास्त्र का विषय बना रहा और संयोग है कि शंकर के अद्वैत को लोक जीवन में व्याप्त कर समरसता की नर्मदा प्रवाहित करने का बीड़ा श्री शिवराज सिंह ने उठाया है। देश की चारों दिशाओं में पीठ स्थापित कर राष्ट्र-समाज की चेतना को एकाकार करने का दिव्य प्रयत्न करने वाले युग पुरुष की मूर्ति स्थापना के लिए घर-घर से धातु संग्रह का अभियान लोक चेतना में समानता एवं एकता का भाव संचारित कर सकेगा। कैसा संयोग है कि ज्ञान के पूर्ण चेतना पुरुष शंकर का जन्म केरल की पूर्णा नदी के तट पर बसे कालडी ग्राम में हुआ। पिता शिवगुरू और माँ आर्याम्बा थे और उन्होंने बालक को प्रभु प्रसाद मानकर उसका नाम शंकर-शम् अर्थात शांति और कर अर्थात् प्रदाता-शक्ति प्रदाता शंकर रखा। अद्भुत स्मरण शक्ति से संपन्न बाल शंकर ने मात्र सात वर्ष की आयु में शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और माँ की अनुमति से सन्यास ग्रहण कर आठ वर्ष की आयु में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा लिए ब्रह्मज्ञानी गुरू की खोज में निकल पड़े। दुर्गम वनों, अलंध्य पर्वतों और ऊफनती नदियों को पार कर यह बाल योगी लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व (792 ई.) मात्र बारह वर्ष की आयु में ओंकारेश्वर में नर्मदा तट स्थित गुरू गोविन्दपादाचार्य के आश्रम में पहुँचा। शंकर ने उस गुफा को निहारा जहाँ ऋषि ध्यान मग्न थे। भक्तिभाव से दण्डवत् कर गुरू गोविन्दपाद की स्तुति की और ब्रह्मस्वरूप को समझने के लिए शिष्य रूप में स्वीकार किए जाने की प्रार्थना की । गुरू ने प्रश्न किया-बालक तू कौन है? और ज्ञानी शंकर ने संस्कृत में ही कैसा अद्भुत उत्तर दिया- स्वामी ! मैं न तो पृथ्वी हूँ। न जल हूँ। न अग्नि हूँ। न वायु हूँ । न इसमें से कुछ भी हूँ। न ही कोई गुणधर्म हूँ। मैं इन्द्रियों में से कोई इन्द्रिय भी नहीं हूँ। मैं तो अखण्ड चैतन्य हूँ। ज्ञानी शंकर के इस अनन्त साक्षी उत्तर से गुरू अभिभूत हो गए। गुरू ने दीक्षा दी और शंकर को अपना शिष्य बना लिया। गुरू को विश्वास हो गया कि बालक शंकर एक विशुद्ध आत्मा है और उन्होंने शंकर को मानवदेहधारी कैलाश-शंकर घोषित कर दिया।
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