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नव वर्ष की मंगल व हार्दिक शुभकामनाएं

नव वर्ष की मंगल व हार्दिक शुभकामनाएं

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 653 दिन 12 घंटे पूर्व
01/01/2018
भोपाल (महामीडिया) वर्ष 2018 अति महत्वपूर्ण है। यह परम पूज्य महर्षि महेश योगी का जन्म शताब्दी वर्ष है। इस वर्ष महर्षि जी के सभी भारतीय संस्थानों ने मिलकर निश्चय किया है कि इस वर्ष को एक महोत्सव के रूप में मनायेंगे और महर्षि जी द्वारा प्रदत्त ज्ञान व तकनीकों को वृहद स्तर तक मानवता के हित में जन-जन तक पहुंचायेंगे। यह महोत्सव इस वर्ष प्रारम्भ तो होगा किन्तु समाप्त कभी नहीं होगा, अनवरत यावत चन्द्र दिवाकर चलता रहेगा क्योंकि इस उत्सव के अन्तर्गत आयोजित कार्यक्रम आगे आने वाले समय और समस्त पीड़ियों के लिये लाभ प्रदायक और जीवनोत्थान के लिये परमावश्यक हैं इस उत्सव के कुछ प्रमुख कार्यक्रम और योजनायें इस प्रकार हैं-
भारतवर्ष की सामूहिक चेतना में सतोगुण की वृद्धि के लिये भारत की जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल बराबर, अर्थात लगभग 3500 भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम और योगिक उड़ान भरने वाले साधकों के अनेक स्थायी समूह बनाना।  प्रत्येक प्रान्त और नगर की जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल के बराबर संख्या में भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम तथा योगिक उड़ान भरने वालों के स्थायी समूह बनाना। प्रत्येक नगर में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा तक की आदर्श शिक्षा व्यवस्था करना जिसमें आत्मा आधारित शिक्षा-वेद विज्ञान पर आधारित शिक्षा-चेतना पर आधारित शिक्षा सम्मिलित है। प्रत्येक नगर व विकास खण्ड में महर्षि वे विज्ञान भवन की स्थापना करना जिसमें अष्टांग योग, भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम, योगिक उड़ान और वेद विज्ञान के समस्त जीवनोपयोगी विषयों का ज्ञान उपलब्ध कराना। 48 ब्रह्मानन्द सरस्वती नगरों की स्थापना करना जहां 1500 वैदिक याज्ञिक नित्य प्रमुखतः एक अतिरुद्राभिषेक और अन्य यज्ञानुष्ठानों का संपादन विश्व परिवार के समस्त सदस्यों के सुख, शांति, सम्पन्नता, समृद्धि, स्वास्थ्य, सुरक्षा, प्रबुद्धता और अजेयता के संकल्प के साथ करेंगे। प्रत्येक ब्रह्मानन्द सरस्वती नगर से चार देश जुड़े होंगे जो इन नगरों का वित्तीय पोषण करेंगे और वैदिक विद्वान इन देशों के कल्याण के लिये यज्ञानुष्ठान संपादित करेंगे। इन ब्रह्मानन्द सरस्वती नगरों में चारों आश्रमों-ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थी और सन्यास आश्रम का प्रशिक्षण और आवास होगा। प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्र की जन्म पत्रिका में गृहों की स्थिति के अनुसार समय-समय पर गृहस्थिति की व्यवस्था करना। महर्षि तीर्थ विकास योजना के अन्तर्गत प्रत्येक तीर्थ में वैदिक विधानों से विधिवत देवाराधना, यज्ञों का प्रशिक्षण और व्यवस्थ करना। प्रत्येक नगर में महर्षि स्वास्थ्य विधान केन्द्रों, चिकित्सालयों एवं प्रत्येक प्रान्त में चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना करना एवं रोग निवारक चिकित्सा के लिये प्रशिक्षण व औषधियों का निर्माण कराना। महर्षि स्थापत्य वेद-वास्तु विद्या के आधार पर घरों, संस्थागत भवनों, कार्य स्थलों, व्यावसायिक भवनों, साधना व आराधना स्थलों, शैक्षणिक भवनों व कारखानों आदि का निर्माण, ग्राम व नगर योजना, विन्यास तथा निर्माण करना/कराना। महर्षि जैविक कृषि के सिद्धाँतों और प्रयोगों का प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण और उत्पादों के विक्रय से अर्जित राशि द्वारा एकीकृत ग्राम विकास की व्यवस्था करना, निर्धनता उन्मूलन करना। महर्षि गन्धर्ववेद के अध्ययन, अध्यापन तथा कार्यक्रमों के द्वारा वातावरण में संगीत की समन्वयकारी श्रुतियों, स्वरों व ध्वनियों का स्पन्दन करके प्रकृति में सामन्जस्य व संतुलन बनाये रखना। परम पूज्य महर्षि जी ने हमें मानव जीवन को धन्य करने वाली जो योजनायें कार्यक्रम, ज्ञान और तकनीक दी हैं वे शाश्वत सनातन वेद विद्या और आधुनिक विज्ञान, दोनों से ही प्रमाणित हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम सब इस ज्ञान-विज्ञान को अच्छे से समझकर अपने जीवन में नित्य उतारें। यदि हम महर्षि जी प्रदत्त तकनीकों का प्रात: सन्ध्या अभ्यास करें तो हम निश्चित रूप से अपने विश्व परिवार को सुखी, सम्पन्न, समृद्ध, स्वस्थ्य, प्रसन्न, तनावरहित, शाँतिमय, अजेय और भूतल पर स्वर्ग जैसा बना सकते हैं। महर्षि जी के निरन्तर 50 वर्षों तक के अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कार्य उपलब्धियों का एक संक्षिप्त विवरण हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे आपको ज्ञात होगा कि एक सर्वसमर्थ चेतनावान दैवीय शक्ति से परिपूर्ण सिद्ध महात्मा हजारों वर्षों का कार्य कैसे 50 वर्ष के एक संक्षिप्त काल में पूर्ण कर सकते हैं। अनन्त श्रीविभूषित ज्योतिष्पीठोद्धारक एक परम तपस्वी, ज्ञानी और वेदान्ती, सर्वसमर्थ चेतना के प्रत्यक्ष प्रमाण, साधक, जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के परम प्रिय शिष्य परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी हुए। महर्षि जी को जितनी भी संज्ञाओं या उपमाओं से सुशोभित किया जाये वह कम है। बाल ब्रह्म्चारी, परम योगी, विश्व प्रशासक, युग पुरुष, ऐतिहासिक पुरुष, चेतना वैज्ञानिक, वेदमूर्ति, ज्ञानमूर्ति, संत, महात्मा, महर्षि, ब्रर्ह्म्षि, राजर्षि, एक वास्तविक जगद्गुरु आदि संज्ञायें यदि किसी एक महापुरुष के लिये कम पड़ती हों तो वो महर्षि महेश योगी हैं। जब हम अपने गुरु के लिए ब्रह्म, विष्णु, शिव और परमब्रह्म की उपाधियुक्त स्तुति करते हैं तो किंचित त्रिदेवों का भाव जागृत होता है, किन्तु उन भक्ति के क्षणों में देवों के गुणों अथवा उनके कार्यों की व्याख्या नहीं हो पाती। महर्षि जी ने कभी भी न स्वयं को गुरु कहा और न किसी से अपने को गुरु कहलवाया। सारा जीवन अपने परमाराध्य गुरुदेव अनन्त श्रीविभूषित स्वामी ब्रह्मनन्द सरस्वती जी के श्रीचरणों का स्मरण, उनका पूजन और सारे विश्व में जय गुरुदेव का उद्घोष कर उनकी जय-जयकार करते रहे और करवाते रहे। सारे विश्व ने महर्षि जी को न केवल एक विशिष्ट शिक्षक या गुरु का स्थान दिया बल्कि वे वास्तविक ऐतिहासिक जगद्गुरु हुये और वैदिक गुरु परम्परा में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना गये। भारत ही नहीं, विश्व के अनेक राष्ट्रों में गुरुजनों का विशेष सम्मानजनक और पूज्यनीय स्थान रहा है। यदि इतिहास को देखा जाये तो ज्ञात होता है कि प्रत्येक महान व्यक्ति के जीवन में सफलता का पथ प्रदर्शित करने वाले कोई न कोई गुरु ही रहे हैं। वेद भूमि भारत ने सदा ही गुरु को सर्वोच्च स्थान देते हुए ईश्वरतुल्य माना है। गुरु को ब्रह्म, विष्णु और शिव तीनों गुणों का धारक मानकर चरण वन्दन और पादुका पूजन किया जाने लगा। भारतीय दर्शन स्पष्ट करता है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और ज्ञान के बिना मोक्ष की प्राप्ति अर्थात ईश्वर से साक्षात्कार या मिलन सम्भव नहीं है। इसीलिये भारत में गुरुकुल प्रणाली से, गुरु शिष्य परम्परा से शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति की प्रणाली स्थापित हुई और आधुनिक शिक्षा को छोड़ महर्षि जी अपने गुरु से शाश्वत ज्ञान प्राप्ति के लिये इसी शिक्षाक्रम में सम्मिलित हो गये। भारतीय शाश्वत सनातन वैदिक ज्ञान-विज्ञान के आधार पर वेदभूमि-पूर्णभूमि-देवभूमि-पुण्यभूमि-सिद्ध भूमि- प्रतिभारत भारतवर्ष का जगद्गुरुत्व और ख्याति जिस तरह महर्षि जी ने समस्त भूमण्डल में हजारों वर्षों के अन्तराल के पश्चात पुन: स्थापित की और भारतीय वैदिक ज्ञान का लोहा मनवाया, ऐसा उदाहरण या दृष्टांत समूचे वैदिक वांघमय में या आधुनिक काल में कहीं भी वर्णित नहीं है।
ब्रह्मचारी गिरीश
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश एवं
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी, भारत का ब्रह्मस्थान, म.प्र.

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