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महर्षि चेतना आधारित शिक्षाः विद्यार्थियों के लिये वरदान

महर्षि चेतना आधारित शिक्षाः विद्यार्थियों के लिये वरदान

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 652 दिन 16 घंटे पूर्व
08/01/2018
भोपाल (महामीडिया) ब्रह्मचारी गिरीश शिक्षा का प्रयोजन है व्यक्ति का सर्वांंगीण विकास जिसके अन्तर्गत मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, और आध्यात्मिक विकास निहित होता है जिससे व्यक्ति को जीवन में पूर्णता और संतुष्टि प्राप्त होती है और शिक्षा का प्रयोजन पूर्ण होता है। शिक्षा से मनुष्य का व्यक्तित्व संपूर्ण, विनम्र, शिष्ट और अनुशासित होता है और इस प्रकार वह मैत्रीपूर्ण संबंधों का विस्तार करके एक आदर्श परिवार, स्वस्थ समाज और सशक्त देश का निर्माण करता है। शिक्षित होने का अर्थ प्राप्त ज्ञान और विचारों को सही दिशा प्रदान करना। शिक्षा व्यक्ति को उसकी योग्यताओं और क्षमताओं से परिचित कराती है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का परिचय स्वयं के अन्दर निहित जागरूकता, उस ज्ञान के सागर से होता है जिसका अनुभव व्यक्ति को वैसा ही आनन्द देता है जैसा वह स्वयं के घर में महसूस करता है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि ज्ञान के इस सागर का अनुभव जागरूकता के स्तर पर कराया जाये जिससे कि व्यक्ति को पूर्णता का अनुभव होगा। यह तभी संभव होगा जब शिक्षा व्यवस्था व्यक्तिपरक और वस्तुपरक दोनों का ज्ञान उपलब्ध करायें। शिक्षा सभ्यता की आत्मा और बुद्धि है। वही सभ्यता आनन्ददायक और सनातन होती है जिस शिक्षण व्यवस्था में भोैतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों का ज्ञान सम्मिलित होता है।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इसलिए अपूर्ण है क्योंकि इसमें व्यक्तिपरक ज्ञान का अभाव है। यह केवल वस्तुपरक ज्ञान देती है जिसके कारण यह ज्ञान के मूलाधार से विमुक्त रही। यही कारण है कि आज का शिक्षित व्यक्ति भी अज्ञानी की तरह पराश्रित है। बिना ज्ञाता के ज्ञान की वस्तुपरक जानकारी निराधार है। विषय के प्रति अज्ञानता ज्ञान की अपेक्षा तेजी से बढ़ रही है। निःसंदेह वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने आधुनिक जीवन शैली को पहले से आरामदायक बना दिया है। फिर भी यह आध्यात्मिक लक्ष्य को पूर्ण नहीं करती। शिक्षा व्यवस्था में ये समस्या सदियों से चली आ रही है। यह अपूर्ण है, यह व्यक्ति को पूर्ण नही बनाती। जीवन में पूर्णता लाने के लिए व्यक्तिपरक और वस्तुपरक दोनों प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता होती है। आधुनिक शि़क्षा व्यवस्था ज्ञाता को स्वयं को जानने का अवसर नहीं देती जिसके कारण ज्ञाता द्वारा अर्जित ज्ञान निराधार हो जाता है। पूर्णता के लिए अन्य विषयों के साथ ज्ञाता का ज्ञान भी आवश्यक है तभी जीवन में उन्नति संभव है। पर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में इन सबका अभाव है जिसे पूरा करना है, कैसे ? महर्षि चेतना आधारित शिक्षा को वर्तमान शिक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित करके इस अभाव को दूर किया जा सकता है। महर्षि चेतना आधारित शिक्षा की विशेषता यह है कि इस शिक्षा में केवल बुद्धिपरक होकर ज्ञानपूर्ति नही की जाती। इस व्यवस्था में चेतना का निरन्तर विस्तार किया जाता है। विद्यार्थी की जिज्ञासा बढ़ती जाती है और नया-नया सम्पूर्ण ज्ञान जो स्वयं उसकी चेतना में निहित है, वह प्रस्फुटित होकर उसे महाज्ञानी बना देता है। परम् पूज्य महर्षि महेश योगी जी के शब्दों में ''शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति के मन और बुद्वि को इस प्रकार सक्षम बनाना कि वह जीवन के क्षेत्र में जो भी उपलब्धि पाना चाहे पा सके। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह व्यक्ति के अन्दर निहित मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक समस्त संभावनाओं को प्रयोग करने के लिये उसे योग्य बना सके। साथ ही साथ व्यक्ति के अन्दर ऐसी योग्यता विकसित करे कि वह अपने व्यक्तित्व, परिवेश और परिस्थिति का बेहतर प्रयोग कर सके और दूसरों के लिए भी उपयोगी हो।'' 
ज्ञाता के ज्ञान के अभाव को महर्षि चेतना आधारित शिक्षा से पूर्ण किया जा सकता है। महर्षि महेश योगी जी का चेतना आधारित शिक्षा कार्यक्रम चेतना विज्ञान पर आाधारित है। अन्य विज्ञानों की तरह ही चेतना विज्ञान के भी दो पक्ष हैं - सैद्धांतिक और प्रायोगिक। चेतना विज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष में सभी कुछ शामिल है जबकि प्रायोगिक पक्ष स्वयं के अनुभव पर आाधारित है जिसमें व्यक्ति भावातीत ध्यान सिद्धि और यौगिक फ्लांइग का अभ्यास करके भावातीत चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करता है। चेतना विज्ञान प्राचीन मान्यताओ, ज्ञान और अनुभव का नया विज्ञान है जो व्यक्ति के स्नायुमंडल में एकत्रित तनाव और दबाव को दूर करके उसके अंदर सृजनात्मक बुद्धि का विस्तार करता है। यह चेतना का विज्ञान है जिसमें व्यक्ति का मन बाह्य जगत में क्रियाशील होते हुए भी उसे भीतर से शांति का अनुभव कराता है। विशुद्ध चेतना का क्षेत्र ही सृजनात्मकता का क्षेत्र है और जब इसके प्रकाश में सभी विषयों का अध्यापन कराया जाएगा तो वह अधिक ग्राह्य होगा। भावातीत ध्यान के नियमित अभ्यास से व्यक्ति की विशुद्ध चेतना प्रकाशित होगी जो सामुहिक चेतना को सुसम्बद्ध करके राष्ट्र को अजेय बनाएगी। महर्षि चेतना आधारित शिक्षा की अद्वितीय विशेषता यह है कि यह ज्ञाता की असीमित सामथ्र्य के विकास की देखरेख करता है जिसमें व्यक्ति का मन, बुद्वि और अहंकार शामिल होता है। यह ऐसी शिक्षा व्यवस्था है ? जिसमें एक व्यक्ति के मन में जैसे ही कोई विचार आयेगा तुरन्त पूर्ण हो जाएगा और उसे संघर्ष नही करना पडे़गा। (महर्षि) शिक्षा की यह अद्वितीय व्यवस्था वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों द्वारा प्रामाणिक है। विश्व के 35 देशों के 250 से भी अधिक विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में किए गये लगभग 700 वैज्ञानिक अध्ययनों से यह प्रमाणित किया जा चुका है कि भावातीत ध्यान से व्यक्ति के मन, शरीर और व्यवहार को अनगिनत लाभ होते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से प्राप्त परिणाम निम्न प्रकार हैं- सृजनात्मकता में वृद्धि बौद्धिक क्षमता में वृद्धि ऊर्जा के स्तर में वृद्धि  सहनशक्ति में वृद्धि  शैक्षणिक उपलब्धि में वृद्धि  स्ववास्तविकिरण में वृद्धि  स्वयं के विकास में वृद्धि  उच्च शिक्षा ग्रहण करने की दर में वृद्धि  नैतिक परिपक्वता में वृद्धि  चिंता में कमी  मनोवैज्ञानिक दबाव में कमी  व्यवहारगत समस्याओं में कमी छात्रों में समग्र वृद्धि । जब छात्र नियमित रुप से दो बार भावातीत ध्यान, सिद्धि का अभ्यास करते हैं तो उनका सम्पर्क विशुद्ध चेतना से होता है। परिणामस्वरूप वे अपने अन्दर इस अवस्था के गुणों को अनुभव करने लगते हैं। विज्ञान की मान्यता है कि सृष्टि में जिसकी भी उत्पत्ति हुई है वह सब एकीकृत क्षेत्र से हुई है। वेदों में भी यही बात कही गई है कि इस विश्व ब्रह्मांड में जो भी व्यक्त स्वरूप है वह सब स्वयं की आत्मा या विशुद्ध चेतना का ही स्पंदन है। भावातीत ध्यान के नियमित अभ्यास से व्यक्ति स्वयं की चेतना को जागरूक करके समस्त संभावनाओं के क्षेत्र को अपने अन्दर स्थापित कर सकता है जो सृजनात्मक ज्ञान का भण्डार है, जो प्रकृति के समस्त नियमों का घर है। व्यक्ति स्वयं की चेतना को सहज जागरूकता की अवस्था में स्थापित करके अपने जीवन का मालिक बन सकता है, एक ऐसा रचनाकार जिसे प्रकृति के नियमों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। उसकी इच्छायें प्रकृति द्वारा पोषित होंगी। व्यक्ति सर्वसमर्थवान, सर्वसत्तावान और शाश्वत होगा। महर्षि चेतना आधारित शिक्षा प्राकृतिक सिद्वांतों पर आधारित है जो छात्रों के स्वभाव को अजेय बनाता है।
महर्षि चेतना आधारित शिक्षा के उद्देश्य- शिक्षक एवं छात्र की अन्तर्निहित शक्ति का पुनरूत्थान  छात्र को असीमित क्षमता के स्तर से ज्ञान ग्रहण करने के योग्य बनाना  छात्र को जीवन का शासक बनाना व्यक्ति और देश को अजेय बनाना,  भावातीत ध्यान सिद्धि और यौगिक फ्लाइंग के नियमित अभ्यास से छात्र के अन्दर निहित प्रतिभा और सृजनात्मक बुद्वि को बाहर लाना  प्रत्येक छात्र को ज्ञान का केन्द्र बनाना  व्यक्तिगत चेतना में अनंत, असीमित जागरूकता लाना  व्यक्तिगत चेतना में सहज जागरूकता की अवस्था स्थापित करना जो कि चेतना की स्वाभाविक अवस्था है  व्यक्ति के जीवन में सुधार लाकर समस्त संभावनाओं के क्षेत्र की ओर ले जाना अज्ञानता की स्थिति को पूर्ण ज्ञान की स्थिति में परिवर्तित करना  विचारों में पूर्णता लाना  विश्व में सौन्दर्य और अनुरूपता का सृजन करते हुए धरती पर स्वर्ग का निर्माण करना है। महर्षि चेतना आधारित शिक्षा से छात्र सृजनात्मक और प्रबुद्ध होगें। वे स्वयं को अजेय बनाएगे साथ- साथ अपने परिवार समाज और देश को भी अजेय बनायेंगे। परिणामस्वरूप समस्त विश्व ब्रह्मांड अजेय बनेगा एवं परम् पूज्य महर्षि महेश योगी जी का ''धरती पर स्वर्ग का निर्माण'' का स्वप्न साकार होगा। शिक्षक प्रबुद्ध होकर विश्व को अजेय बनाने के लिए अपने योगदान पर अभिमान करेंगे।
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