महामीडिया न्यूज सर्विस
भय और आनंद

भय और आनंद

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 588 दिन 18 घंटे पूर्व
08/01/2018
भोपाल (महामीडिया) सूर्य सदैव पूर्व दिशा से ही उदय होता है। भारत भूमि पर अनेक सूर्य रूपि महामानवों ने जन्म लिया एवं अपने प्रकाश से सर्वप्रथम भारत भूमि को प्रकाशित किया तत्पश्चात सम्पूर्ण विश्व कोे ऐसे ही वैज्ञानिक संत परमपूज्य महर्षि महेश योगी थे जिन्होंने जीवन के विज्ञान को समझकर दर्शन व भौतिक के समन्वय से मानवता को आनंदित किया क्योंकि महर्षि जी का दृढ़ विश्वास था कि जीवन आनंद है, जो कि पश्चिम की विचारधारा जीवन संघर्ष के विपरीत है। हम क्यों नकारात्मक भावनाओं और विचारों को हमारे भीतर ठहरने देते हैं, क्योंकि वहाँ तो सकारात्मकता, प्रेम से भरे विचारों और भावनाओं को स्थान मिलना चाहिए। क्या हमने कभी स्वयं से इस सम्बन्ध में प्रश्न किया है? या यह इसलिए होता है कि हमने नकारात्मकता को स्वयं ही तैयार किया है और इन्हें स्वीकार करना हमारे लिए सरल होता है और इनसे हम स्वयं को सरलता से जोड़ लेते हैं। हम पागलपन, घृणा और दुःख को स्वीकार लेते हैं, जबकि हमें प्रेम और दया को स्वीकारना चाहिए। प्रेम हमारे भीतर है हम सभी इस भाव से जन्म लेते हैं। इसे ही हमें सभी को देना भी था, पर जैसे जैसे समय के साथ-साथ हमने अपने लिए एक नयी सृष्टि का निर्माण करना प्रारंभ कर दिया। एक भिन्न सृष्टि, एक ऐसा संसार जहाँ कुछ भी एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं। ऐसा भ्रम जो हमारे अहम्ं को जीवित रखता है। दो प्रकार की मूल प्रेरक शक्तियां होती हैं- प्रेम और भय। जब हम भयभीत होते हैं, तब जीवन से भागने लगते हैं। जब हम प्रेम मे होते हैं, तब जीवन का स्वागत करते हैं। इसमें उत्साह, उत्सुकता तथा स्वीकार्यता होती है। हमें सबसे पहले स्वयं से प्रेम करना सीखना होता है। अगर हम स्वयं को प्रेम नहीं कर सकते तो हम दूसरों को प्रेम करने की अपनी पूरी क्षमताओं को उपयोग नहीं कर सकते या अपने आपको उन असीमित संभावनाओं से नहीं जोड़ सकते। एक श्रेष्ठ विश्व तैयार करने और उसे पाने की संभावनाएं मात्र भयहीनता और उन प्रेममय विचारों वाले लोगों में समाहित हैं, जो प्रेम करना जानते हैं। विश्व में भावनाएं दो स्रोतों से ही सामान्यतः अभिव्यक्त होती हैं। भय और प्रेम। अन्य भाव, जिन्हें हम जानते हैं वो कुछ नहीं इन दोनों की उपश्रेणियां हैं। जहाँ पर भी प्रेम है, वहाँ पर शांति, उल्लास, संतोष, क्षमा होते है और दूसरी और जहाँ पर घृणा होती है, वहाँ पर, उदासी, अवसाद, थकान, आलोचना, आत्मग्लानि का वास होता है। आप देखें जहाँ पर भी प्रेम है, वहाँ पर भय का अपना अस्तित्व हो नहीं सकता और जहाँ पर भय है, वहाँ पर प्रेम बचा नहीं रह सकता। ये दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते, इसमें एक वास्तविक है और दूसरा मात्र एक भ्रम है। हम जब कभी भी स्वयं को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ पर दुःख, अवसाद, क्रोध, आलोचना इत्यादि होते हैं तो हमें समझ जाना चाहिए कि हम भयभीत है और ये भय हमारा स्वयं का तैयार किया हुआ है। भय वास्तविक नहीं है, इसे हमने बनाया है। जबकि प्रेम वास्तविक है। प्रेम हमारे होने की प्राकृतिक अवस्था है, अर्थात् हम जो हैं, हमें जिसके लिए तैयार किया गया है और यही परम सत्य है। तो फिर भय को क्यों चुनें? हम ऐसा क्यों करते हैं? यह हम पर निर्भर करता है कि हम या तो प्रेम को चुनें या फिर भय को, प्रसन्न रहे या दुखी। अधिकतर लोगों का विचार होगा क्या? ये तो हास्यास्पद है। यह सब मुझ पर कैसे निर्भर है? मैं कैसे प्रेम की भावना अपने अन्दर जगा सकता हूँ? उनके भीतर जिनके साथ में अपने घर में रहता हूं, या बाजार जाता हूं, या कार्यस्थल में रहता हूं। वस्तुततः में हम स्थिति को कैसा देखते हैं, यह इस पर निर्भर करता है। यह हमारे व्यवहार पर निर्भर करता है कि हम कैसे अपने साथ होने वाली बातों को लेकर अपना पक्ष रखते हैं। हम उस स्थिति की प्रति उत्तरदायी हैं? जब आप अपनी समस्या के लिए किसी दूसरे पर आरोप नहीं मढ़ते हैं, तब चीजों को दूसरे के दृष्टि से देखने का प्रयास प्रारंभ करते हैं। यहीं से आप जीवन में परिवर्तन लाना प्रारंभ करते हैं। जब आप विश्व को, प्रेम को स्वीकार करना प्रारंभ करते हैं, तब भय विलुप्त होना प्रारंभ हो जाता है। इसके अनुसार जिससे प्रेम किया जाता है, उससे भय कैसा और जिससे भय होता है उससे प्रेम कैसे होगा? ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते। जीवन बहुत साधारण होता है, लेकिन हम ही उसे जटिल बनाते हैं। हम ही स्वयं के लिए समस्याओं का मकड़ जाल बुनते हैं। उनमें उलझकर रह जाते हैं। हम भय, हानि, पीड़ा, शंका को इतनी सरलता से स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इन्हें हम स्वयं तैयार करते हैं। हमने यह दुश्वारियों का संसार रचा है, जिससे बचना सरल लग रहा हैै। हम कहते हैं कि हम ऐसा करना चाहते हैं, पर इसका सही अर्थ क्या है? यही कि हम जिनसे अधिक सम्बधता अनुभव करते हैं और परंतु उन्हें एक पल के लिए छोड़ दे तो स्थिति सरल हो जाएँगी। हमें शांति मिलेगी। हम प्रेम अनुभव कर लेते हैं, लेकिन विकट स्थितियों में हम इतने घुलमिल जाते हैं कि हम स्वयं समस्याओं को फिर से एकत्रित करना प्रारंभ कर देते हैं, जिससे हमें फिर से सहज लगना प्रारंभ हो जाए। वास्तविक संसार जटिल है, इसमें निर्धनता है, पीड़ा है और भय है। हम कैसे उस संसार में जी सकते हैं, जो है ही नहीं। हम कैसे प्रसन्न रह सकते हैं? पर एक सत्य यह भी है कि हममें से अधिकतर चाहे अनुभव करें या न करें, हम स्वयं समस्याएं चुनते हैं। आनंद एक विकल्प है, मन की शांति एक विकल्प है। और एक विकल्प है प्रसन्नता। हमें ही समस्याओं से जूझते मन को सही राह पर लाना होगा और हमारा ध्यान खींचने वाले उन बेकार के आकर्षणों को बदलना होगा। माना यह कार्य आसान नहीं, लेकिन अब तक जो संघर्ष आप कर रहे हैं, उससे तो कहीं अधिक सरल है। परमपूज्य महर्षि जी के संघर्ष को आनंद में बदलने की प्रयास रहित तकनीक दे दी है।

ब्रह्मचारी गिरीश
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश एवं
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी, भारत का ब्रह्मस्थान, म.प्र.

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