महामीडिया न्यूज सर्विस
जीवन्त शिक्षा

जीवन्त शिक्षा

admin | पोस्ट किया गया 620 दिन 12 घंटे पूर्व
03/02/2018
भोपाल (महामीडिया) भारत में शिक्षा सदैव ही जीवन का आवश्यक अंग रही है किंतु वैदिक कालीन प्राचीन भारतीय शिक्षा विद्यार्थी को समग्र रुप से सभी क्षेत्रों की समझ को प्रेरित और प्रोत्साहित करती थी। वर्तमान समय भारत में प्रचलित शिक्षा-पद्धति हमारे द्वारा तैयार नहीं की गई है इसका हमारी प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनैतिक प्रतिस्पर्धा को पोषित एवं पल्लवित कर रही है। शिक्षा, वह माध्यम जिसके द्वारा हम अपने पूर्वजों से प्राप्त आदर्शों, संस्कारों व नैतिक मूल्यों को और परिष्कृत कर अपनी आने वाली पीढ़ि को पहुंचाते हैं। जिससे सभी को एक समाज के रुप में स्थापित कर सके। हमारी शिक्षा हमें वसुधैव कुटुम्बकम का आभास कराती है जो हमें समस्त विश्व को एक परिवार का सदस्य मानते हुए सबका साथ, सबका विकास मूल मंत्र पर आधारित है। साथ ही प्राणियों में सद्भावना तथा विश्व के कल्याण को आधार मानकर समस्त नीतियों का निर्धारण किया जाता था। ?वर्तमान शिक्षा? से यह दोनों मूल भावनाएं विलुप्त हैं। अत: यह जीवन्त शिक्षा ही नहीं है क्योंकि हमें यह शिक्षा विदेशी आक्रान्ताओं के षड्यंत्र के रुप में प्राप्त हुई और उनकी यह कूट रचना अंशत: फलित भी हो गई क्योंकि पिछले 70 वर्षों से हमने इस शिक्षा में उसकी आत्मा को ही सम्मिलित नहीं किया। वर्तमान में हमारे राष्ट्र की युवा पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति को आत्मसात् कर रही है। यहां प्रश्न यह उठता है कि इस स्थिति का उत्तरदायी कौन है? वह पीढ़ी जो इसे आत्मसात कर रही है या वह पीढ़ी जिसने स्वतन्त्रा प्राप्ति के बाद भी शिक्षा पद्धति में परिवर्तन नहीं किये। निश्चित रुप वह पीढ़ी इसके लिये उत्तरदायी है क्योंकि उन्होंने विकल्प उपलब्ध नहीं कराये। भारतीय शहरी समाज में आप वह सब विकृतियां देख सकते हैं जो पश्चिमी समाज में व्याप्त हैं। हम संयुक्त परिवारों से एकल परिवार हो गए। धर्म, संस्कृति, संस्कार सब आडम्बर हो गए, हमारी, युवापीढ़ी व्यसन मुक्त है। शिक्षित है तो रोजगार नहीं है, रोजगार है तो, शांति नहीं है  शांति है तो आनंद नहीं है। सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। इस शिक्षा का दुष्प्रभाव देखिये कि विद्यालयों में अध्ययनरत 16-17 वर्ष के छात्र अपने से 5 से 6 वर्ष छोटे छात्रों को मात्र इसलिये मृत्यु प्रदान कर रहे कि उन्हें अवकाश चाहिये। एक छात्र अपनी शिक्षिका को मृत्युदंड दे रहा है जो उसके जीवन को संवारने के लिये प्रयासरत थी। यह चेतावनी है हमें अभी भी हमारी पीढ़ी को विकल्प देने के लिये तैयारी प्रारंभ कर देनी चाहिये। वर्तमान शिक्षा का प्रचार-प्रसार हमें व हमारे समाज को हिंसक बना रहा है। हमें अपनी जड़ों की और पुन: लौटना होगा क्योंकि जो वृक्ष अपनी जड़ों से कट जाता है वह पुष्पित व पल्लवित नहीं हो पाता है। ऐसा नहीं हैंकि ये जड़ें पूर्ण रुप से सूख चुकीं है हमारी जड़ें बहुत गहरी है। आवश्यकता तो मात्र इतनी है कि श्रृद्धा तथा विश्वास से इन्हें पुन- सिंचित करने का प्रयास करें जिससे हमें फल के रुप के समग्र विकास प्राप्त हो सके जो भौतिक न होकर आत्मिक एवं अध्यात्मिक हो। हमारे ऋषि मुनियों ने जीवन को आश्रम पद्धति में बांट दिया था। प्रथम ब्रह्मचर्य- आश्रम-समग्र शिक्षा एवं सत्यविद्यादि गुणों को ग्रहण करना। द्वितिय गृहस्थ-आश्रम-उत्तम गुणों के आचरण और श्रेष्ठ पदार्थों की उन्नति और सुशिक्षा। तृतीय- वानप्रस्थ आश्रम- ब्रह्म उपासना, एकान्त साधना, विद्याफल विचार आदि कार्यों के लिए।  चतुर्थ- परब्रह्म्, मोक्ष, परमानन्द को प्राप्त करने के लिए। ये चारों आश्रम वेदों और युक्तियों से सिद्ध एवं प्रमाणिक हैं। सब मनुष्यों को अपनी आयु का प्रथम भाग विद्या अध्ययन में व्यतीत करना चाहिये, और पूर्ण विद्या को प्राप्त कर उसे संसार की उन्नति करने के लिये गृहस्थ आश्रम और धीरे-धीरे वानप्रस्थ आश्रम में आकर संसार व पदार्थों के मोह से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिये। यह आश्रम चिंतन, मनन का वह स्थान है जहां हम अपने पिछले पचास वर्षों का लेखा-जोखा देखते हैं, हम कहां चूक गये। या जो चूक रहे हैं उन्हें संरक्षण व शिक्षा से मार्ग प्रशस्त करना। अन्त में सन्यास आश्रम जहां परमात्मा के चरणों में चिन्तन करता हुआ मनुष्य आनंद प्राप्त करते हुए उसकी परम स्थिति में विलीन हो जाता है।

ब्रह्मचारी गिरीश
कुलाधिपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश एवं
महानिदेशक-महर्षि विश्व शान्ति की वैश्विक राजधानी, भारत का ब्रह्मस्थान, म.प्र.
और ख़बरें >

समाचार

MAHA MEDIA NEWS SERVICES

Sarnath Complex 3rd Floor,
Front of Board Office, Shivaji Nagar, Bhopal
Madhya Pradesh, India

+91 755 4097200-16
Fax : +91 755 4000634

mmns.india@gmail.com
mmns.india@yahoo.in