महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत में बैंकिंग भ्रष्टाचार नेताओं और नौकरशाहों की करतूत है

भारत में बैंकिंग भ्रष्टाचार नेताओं और नौकरशाहों की करतूत है

admin | पोस्ट किया गया 537 दिन 8 घंटे पूर्व
27/02/2018
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा आज से तीन वर्ष पूर्व मैंने अपने संपादकीय में नीरव मोदी घोटाले से बचाव के लिए सरकारों को आगाह किया था किन्तु भारतीय रिजर्व बैंक के मीडिया सलाहकारों एवं जनसंपर्क अधिकारियों के अनपढ़ एवं गंवार होने की वजह से इस अपराध को नहीं रोका जा सका। स्वयं मेरे द्वारा आज से पांच वर्ष पूर्व पूरे विश्व के 170 शहरों में 750 से अधिक बैंक शाखाओं में कराये गये एक अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि देश के भ्रष्ट नेता, नौकरशाह एवं सफेद पोश अपराधी बैंकों को लूट रहे हैं। इसके बावजूद एहतियाती कदम इसलिए नहीं उठाये गये कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री का जाति भाई नीरव मोदी ही अपराध को अंजाम दे रहा था। आखिर भारत के निजी क्षेत्र के बैंकों में भ्रष्टाचार क्यों नहीं होता क्योंकि निजी क्षेत्र की वेबसाईटों में पैनल एडव्होकेट के आवेदन का प्रारूप एवं आनलाईन आवेदन की सुविधा होती है एवं मात्र तीन माह के अंदर आवेदक को सूचित करना पड़ता है जबकि सरकारी क्षेत्र के बैंकों में बैंक मैनेजर सिर्फ घूंस की प्रत्याशा में आवेदन रोककर रखे रहते हैं एवं समय पर बहुमुखी प्रतिभा के विशेषज्ञों का लाभ बैंक नहीं उठा पाता। मेरा स्पष्ट मानना है कि आम एडव्होकेट सिर्फ रिपोर्ट बना सकता है जबकि विशेष एडव्होकेट ट्रैंकिंग एवं मानीटरिंग का 20 वर्ष का अनुभवी होता है। वह आपको यह भी बता सकता है कि अपराध को कैसे रोका जाए एवं बैंक को अच्छा लाभ कैसे मिले। 
बैंक का वित्तीय मध्यस्थता विकास का इंजन है क्योंकि वह जिन लोगों के पास बचत है उनसे पैसे जमा करवाकर उसे निवेश गतिविधियों के लिए उधार देकर अर्थव्यवस्था में पैसे के परिचालन करते हैं। इससे अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उधार से उत्पादक संसाधनों की मांग का निर्माण होता है और वस्तु एवं सेवाओं की आपूर्ति करने वाले लोगों की आय में बढ़ोतरी होती है। एक का खर्च दूसरे की आय हैं यह उच्च सकल घरेलू उत्पाद और तेज उत्पादक वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। 
उधार देने में संकुचन से विपरीत प्रभाव पड़ता है और विकास लड़खड़ा जाता है। कर्ज देने के मामले में मंदी का एक प्रमुख कारण बैंकों के बैलेंस शीट में गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की तेजी में वृद्धि है। एससीबी के बकाया कर्ज के बाजार शेयर का लगभग 72 फीसदी हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का है। ट्विन बैलेंस शीट की समस्या यानि अति प्रवाह और संकटग्रस्त कंपनियां मिलकर पीएसबी के एनपीए को बढ़ाती हैं जिससे अर्थव्यवस्था में निवेश बाधित होता है।
भारतीय बैंकों का सकल एनपीए तीस सितंबर, 2017 तक 8.40 लाख करोड़ रुपये हो गया। जो दिखाता है कि 30 जून, 2017 के 8.29 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले इसमें 1.31 फीसदी की वृद्धि हुई है। सितंबर 2015 से एनपीए में तेजी से उछाल का कारण कथित रूप से वर्ष 2008 से पूर्ववर्ती वर्षों के दौरान बैंकों के क्रेडिट ग्रोथ में तेजी है। वर्ष 2008 से 2014 के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल उधार 18 लाख करोड़ रुपये से 54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया और सितंबर, 2017 तक यह आंकड़ा 55.01 लाख करोड़ रुपये था। हैरानी की बात नहीं कि बुरे कर्ज के इस ढेर में सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों की फंसी परिसंपत्तियों का हिस्सा लगभग 90 फीसदी है। वित्तीय वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का खराब कर्ज लगभग 7.33 करोड़ रुपये ज्यादा था जबकि 17 निजी क्षेत्र के बैंकों का बुरा कर्ज 10.5 फीसदी बढ़कर 1.06 लाख करोड़ पहुंच गया।
अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों के अग्रिम में पांच करोड़ रुपये और उससे अधिक की सीमा वाले बड़े उधारकर्ताओं का हिस्सा 56 फीसदी है, लेकिन उनके एनपीए का हिस्सा 86.5 फीसदी है। एनपीए में अधिकतम गिरावट उन खातों में आयी है जिनकी बकाया राषि 20 करोड़ रुपये से 50 करोड़ रुपये के बीच है और उसके बाद उन खातों में जिनकी बकाया राषि 50 करोड़ रुपये से 100 करोड़ रुपये के बीच है।
शीर्ष 100 बड़े उधारकर्ता सकल अग्रिम का लगभग 15.2 फीसदी है लेकिन 100 शीर्ष गैर-निष्पादित खाते में उनका हिस्सा एससीबी के सकल एनपीए का 25.6 फीसदी हैं
एससीबी के मार्च 2017 तक उद्योगों का स्ट्रेस्ड एडवांस रेशो लगभग 23 फीसदी था जबकि कृषि, सेवा और खुदरा क्षेत्र के लिए यह अनुपात क्रमशः 6.3 फीसदी, 7 फीसदी और 2.1 फीसदी था। इसमें एक समूह के रूप में पीएसबी द्वारा उद्योगों स्ट्रेस्ड एडवांस रेषों का एडवांस 28.8 फीसदी था जबकि निजी बैंकों और विदेशी बैंकों का अनुपात क्रमषः 9.3 फीसदी और 7.1 फीसदी था। उनमें प्राथमिक रूप से बुनियादी धातु और उनके उत्पाद, सीमेंट और उनके उत्पाद, टेक्सटाइल, अवसंरचना आदि इससे प्रभावित हैं।
वर्ष    जीएनपीए क्रेडिट ग्रोथ
2001-02     11 23.6
2002-03     9.5 14.4
2003-04     7.4 16.2
2004-05    5.2 31
2005-06    3.5 31
2006-07    2.6 28.5
2007-08    2.4 23.1
2008-09    2.4 19.6
2009-10    2.5 17.1
2010-11    2.4         22.3
2011-12    2.9         16.9
2012-13    3.4         15.1
2013-14    3.8         10.9
2014-15    4.3         12.6
2015-16    7.6         10.7
2016-17    9.3          5.08

(संप्रति संयुक्त राष्ट्र राष्ट्रीय विशेष पुरस्कार 1998 से सम्मानित संपूर्ण मध्यप्रदेश के इकलौते उप संपादक है एवं मौलाना आजाद केंद्रीय पुस्तकालय भोपाल के पूर्व निर्वाचित महासचिव (1990) हैं। संपर्क- 8269488019)   
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